रविवार, 29 नवंबर 2009

आईआईएम का अभिजात्यवाद और कैट की किरकिरी

शनिवार के बाद रविवार को भी देश के सबसे प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल आईआईएम की कैट परीक्षा बाधित रही कई केन्द्रों पर. ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा का यह प्रयास जो भारतीय प्रबंधन संसथान ने किया वह फिर औंधे मुंह गिरा. साथ ही कई उम्मीदवारों की तैयारियों पर भी वज्रपात हो गया. कहने को तो इन उम्मीदवारों की परीक्षा फिर से होगी पर जिनका प्रतियोगी परीक्षाओं का अनुभव रहा है वह जानते हैं कि इन परीक्षाओं के लिए बार-बार एक जैसी तैयारी नहीं हो सकती है.

पर इस प्रकरण से कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं. पहला तो यह देश का सबसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान अपनी ही प्रवेश परीक्षा का प्रबंधन नहीं कर पाया? यह किसी भी प्रबंधन संस्थान की प्रबंधकीय क्षमता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है. इसका जबाव देना कैट के प्रबंधकों के लिए आसान नहीं होगा. दूसरा यह कि जब पूरी दुनिया में आई आई टी और आई आई एम का डंका बजता है तो इन्हें परीक्षा के लिए अमेरिका से किसी को लाने की क्या जरूरत थी? क्या यह काम खुद आई आई एम नहीं कर सकता था?

तीसरा सवाल जो इन सब सवालों से बड़ा है वह यह कि जिस देश में अभी भी ६५ फीसदी छात्रों तक कंप्यूटर की पहुँच नहीं बन पायी है वहां इस ऑनलाइन परीक्षा का औचित्य क्या है? क्या यह परीक्षा पद्धति देश के अधिसंख्य उम्मीदवारों को, जो सरकारी स्कूलों में पढ़ कर बड़े हुए हैं या फिर सुविधावंचित वर्ग से हैं, दूर करने का एक जरिया है? कम से कम प्रथम दृष्टया तो यही प्रतीत होता है. रही बात आईआईएम को निचले तबके से दूर करने की तो इसका प्रयास सफलता पूर्वक पहले ही किया जा चुका है इसकी फीस में कई गुना वृद्धि करके? इस परीक्षा पद्धति को लाने का सीधा मतलब योग्यता की परख से ज्यादा उम्मीदवारों को उपलब्ध सुविधा की परख करना है. वैसे भी आईआईएम अभिजात्यवाद का घोर समर्थक रहा है और यह उसके इस समर्थन का एक और प्रतीक है. यह अलग बात है कि कैट के कुप्रबंधन ने उसके इस अभिजात्यवाद की पोल खोलने का मौका दे दिया है

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

अब मेडिकल शिक्षा में वर्ण भेद

चलिए आजादी के ६२ सालों बाद ही सही भारत में अब प्रोफेशन के नाम पर वर्ण-व्यवस्था बनाने की तैयारी हो गयी है. यानि की उच्च और निम्न का भेद. अब इसके लिए कम से कम देशवासियों को सरकार और उसकी एजेन्सी को बधाई तो दे ही देनी चाहिए जिन्होंने ने इतनी बड़ी अवधारणा को जन्म दिया और अब उसके क्रियान्वयन की तैयारी कर रहे हैं.

दरअसल देश भर में डॉक्टरों की भारी कमी और जनसंख्या में उनकी उपलब्धता के अनुपात को देखते हुए (ख़ास कर गाँवों में) अब देश में मेडिकल शिक्षा की नियामक संस्था 'मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया' या भारतीय चिकित्सा परिषद् ने एक अलग ही गंवई डॉक्टरों की फौज बनाने की तैयारी कर ली है. यानी ये होंगे तो एमबीबीएस डॉक्टर ही पर इनके साथ कुछ (स्पेशल या विलेज) अलग से चस्पां हो सकता है. ठीक उसी तरह से जैसे कि हिंदी प्रदेशों में एस पी (देहात) जैसा कुछ होता है. साथ ही इस स्पेशल एमबीबीएस डॉक्टरों के साथ यह भी अनिवार्यता होगी कि वे शुरू के दस साल तक गाँव को छोड़कर शहरों में अपनी प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे. यानी कि उनका भविष्य भीगाँव में ही सिमट कर रह जाएगा अन्य पद्धतियों के डॉक्टरों की तरह. वैसे तो कहने को हमारे यहाँ बहुत सारी चिकित्सा पद्धतियाँ हैं आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपथी, नेचरोपैथी आदि पर डॉक्टर हमारे यहाँ एम बी बी एस करने वाले ही होते हैं. कुछ सरकार की कृपा से कुछ मेडिकल काउंसिल के संगठित दबदबे के कारण.

वैसे भी ये सब पद्धतियाँ गरीबों के लिए मानी जाती हैं क्योंकि इसमें कमाई या नौकरी की गुंजाइश कम है. अब एमबीबीएस वाले कभी गाँव में ठहरना चाहते ही नहीं हैं तो सरकार उनके लिए कई हथकंडे अपनाती रही है. मसलन अनिवार्य सेवा, इंटर्नशिप आदि. पर उन्हें गाँवों में रहने के लिए कभी पुरस्कृत या प्रोत्साहित किया गया हो ऐसा शायद ही कभी देखने में आया हो. ऐसे में यह नया कोर्स गाँव का कितना भला कर पायेगा यह तो मेडिकल काउंसिल ही जाने पर कई गरीब मेधावी मेडिकल छात्रों का भविष्य अंधकारमय जरूर बना देगा.

सब जानते हैं कि मेडिकल शिक्षा का विस्तार अभी इतना नहीं हुआ है कि यह आसानी से लोगों को सुलभ हो जाय साथ ही यह काफी मंहगा भी है. ऐसे में उच्च वर्ग तो पैसे के बल पर अपना प्रवेश देश के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में करा लेता है पर अन्य छात्र प्रवेश परीक्षाओं के भरोसे बैठे रहते हैं. जाहिर है कि इन कोर्सों को पढने के लिए इस वर्ग को ही बाध्य किया जाएगा, जैसी कि परम्परा रही है. ऐसे में मेडिकल में एक ऐसा वर्ण भेद पैदा होगा जिसकी भरपाई शायद ही हो पाए. शायद मेडिकल काउंसिल भी यही चाहता है. आखिर यह एलिट बनाम सामान्य की लड़ाई है.

शनिवार, 5 सितंबर 2009

सरस्वती, व्यास सम्मान में पठन-पाठन की चिंता

लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार चिंतित हैं इन दिनों. उनकी चिंता यह है कि आजकल मध्य वर्ग में साहित्यिक पुस्तकों को पढने का शौक गायब होता जा रहा है. पुस्तकालय खाली पड़े हुए हैं. यहाँ तक कि संसद के पुस्तकालय, जो कि देश के बेहतरीन पुस्तकालयों में से एक है, में लोग बेहद कम दिखाई देते हैं. अपनी यह चिंता उन्होंने देश के प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान और व्यास सम्मान समारोह के दौरान श्रोताओं के समक्ष रखी है.

उनके श्रोताओं में कोई सामान्य लोग नहीं थे. के के बिडला फाउंडेशन की अध्यक्ष शोभना भारतिया, सरस्वती सम्मान से नवाजे गए जाने-माने असमी साहित्यकार लक्ष्मीनंदन बोरा, हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका और व्यास सम्मान से सम्मानित मन्नू भंडारी, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी बी पटनायक, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी समेत साहित्य जगत की अनेक हस्तियाँ मौजूद थीं. ऐसे में मीरा कुमार की चिंता का कोई असर पाठक जगत पर नहीं पडेगा यह कहना गलत होगा. पर क्या साहित्य के पाठक सचमुच घट रहे हैं.

खुद मन्नू भंडारी का कहना था कि उनकी पुस्तक ' एक कहानी यह भी' (जिसके लिए उन्हें व्यास सम्मान दिया गया है) का दो साल के अन्दर तीसरा संस्करण आ चुका है. हिंदी में इस प्रकार से साहित्यिक पुस्तकों के बिक्री का इतिहास नहीं रहा है. ऐसे में यह मानना कि पाठक घट रहे है थोडा जल्दीबाजी होगी. पर बेहतरीन साहित्य कम जरूर आ रहा है.

खुद मीरा कुमार ने अपने संबोधन में धर्मयुग की चर्चा की और कहा कि स्कूल कॉलेज के दिनों में उन्हें इसका इन्तजार होता था क्योंकि उसमें मन्नू भंडारी की कहानियां श्रृंखला में होती थीं. पर आज धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं नहीं हैं जो लोगों को पठन-पाठन की ओर अग्रसर करें. बेहतरीन लेखन की चर्चा की जा चुकी है. हाँ इन्टरनेट पर काफी सामग्री आजकल है जिससे यह प्रवृति प्रभावित हुई है. पर अगर क्वालिटी का लेखन हो तो पाठक नहीं आयेंगे ऐसा नहीं है. पर चिंता जायज है कि निर्जन होते पुस्तकालयों का क्या किया जाय. साथ ही यह भी चिंता सही है कि अगर मध्य वर्ग इस पठन-पाठन कि प्रवृत्ति से दूर हो गया तो उसे दुनिया में हो रहे बदलावों और उससे जुडी चिंताओं का पता नहीं चलेगा. अब ऐसे में रचनाकार और ब्लॉगर की जिम्मेदारियों के बारें में भी थोडा सोच लें.

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

तो आपका नंबर क्या है ?

भाई साहब आपका नंबर क्या है? कुछ ऐसा ही दिल्लीवासियों के साथ आने वाले दिनों में होने वाला है कि उनकी पहचान किसी नाम से नहीं बल्कि उसके नंबर से होगी! अब यह अच्छी खबर है या बुरी यह आप जानें पर तैयारी जारी है.

जाने-माने आईटी दिग्गज नंदन नीलेकनी साहब ने बुधवार को दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित के समक्ष एक प्रेजेंटेशन दिया जिसमें उन्होंने बताया कि दिल्ली में आने वाले तीन वर्षों में राजधानीवासियों को विशेष पहचानपत्र उपलब्ध करा दिया जाएगा. उसमें लोगों की पूरी जन्म पत्री उपलब्ध होगी. ठीक अमेरिका की तरह ही. यानी की आप की जन्म तिथि से लेकर आपके माता-पिता, शिक्षा, आय, आवास, फिंगर प्रिंट आदि-आदि.

नीलेकनी साहब आईटी दिग्गज भर नहीं है बल्कि पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन में उनकी कोई सानी नहीं है. वे इन्फोसिस के शीर्ष पर रहे है और उनकी पुस्तक 'इमेजिंग इंडिया' भी अद्भुत है. इस कारण से सरकार की ओर से उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर यूनिक आईडी अथॉरिटी का चेयरमैन भी बनाया गया है. पर जिस देश में सारी लोगों को अभी तक फोटो वाले मतदाता पहचान पत्र तक नहीं दिए जा सके हों और सभी नागरिकों का राशन कार्ड तक नहीं बन पाया हो वहां ऐसे प्रोजेक्ट को लेकर आशंका होना स्वाभाविक है कि इसका भी कहीं वही हश्र तो नहीं होने वाला है.

सिर्फ राजनीति ही नहीं नौकरशाही भी ऐसे प्रोजेक्ट पर कृपावान रही है. अगर भरोसा नहीं है तो उन लोगों से पूछिए जिन्होंने अपनी ओर से वोटर आईडी या राशन कार्ड बनवाने के प्रयास किये या पासपोर्ट जैसे महतवपूर्ण दस्तावेज में किसी दर्ज गलती को सुधारने की कोशिश की. उनकी आपबीती से पता चल जाएगा कि इन्हें हासिल करना कितना जद्दोजहद वाला काम है.

खैर, नीलेकनी साहब का प्रोजेक्ट कितना कारगर होगा यह तो आने वाले तीन -चार साल के बाद पता चलेगा पर माता पिता यह सोच कर खुश हो सकते हैं कि उनके बच्चों की पहचान उनके नाम से नहीं बल्कि नंबर से होगी - मसलन बी-२००४, स-७७१ आदि-आदि. इस कारण से उन्हें बच्चों के नामकरण के झंझट से मुक्ति मिल सकती है. पर शिक्षक अपने छात्र को या बॉस अपने कर्मचारियों को कैसे बुलाएगा? सोच कर बताइयेगा!

शनिवार, 22 अगस्त 2009

जिन्ना: कैसे हो तटस्थ और निष्पक्ष विश्लेषण

वरिष्ट पत्रकार वेद प्रताप वैदिक पीटीआई 'भाषा' और नवभारत टाईम्स के संपादक रह चुके है और अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध पर उन्होंने पीएचडी की है. हाल में ही जसवंत सिंह के पुस्तक 'जिन्ना: इंडिया पार्टीशन, इंडीपेंदेंस' से जिन्ना पर फिर से चर्चा शुरू हो गयी है. 'युवा' को 'वैदिक' जी ने एक विश्लेषण भेजा है जिन्ना पर, जिसे हम युवा के पाठकों के लिए सधन्यवाद प्रकाशित कर रहे हैं:

क्या यह जरूरी है कि मोहम्मद अली जिन्ना को हम देवता मानें या दानव ! देव और दानव के परे क्या कोई अन्य श्रेणी नहीं है, जिसमें गांधी, जिन्ना और सावरकर जैसे लोगों को रखा जा सके? क्या अपने इतिहास के प्रति हम थोड़े निस्संग, थोड़े निष्पक्ष, थोड़े तटस्थ हो सकते हैं? यदि साठ साल बाद भी हम में यह परिपक्वता नहीं आ सकी तो क्या हम किसी दिन अपने इतिहास को दोहराने पर मजबूर नहीं हो जाएंगे? यदि साठ-सत्तर साल पहले हम जिन्ना के समकालीन हुए होते तो शायद हमारे दिल भी उसी हिकारत से भरे होते, जिससे नेहरू और पटेल के भरे हुए थे यहां हम यह नहीं भूलें कि उस समय एक गांधी नाम का आदमी भी था, जो जिन्ना को क़ायदे-आज़म (महान नेता) बोलता था, भारतमाता का 'महान बेटा' बताता था और जिसे भारत का प्रधानमंत्री पद भी देने को तैयार था क्या गांधी को पता नहीं था कि जिन्ना के सांप्रदायिक भाषणों की वजह से ही खून की नदियां बही थीं, लाखों परिवार बेघर हुए थे और भारतमाता का सीना चीरा गया था? इसके बावजूद घृणा का रेला गांधी को अपने साथ बहा न सका शायद इसीलिए वे महात्मा कहलाए हमारी पीढ़ी जिन्ना को महात्मा के चश्मे से देखे, यह जरूरी नहीं है लेकिन जरूरी यह है कि हम उन कारणों में उतरें, जिनके चलते भारतवादी जिन्ना पाकिस्तानवादी जिन्ना बन गए

पूंजाभाई झीनाभाई के बेटे मोहम्मद अली ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे पाकिस्तान के पिता बनेंगे जिसकी मां का नाम मिठूबाई और पत्नी का नाम रतनबाई हो, जिसे न नमाज़ पढ़ना आती हो न उर्दू, जो गाय और सूअर के मांस में फर्क न करता हो, जो रोज़ दाढ़ी बनाता हो और जिसे दाढ़ीवाले मुल्लाओं में से बदबू आती हो, जो अपने आपको 'मुसलमान' कहे जाने पर भड़क उठता हो, भला ऐसा आदमी औरंगजेब के बाद मुसलमानों का सबसे बड़ा रहनुमा कैसे बन गया? जो आदमी सेंट्रल एसेम्बली में 1925 में खड़े होकर दहाड़ता हो कि ''मैं भारतीय हॅूं, पहले भी, बाद में भी और अंत में भी'', जो मुसलमानों का गोपालकृष्ण गोखले-जैसा नरम नेता बनना अपना जीवन-लक्ष्य समझता रहा हो, जो तुर्की के खलीफा को बचाने के गांधीवादी आंदोलन को पोंगा-पंथी मानता हो, जो मुसलमानों के पृथक मतदान और पृथक निर्वाचन-क्षेत्रों का विरोध करता रहा हो, जिसने मज़हब और राजनीति के घालमेल के गांधी, मौलाना मोहम्मद अली और आगा खान के प्रयत्नों को सदा रद्द किया हो, जिसने बाल गंगाधर तिलक की छोटी-सी अवमानना के लिए वॉयसराय विलिंगडन को मुंबई में नकेल पहना दी हो, 'रंगीला रसूल' के प्रकाशक महाशय राजपाल के हत्यारे अब्दुल क्रय्यूम को फांसी पर लटकाने का जिसने समर्थन किया हो, लाहौर के शहीदगंज गुरुद्वारे के विवाद में जिसने सिखों को न्याय दिलवाने में कोई क़सर न छोड़ी हो, 1933 में जिसने 'पाकिस्तान' शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली की मज़ाक उड़ाई हो और उनकी डिनर पार्टी का बहिष्कार किया हो, कट्टरपंथी मुल्लाओं ने जिसे 'क़ातिल-ए-आज़म' और 'क़ाफिर-ए-आज़म' का खिताब दिया हो, सरोजिनी नायडू ने जिसे 'हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत' कहा हो, जिसने मुंबई के अपने मुस्लिम मतदाताओं को 1934 के चुनाव में दो-टूक शब्दों में कहा हो, ''मैं भारतीय पहले हूं, मुसलमान बाद में'', जिसे चुनाव जिताने के लिए हिंदू मित्रों ने कारों के काफिले खड़े कर दिए हों, जलियांवाला बाग और भगतसिंह के मामले में जब गांधी जैसे नेता हकला रहे थे, जिस बेरिस्टर ने एसेम्बली को हिला दिया हो, 1938 तक जिस नेता का रसोइया हिंदू हो, ड्राइवर सिख हो, आशुलिपिक मलयाली ब्राह्रमण हो, रक्षा-अधिकारी गोरखा हिंदू हो, जिसके पार्टी-अखबार का संपादक ईसाई हो और जिसका निजी डॉक्टर पारसी हो, उस मोहम्मद अली जिन्ना ने यह कहना कैसे शुरू कर दिया कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं एक भारत में दो क़ौमें साथ-साथ नहीं रह सकतीं हिंदू और मुसलमान बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नहीं, दो राष्ट्र हैं, दो इतिहास हैं, दो परम्पराएं हैं, दो जीवन-पद्घतियां हैं उनकी दो भाषाएं हैं, दो भूषा हैं, दो भोजन हैं, दो भवन हैं, दो कानून हैं, दो केलेंडर हैं, दो रुझान हैं, दो महत्वाकांक्षाएं हैं, दो लक्ष्य हैं उनका भला इसी में है कि वे एक-दूसरे के मातहत न रहें अलग-अलग रहें जिन्ना के अनुसार अलगाव का यह बीज भारत-भूमि में उसी दिन पड़ गया, जिस दिन कोई पहला भारतीय मुसलमान बना मज़हब के नाम पर दुनिया के सबसे पहले और शायद आखिरी राष्ट्र का निर्माण हुआ और उसका नाम है, पाकिस्तान ! इस पाकिस्तान के एकमात्र जनक थे, जिन्ना !

पाकिस्तान पाकर जिन्ना को क्या मिला? उन्होंने खुद कहा मुझे कुतरा हुआ और दीमक खाया हुआ पाकिस्तान मिला पंजाब और बंगाल बंट गए सरहदी सूबे और कश्मीर ने भी साथ नहीं दिया उनकी अपनी बेटी दीना उनके साथ नहीं गई मुंबई का शानदार घर और प्राणपि्रया रतनबाई की कब्र भारत में ही छूट गई लाखों लोग मारे गए, लाखों बेघर हुए और भारत के मुसलमान दो हिस्सों में बंट गए बांग्लादेश बनने पर तीन हिस्सों में बंट गए मौलाना मौदूदी ने ठीक ही कहा कि जिन्ना ने भारत के मुसलमानों का जितना नुकसान किया, किसी ने नहीं किया जो पाकिस्तान में रहे, वे अमेरिकी ईसाइयों की कठपुतली बन गए और जो हिंदुस्तान में रह गए, उनकी हैसियत काफि़रों के राज में ''भेड़-बकरी की-सी बन गई'' भारत अखंड न रह सका लेकिन मुसलमान तो खंड-खंड हो गए इस्लाम के नाम पर वे फौजी बूटों तले रौंदे जा रहे हैं क्या जिन्ना जैसा कुशाग्र बुद्घि का धनी इस अनहोनी को नहीं समझ पाया? वास्तव में इसके होने के पहले तक वे इसे समझ नहीं पाए अगर समझ जाते तो वे शायद पाकिस्तान के सबसे बड़े विरोधी होते वे जून 1947 तक यही समझते रहे कि पाकिस्तान तो सिर्फ एक गोटी है, जिसे वे अंग्रेज की शतरंज पर हिंदू-मुस्लिम समता के लिए आगे बढ़ा रहे हैं उन्हें क्या पता था कि कांग्रेस के कुर्सीप्रेमी कमजोर नेता इतनी जल्दी घुटने टेक देंगे वे 1920 के नागपुर अधिवेशन में गांधी से मात खा गए थे, वे 1928 की नेहरू रिपोर्ट को सुधरवाने में असफल हो गए थे, 1937 में प्रचंड विजय के बावजूद मुस्लिम लीग को वे उ.प्र. मंत्र्िामंडल में शामिल नहीं करवा पाए थे, 1946 की अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीगी मंत्र्िायों की महत्वहीनता ने उन्हें आहत किया था उन पर सौ सुनारों की चोटें पड़ती रहीं आखिरकार उन्होंने एक लुहार की जमा दी उन्हें पाकिस्तान मिल गया जिद पूरी हो गई जिद पूरी हुई, गुस्सा ठंडा हुआ, होश आया तो पता चला कि 'मेरे जीवन की यह सबसे बड़ी भूल थी' वे शिखर-पुरुष बनने के लिए ही पैदा हुए थे कांग्रेस के न बन सके तो मुस्लिम लीग के बन गए क़ायदे-आज़म शिखर पर पहुंच गए और जिन्ना तलहटी में छूट गए इसी जिन्ना की खोज में वे आाखरी दम तक तड़फते रहे सिर्फ 13 माह वे पाकिस्तान के पिता रहे और पूरे 71 साल भारत मां के बेटे रहे वे 40 साल भारत के लिए लड़े और सिर्फ 7 साल पाकिस्तान के लिए लड़े शायद पाकिस्तान के लिए भी नहीं, केवल अपने अहंकार के लिए ही लड़े इसीलिए उन्हें न तो कट्टरपंथी कहा जा सकता है और न ही सेक्युलर वे तो सिर्फ मिस्टर जिन्ना थे

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जिन्ना पर आडवाणी के बयान को लेकर जब जून 2005 में विवाद उठा तो डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने जिन्ना पर जो मौलिक एवं शोधपरख लेख लिखा था. डॉ. वैदिक ऐसे पहले भारतीय हैं, जिन्हें 1983 में कराची की जिन्ना एकेडेमी ने व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया था

सोमवार, 10 अगस्त 2009

'अलवर की नयी राजकुमारियां' के बहाने

काफी दिनों बाद सोमवार को संसद के 'बालयोगी' सभागार जाना हुआ. मौका था एक पुस्तक ' अलवर की नयी राजकुमारियां' का विमोचन. चूँकि विमोचन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार द्वारा किया जाना था तो जाहिर था कि सारे औपचारिक ताम-झाम मौजूद थे इस कार्यक्रम के लिए.

पुस्तक 'सिर पर मैला ढोने वाली' महिलाओं के और उनके परिवारों के सामजिक उत्थान और आर्थिक बदलाव की कहानी है जिसमें ५० से ज्यादा पत्रकारों और लेखकों के लेखों और रिपोर्टों का संकलन है. पर कार्यक्रम की खासियत यह थी कि इस सभागार में करीब १०० से ज्यादा ऐसी महिलायें मौजूद थीं और इनमें से दो - उषा चौमर और सुशीला को बकायादा मंच पर स्पीकर के साथ बिठाया गया था. कहने की जरूरत नहीं है की लोकसभा के सभागार में यह काम मीरा कुमार के रहते ही हो सकता था. जिस धैर्य से उन्होंने इन लोगों कि कहानी करीब तीन घंटे से ज्यादा समय तक सुना वह भी उनके जैसा स्पीकर ही कर सकता था.

पर जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा विचलित किया वह कार्यक्रम के आयोजक 'सुलभ इंटरनेशनल' के संस्थापक विन्देश्वर पाठक के उस आपबीती ने जब उन्होंने इस सुलभ की नींव रखने के पीछे का वाक़या सुनाया. उनके शब्दों में "एक बार ऐसी ही जाति की महिला को उन्होंने बचपन में छू दिया था तब उनके लाख विरोध करने और रोने के बाद भी उनकी दादी ने उन्हें गौमूत्र, गोबर और गंगाजल खिला कर उनकी शुद्धि की थी". तब से ही उन्होंने इस बारे में कुछ करने का निर्णय किया और बाद में सुलभ की स्थापना की.

कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने इस काम के लिए अपनी शिक्षक की नौकरी छोड़ दी और बीवी के गहने बेच दिए. ब्राहमण होने के कारण उन्हें इस प्रकार का शौचालय से जुड़ा काम करने के लिए उनके अपनों ने उनका हुक्का पानी बंद तक कर दिया था. पर आज सुलभ एक अलग ही कहानी है. अलवर की जिन महिलाओं की यह कहानी है उन महिलाओं ने पिछले साल अपना फैशन शो संयुक्त राष्ट्र संघ (यू एन) में किया था जिसमें देश भर की चुनिदा मॉडल इनके साथ रैंप पर उतरी थी और सारी दुनिया के लिए यह एक खबर बनी थी. पर खबर को छोड़ दें तो क्या २१वी सदी में भारत अभी भी इस अमानवीय परंपरा से मुक्त हो पाया है??

सोमवार, 27 जुलाई 2009

"समीर लाल उड़नतश्तरी वाले" : आख़िर इस नाम का राज क्या है

सबसे पहले तो गुस्ताखी माफ़! पर जब से मैंने 'समीर लाल उड़न तश्तरी वाले' का नाम ब्लॉगवाणी पर देखा तभी से मेरे पेट में दर्द शुरू हो गया. वैसे तो मैंने भी बाबा समीरानंद को इस नए नाम की बधाई आनन-फानन में दे डाली ताकि कोई और पहले से इसका कॉपीराइट लेने के बारे में विचार शुरू न कर सके. पर अब तक नहीं समझ पाया कि आखिर इस नाम की जरूरत क्यों पड़ी - 'समीर लाल उड़न तश्तरी वाले'!

अब सारी ब्लॉग दुनिया जानती है की उड़नतश्तरी सिर्फ और सिर्फ उन्हीं की है और कोई भी इसमें उड़ने की जुर्रत करने की सोच भी नहीं सकता है ऐसे में इस नाम की जरूरत क्यों पड़ी? अब कोई दो-चार उड़नतश्तरी हो तो शायद सोचें कि कुछ ख़ास पहचान के लिए यह किया जाय. जैसे दिल्ली में मिठाई की दुकानों पर लिखा होता है. अग्रवाल स्वीट्स 'करांची वाले' या अग्रवाल स्वीट्स 'देशी घी वाले' या चांदनी चौक के पराँठे वाली गली में अपनी पहचान के लिए लिखा होता है पराँठे वाली दुकान 'असली वाले' .... आदि-आदि. पर यह समस्या कम से कम अपने बाबा समीरानंद को तो नहीं हो सकती है।

न ही बाबा को यह समस्या है कि ब्लॉग पर उनके हमनाम कई पैदा हो गए हों और उनसे प्रतियोगिता का कोई खतरा हो गया हो. वैसे कुछ समीर को मैं जानता हूँ पर निश्चिंत हूँ कि उनके पास ब्लॉग लिखने के बारे में हम निठल्लों की तरह सोचने का भी वक्त नहीं है. जैसे दुनिया के सबसे बड़े अखबार के मालिक भी समीर साहेब ही हैं. पर ब्लॉग लेखन (ख़ास कर हिंदी से) उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. तो यह खतरा बाबा समीरानद को कतई नहीं है. एक समीर हमारे पुराने बॉस हुआ करते थे, बड़े प्यारे से. पार्टियाँ देने में उनकी कोई सानी नहीं थी और घूमने के भी गजब शौकीन थे. बाद में वे देश के एक बेहद मशहूर टीवी चैनल में बॉस बनकर चले गए.

एक समीर काग्डी नाम का मेरा मित्र बना, जब मैं नेशनल डिफेन्स अकादेमी में चयनित होकर उसके साक्षात्कार के लिए बंगलोर गया था. चार दिन की दोस्ती वह परवान चढी की सेलेक्शन होने बाद भी काफी दिनों तक पत्र लिखता रहा जब तक की नेवी में वह पायलट नहीं बन गया और मैंने उसे चिठ्ठी के जबाव में लिखा था की पत्रकारों से मित्रता कहीं तुम्हारे करियर में दिक्कत तो नहीं देगी? उसके बाद तो वह महानुभाव गधे की सींग की तरह गायब हो गए.

एक समीर और मेरा मित्र बना. समीर महेन्द्रू नामक यह मित्र तब आया जब मैं पीटीआई में काम कर रहा था और वह भी साथ ही था. बाद में वह Dow jones में चला गया और मेरा संपर्क टूट गया. और, एक समीर साहेब हमारे पडोसी हैं. ऐसे की उनके दरवाजे और मेरे दरवाजे को संभालने वाला खम्बा भी फ्लैट में एक ही है. पर इन साहब से पिछले चार साल में चार बार से ज्यादा बात नहीं हुई है. पेशे से आईटी पेशेवर हैं और लिखने-पढने के धंधे को निचले तबके का काम मानते हैं. गनीमत यह है कि एक अखबार लेते हैं और उसे कभी-कभी पढ़ते भी हैं.

पर जहाँ तक मेरी समझ है तो इन चारों-पाँचों समीर से इन्हें तो कतई खतरा नहीं है. फिर यह 'समीर लाल उड़नतश्तरी वाले' जैसा खोजपूर्ण नाम क्यों? अगर पाठकगण मेरी मदद कर सकते हैं तो जरूर सुझाव दें क्योंकि मैं उम्र के इस पड़ाव पर दिल्ली में दूसरा चांदनी चौक नहीं बनवाना चाहता हूँ (अपने सर पर).... पर यह न कहियेगा कि नाम में क्या रखा है?

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

हाँ, देवनागरी के विकास का इतिहास ६००० साल पुराना

कुछ समय पूर्व एक लेख (हिंदी: आखिर कहाँ चूकें हम, २१ जून) में वरिष्ठ ब्लॉगर और इतिहास के विद्वान पी एन सुब्रमनियन ने अपनी प्रतिक्रिया में यह सवाल उठाया था कि आखिर देवनागरी लिपि का इतिहास ६००० साल पुराना कैसे हुआ? सुब्रमनियन जी के सवाल गंभीर थे और जवाब की अपेक्षा रखते हैं. ऐसे में मैंने इस मामले को फिर से डॉ. महेंद्र के सामने रखने का मन बनाया और साथ ही इतिहास में भी कुछ गोता मारने की कोशिश की.

देवनागरी मूलतः संस्कृत की लिपि कही जाती है पर संस्कृत का इतिहास भी ६००० साल पुराना नहीं है. "द वंडर दैट वाज इंडिया" के लेखक और इतिहासविद ए एल बाशम प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद को ज्यादा से ज्यादा २००० ईसा पूर्व का मानते हैं. इस प्रकार से यह देवनागरी के विकास की बात मात्र ४००० वर्ष पुरानी ही होती है. वह भी खरोष्ठी, ब्राह्मी व अन्य लिपियों के रास्ते से. हांलाकि बाशम साथ यह भी स्वीकारोक्ति भी करते हैं कि संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरुप ही पश्चिम में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है.

जैसा कि बाशम लिखते हैं " प्राचीन भारत के महत्तम उपलब्धियों में से एक उसकी विलक्षण वर्णमाला है जिसमें प्रथम स्वर आते हैं और फिर व्यंजन जो सभी उत्पत्ति क्रम के अनुसार अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत किये गए हैं. इस वर्णमाला का अविचारित रूप से वर्गीकृत तथा अपर्याप्त रोमन वर्णमाला से, जो तीन हजार वर्षों से क्रमशः विकसित हो रही थी, पर्याप्त अंतर है. पश्चिमी देशों द्वारा संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरूप ही यूरोप में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है."

खैर, इस कथन से संस्कृत की श्रेष्ठता भले ही सिद्ध होती हो पर इससे देवनागरी के ६००० साल पुराने होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है. पर डा. महेंद्र के अनुसार लिपि का विकास महज वेदों के विकास भर से नहीं जुड़ा हुआ है. वस्तुतः इनका विकास समझने के लिए चित्र लिपि और भित्ति चित्रों की ओर भी देखना होगा जहाँ से दुनिया कि सभी लिपियों का विकास हुआ है. चित्र लिपि से देवनागरी के विकास की बात समझनी हो तो पवर्ग सबसे अच्छा उदाहरण है जिसमें उच्चारण के समय ओष्ठद्वय ठीक उसी प्रकार की सरंचना बनाते हैं जिस प्रकार से पवर्ग के वर्ण लिखे जाते हैं.

डा. महेंद्र का यह भी कहना है कि अगर यह चित्र लिपि का देश में सबसे प्राचीन प्रमाण में से एक देखना हो तो मध्य प्रदेश में भीमवेदका की गुफाएं देखनी चाहिए. ये गुफाएं चित्र लिपि का बेजोड़ नमूना है और ६००० वर्ष से भी ज्यादा पुराना इसका इतिहास है. इसमें ज्यामितिक चित्रों से लेकर आधुनिक लिपियों के प्रमाण मिल जाते हैं. ऐसे में देवनागरी के विकास का इतिहास ६००० वर्ष से ज्यादा पुराना होता है. वैसे वेदों के बारे में एक बात और समझने की है कि वेद लिखित रूप में काफी बाद में अस्तित्व में आये. पर वाचिक परंपरा में वेदों ने भोजपत्रों पर अपना अस्तित्व कायम करने से पूर्व सैकडों या शायद हजारों सालों की यात्रा तय की है.

बुधवार, 22 जुलाई 2009

जब सूर्यग्रहण के चक्कर में फंसे हनुमान जी

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सूर्य ग्रहण का नजारा देखने के लिए कल रात से ही तैयारी कर ली थी- कैमरा, फिल्म वाला चश्मा ... - पर इन्द्र भगवान की कृपा. ऐन वक्त पर धोखा दे दिया. बादलों के साथ वो लुका-छिपी खेली कि टीवी के सामने बैठ कर ही पूर्ण ग्रहण देखने का संतोष करना पड़ा.

नहीं तो क्या-क्या तैयारी मैंने कर रखी थी मैं आपको कैसे बताऊँ? अब कल गया था शाम को हनुमान जी के मंदिर में. मंगलवार था हनुमान जी के दर्शन जरूरी थे. वैसे भी हनुमान जी एकमात्र देवता (वैसे देवगण उन्हें यह श्रेणी देने को तैयार नहीं है) है जिन्होंने सूर्य जैसे विशाल ब्रह्मांडीय पिंड को निगलने का दुस्साहस दिखाया था- कोई फल समझ कर! कम से कम तुलसीदास जी और वाल्मीकि तो यही कह गए हैं नहीं तो इस अज्ञ को इतना ज्ञान कहाँ?

खैर, चर्चा हनुमान जी की हो रही थी. तो मंदिर पहुँचने पर देखा तो हनुमान जी के दर्शन की लाइन ही गायब थी. मात्र दस बारह लोग खड़े थे. मैं खुश भी हुआ और विस्मित भी. खुश इसलिए की चलो जल्दी निबट लेंगे और विस्मित इसलिए कि यह क्या हुआ? इस विकसित दिल्ली में हनुमान भक्तों कि संख्या में एकदम से गिरावट कैसे आ गयी. मानो लाइन न हुई बजट के दिन सेंसेक्स का ग्राफ हो गया. पर इससे पहले मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाता कि पता चला मैं पवनपुत्र के सामने खडा हूँ.

पर यह क्या? जिस परमवीर ने सूर्य को निगल कर पूरी धरती पर ना जाने कितना लम्बा सूर्य ग्रहण कर दिया था वे खुद आज सूर्य ग्रहण की डर से लाल वस्त्र ओढे पड़े थे. जय हो हमारे पंडितों की. इधर उ़धर नजर दौडाई तो पता चला कि सभी मूर्तियों पर यही नजारा था. पूछा तो पता चला कि सूतक है और ग्रहण ख़त्म होने तक ऐसा ही रहेगा. अब अंधविश्वाशी आदमी तो आदमी भगवान तक को हमारे पंडितों ने ग्रहण के नाम पर डरा के रखा हुआ था. हनुमान जी तक को नहीं छोडा, इंसान को क्या छोडेंगे. अब, हनुमान जी क्या सोच रहे होंगे यह तो सिर्फ अनुमान ही कर सकते हैं. पर इतना तो जरूर कसमसा रहे होंगे कि ग्रहण तक इन पुजारियों ने मुझे ढँक रखा है इनको फिर से रामायण पढ़ाऊं. नहीं तो कम से कम टीवी तो देखने देते तो मैं ग्रहण का नजारा अपनी आँखों से ही सही देख तो लेता! अब इतने लम्बे सूर्य ग्रहण के लिए पूरी एक सदी तक इन्तजार करना पडेगा. आपकी क्या राय है?

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

कॉलेज में मेरा पहला दिन, जब हंसी फूट पड़ी

दिल्ली विश्वविद्यालय में आज से नया सत्र शुरू हो गया. दिल्ली विश्वविद्यालय में कॉलेज के छात्रों के लिए पहला दिन नए अनुभव वाला होता है. हमारी एक पाठिका ने अपना अनुभव 'yuva' के साथ बांटा है. उसका नाम और उसके साथियों का नाम इस पाठिका के अनुरोध पर बदल दिया गया है. पर अनुभव को ज्यों का त्यों पाठकों के लिए पेश किया जा रहा है :

आज मेरे कॉलेज का पहला दिन था. जैसा हमें परिचय कक्षा के दौरान १५ जुलाई को बताया गया था उस हिसाब से मैं दिल्ली विश्विद्यालय के साउथ कैम्पस में स्थित ARSD कॉलेज सबेरे ८.३० बजे पहुंच गयी. हमें कहा गया था विज्ञान की कक्षाएं सबेरे ८.३० से ही लगेंगी.
खैर, कॉलेज पहुँचने पर पता चला कि कक्षा की बात तो दूर यहाँ बैठना कहाँ है यह भी हम लोगों के लिए तय नहीं हो पाया था. अब ऐसे में मेरी स्कूल की सहेली नमिता जिसने रसायन शास्त्र में प्रवेश लिया था उसके साथ कॉलेज में अपनी कक्षा तलाशने निकल पड़ी. पता चला कि ऊपर के कमरे में कक्षा लगने वाली है. मैं भी उस कमरे में अन्य छात्रों के साथ बैठ गयी. उस थियेटरनुमा कमरे में बैठने के कुछ देर के बाद ही चार शिक्षकनुमा युवकों ने प्रवेश किया. यह बताया गया कि हमारा ओरिएन्तशन क्लास होने वाला है. हम लोगों से परिचय पूछा जाने लगा. हमारी होउबी के बारे में पूछा गया. जब मेरी सहेली की बारी आयी तो उसने कहा कि पुस्तकें पढना उसकी रूचि का काम है. इस पर उन युवकों के मुंह से निकला 'अरे, ये लडकियां किताब इतना क्यों पढ़ती हैं' . तब कही जाकर हमें समझ में आया कि हम उल्लू बनाए जा रहे है और ये शिक्षक नहीं हमारे सीनियर हैं. हमलोग फिर वहां से निकलने कि जुगत में लग गए.

पर एक बार फंसने के बाद निकलना आसान नहीं था. जो भी जाने के लिए उठ रहा था उसे गाना सुनाना पड़ रहा था. मेरी भी बारी आयी तो मेरे मुंह से निकल गया कि हम लोगों ने इतना सुना दिया है कुछ आप लोग भी सुनाएँ. इस पर वो थोडा घबराएं. पर कहा कि पहले मैं सुनाऊं फिर वे गायेंगे. मैंने गाना गाया - 'चंदा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे ...' इतना सुनना था कि उन चारों ने गाना शुरू किया - ' बहना ओ बहना तेरी डोली मैं सजाऊंगा ...' और गाते-गाते भाग खड़े हुए. फिर तो हम लोगों कि जो हंसी छूटी कि पूछिए मत. यहाँ तक कि अभी भी याद कर के हंस रही हूँ. कॉलेज का पहला दिन इतना मजेदार होगा मैंने तो सोचा नहीं था.

सोमवार, 13 जुलाई 2009

सितारा देवी, भूपेन हजारिका को संगीत अकादेमी फेलोशिप

जानी-मानी कत्थक नृत्यागना सितारा देवी और मशहूर संगीतकार भूपेन हजारिका को इस वर्ष के प्रतिष्ठित संगीत अकादेमी फेलोशिप से सम्मानित किया जायेगा। भारत के राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल १४ जुलाई को एक विशेष समारोह में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में इनके साथ-साथ कला और संस्कृति क्षेत्र की अन्य कई मशहूर हस्तियों को सम्मानित करेंगी. विस्त्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर जाएँ:
http://fachcha.com/youngistan/sangeet-natak-akademi-fellowship-for-sitara-devi-bhupen-hazarika/

रविवार, 12 जुलाई 2009

तो समलैंगिकता के नाम पर लूट की तैयारी है

(समलैंगिकता के बहाने-II)
इनदिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिलों का मौसम चल रहा है। 'युवा' की ओर से कॉलेज में दाखिले के लिए कुछ छात्रों से जब समलैंगिकता पर राय जानने की कोशिश की गयी तो अधिकाँश तो इस मामले पर चर्चा करने से बचते रहे पर कुछ छात्रों ने बड़ा ही अजीब सा सवाल खडा कर दिया. हिन्दू कॉलेज में दाखिले के लिए आये एक छात्र ने उल्टे पूछ डाला कि वह कॉलेज में हॉस्टल चाहता है वह भी सिंगल कमरे वाला ताकि उसे कोई समलैंगिक कि श्रेणी में नहीं डाले. यह बड़ा ही अजीब किस्म का सवाल था. पर सच्चाई यही है कि इस ताजा फैसले से सिंगल सेट के कमरों की मांग एकाएक बढ़ गयी है, सिर्फ इसलिए कि दूसरे दोस्त उसे इस श्रेणी में डालकर चिढाने न लगे.

यह सामाजिक संबंधों में अदालती फैसले के बाद रातों-रात आये बदलाव का परिचायक है। संबंधों को इस प्रकार परिभाषित कर दिया जाय कि एक सहपाठी दूसरे सहपाठी को शक की निगाह से देखने लगे यह आने वाले समय में खतरनाक बदलाव के संकेत हैं. परिवार के स्तर पर क्या होने वाला है इसका अभी अंदाजा लगाने में समाजशास्त्रियों को वक्त लग सकता है पर वैसे भी बिखरते परिवारों के युग में यह अधिकार एक बहुत बड़ा झटका है जिसे संभालना आसान काम नहीं होगा. वैसे भी भारतीय संयुक्त परिवार प्रगतिशील मध्यमवर्ग की प्रगति में रोड़ा बनता रहा है.

भारत में एकल परिवारों का उदय और विकास इस मध्यवर्ग के मदद से ही हुआ है। वर्ना उच्च स्तरीय या निम्न वर्गीय परिवार अभी भी संयुक्त परिवारों की थाती संभाले हुए हैं. कहने को यह मध्य वर्ग सबसे प्रगतिशील है पर सबसे स्वार्थी भी और उसके इस स्वार्थपरता व तथाकथित प्रगतिशीलता का फायदा सबसे ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उठा रही हैं. (यही काम पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी का भी था ब्रिटिश राज में). क्योंकि जितना ज्यादा आप अकेले होंगे उतना ही ज्यादा आपकी निर्भरता इन कम्पनियों, इनकी सेवाओं और इनके उत्पादों पर होगी. तब आप अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा इन्हें देंगे जो कि आप अब तक बैंकों में बचत करते रहें हैं. परिवार में रहते हुए यह खुली लूट संभव नहीं है. इसलिए अधिक आमदनी के लिए इन परिवारों को तोड़ना बेहद जरूरी है क्योंकि एकल परिवार भी अब संयुक्त परिवारों की तरह (बदलते समय और बुजुर्गों की सूझ-बूझ की वजह से) ही मजबूत हो चुके हैं. अगर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों व उनकी सेवाओं का आप हिसाब लगाएं तो आपको खुद समझ में आ जाएगा की आपके वेतन का कितना बड़ा हिस्सा इनको नियमित रूप से चला जाता है. और, यही कंपनियाँ इन गे परेड के लिए पैसे देती है, सेमीनार करवाती हैं और इनका मीडिया में भरपूर प्रसार हो सके इसकी भी व्यवस्था करती है.इन स्थितियों में परिवार और अन्ततः समाज को बचाए रखने की जिम्मेदारी किसकी बनती है इसका निर्णय मैं आप पाठकों पर छोड़ता हूँ.

जहां तक मनोविज्ञान की बात है तो मैंने समाजशास्त्र भी पढ़ा है और मनोविज्ञान का भी विद्यार्थी रहा हूँ। इस नाते मुझे पता है कि हर मानवीय क्रिया की एक न्यायसंगत और तार्किक व्याख्या भी होती है. यहाँ तक की बलात्कार, हत्या और दंगे जैसे कृत्यों की भी. अगर ये भी ज्यादा संख्या में होने लगे और कानूनी व्यवस्था इसे संभालने में सफल न हो पाए तो कानून को इसे सिर्फ इसलिए मान्यता दे देना चाहिए कि अब इसे ज्यादा संख्या में लोग करने लगे हैं? कानूनविदों को इस पर विचार करना चाहिए.

जहाँ तक समलैंगिकों की बात है तो इनमें अधिकाँश वे लोग हैं जो यौनातिरेकता से उब चुके हैं और यौन आनंद के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार खड़े हैं। और, ऐसे लोगों में अधिसंख्य ऐसे हैं जिनके पास प्राकृतिक यौन सुख के एक नहीं अनेक साधन उपलब्ध हैं. जो लोग कामसूत्र और अजंता, खजुराहो का उदाहरण देते हैं वे शायद यह भूल जाते हैं कि इनमें समलैंगिकों का कोई स्थान नहीं है. क्षेपक या अपवाद की बात अलग है. और, इन सबकी रचना तब हुई थी जब भारत का स्वर्णिम काल था और इनके रचना काल के बाद से ही तत्कालीन साम्राज्य के पतन की भी शुरुआत हो गयी थी.

अगर इस हिसाब से देखें तो इस मामले में हम स्वर्ण युग?? में जी रहे हैं क्योंकि अमेरिका, यूरोप जैसी महाशक्तियां अभी मंदी के दौर से गुजर रही हैं और भारत ने फिलहाल अपने को बेहतर स्थिति में बनाए रखा है. आने वाला साल और भी बेहतर होगा क्योंकि दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम होने वाले हैं. यह दिल्ली के लिए कम से कम इस दशक में सबसे बेहतर साल होगा. अब इतिहास के अनुसार चलें तो इस एक-डेढ़ साल में हम ऐसे विकसित कामुक समाज की रचना कर चुके होंगे जिसमें किसी भी प्रकार के यौन सुख पर किसी प्रकार की बाधा नहीं होगी क्योंकि हमें विदेशियों को खुश रखना है. चाहे वे गे या लेस्बियन का यौन सुख हो या फिर अन्य प्रकार के यौनाचार. इस स्वर्णिम अवसर पर सब कुछ उपलब्ध कराने की व्यवस्था इस फैसले के बहाने होने लगी है. अब इससे चाहे देश में ऐड्स फैले या फिर देश कि संस्कृति नष्ट हो. पैसा बनाने वाले इससे पैसा बनाने का रास्ता तैयार कर चुके हैं. मीडिया, कोर्ट इनके लिए औजार भर हैं वह भी इसलिए की आम जनता या हम अब भी इसपर बात करने से कतरा रहे हैं. और, हमारी कमजोरी को उन्होंने समझ लिया है बहुत ही अच्छी तरह.

शनिवार, 11 जुलाई 2009

समलैंगिकता के बहाने




चंदन शर्मा

सोचा था इस विषय पर नहीं लिखूंगा. पर जब मोहल्ले में आग लगी हो तो आपके सामने बस दो ही विकल्प बचते हैं- या तो आग बुझाने में मदद की जाय या फिर अपने घर को जलते देखने के लिए तैयार रहा जाय. यह आशा करना कि मोहल्ला जलने के बाद भी आग से मेरा घर सुरक्षित रह जाएगा, ऐसा सोचना बेबकूफी के अलावा और कुछ नहीं है. और, अभी वक्त ऐसा नहीं आया है कि मूक दर्शक बनकर घर जलते देखते रहा जाय.

समलैंगिकता को मिले कानूनी अधिकार पर बहस में पता नहीं कितने हजार क्विंटल अखबारी कागज़ और टेलीविजन के कितने घंटे जाया हो चुके होंगे पर मित्रों के इतने फ़ोन और मेल आये कि इस मुद्दे पर लिखने से रोकना मुश्किल हो गया. वैसे कानूनी पक्ष के बारे में दिनेश राय द्विवेदी जैसे विद्वानों ने काफी कुछ लिखा है इसलिए इसपर विस्तार में ना जाते हुए सिर्फ इतना ही कहूँगा कि भारत के पूर्व अत्तोर्नी जनरल सोली सोराबजी ने व्यक्तिगत निजता के समर्थन के साथ धारा ३७७ के दंडात्मक प्रावधानों को भी बनाए रखने कि वकालत की है.

पर सवाल क्या सिर्फ व्यक्तिगत निजता भर से जुड़ा हुआ है. कतई नहीं. अगर ऐसा होता तो यह मामला कोर्ट में चुपचाप आता और एक सामान्य खबर या अनजान फैसला बन कर रह जाता. पर जिस तरह से तैयारी कर के पूरे देश में 'तथाकथित समलैंगिकों' के परेड निकाले गए और लाखों-करोडों रूपये इसके नाम पर फूंके गए वह कुछ और ही इशारा करता है. और, इन 'तथाकथित समलैंगिकों' की परेड मैंने भी कवर की है. अस्सी फीसदी भीड़ इसमें किन्नरों की होती है जो निश्चित रूप से भाड़े पर लाए जाते हैं ताकि मीडिया पर कवरेज़ का दबाव बनाया जा सके. और, हमारे देश का कोर्ट और मीडिया? जो मुजफ्फरनगर, मेरठ जैसे शहरों में युवाओं के प्रेम-प्रसंगों के कारण हर महीने हो रही हत्याओं का हिसाब नहीं रख पाता वह समलैंगिकों के अधिकार के लिए तुंरत आगे आ जाता है क्योंकि इससे 'बड़े नाम' जुड़े हुए हैं. ..

दुर्भाग्य से अधिसंख्य जनता जो समलैंगिकता के विरोध में है वह भी कमजोर दिखती है क्योंकि अव्वल तो वह 'कुतर्की' नहीं है और दूसरा इन सब बातों पर चर्चा करने से वह कतराती है। पर अगर इससे बचा जाएगा तो कल इसकी लपटें आप के घर तक नहीं पहुंचेगी इस भरम में कतई नहीं रहना चाहिए. यह समलैंगिकों बनाम अन्य की लड़ाई नहीं है बल्कि समाज और परिवार के अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई है. और, माफ़ करें कोर्ट, जो सिर्फ प्रमाणों और महज वकीलों के तर्क पर फैसले सुनाता है वह आपके और लिए और आपके समाज के लिए लडेगा यह उम्मीद करना बेमानी है. (जारी)

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

हमलों के बाद आर्थिक सेहत के लिए ऑस्ट्रेलिया छवि सुधार में

चंदन शर्मा

इन दिनों एक ऑस्ट्रेलिया का एक प्रतिनिधि मंडल भारत के दौरे पर आया हुआ है. शिक्षा से सम्बंधित यह प्रतिनिधि मंडल भारत में ऑस्ट्रेलिया की छवि सुधार करने में लगा हुआ है और उन्ही बातों को दुहरा रहा है जिसकी चर्चा हम इस मंच पर पहले भी कर चुके हैं (देखें: ऑस्ट्रेलिया में नहीं है रंगभेद और ऑस्ट्रेलिया से सम्बंधित अन्य लेख व खबरें). इस प्रतिनिधिमंडल ने कल मीडिया को कहा कि वहां भारतीयों पर हो रहे हमले रंगभेदी न होकर अवसरवादी और लूट-पाट की नीयत से किये गए हैं.
ऑस्ट्रेलिया के शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कॉलिन वाल्टर्स के अनुसार ऑस्ट्रेलिया भारतीयों के लिए 'सुरक्षित' देश है और हमलों को रोकने के लिए कई कानूनी प्रावधान भी किये गए हैं. उनका यह भी तर्क है कि इस देश में एक लाख से ज्यादा भारतीय बसते हैं. वाल्टर्स साहब कि बात से चलिए सहमत भी हो लेते हैं पर सच्चाई यह है कि भारतीयों पर हमले रुक नहीं रहे हैं. मान भी लिया जाय कि यह सब लूट-पाट के लिए किया जा रहा है तो भी भारतीय छात्र ही इसके निशाने पर क्यों हैं. कहीं न कहीं रंगभेदी मानसिकता तो काम कर ही रही है. और, भारत जैसे देश में ऑस्ट्रेलिया को छवि सुधार कि जरूरत क्या है?
दरअसल सारा खेल यहाँ पैसों का है. ऑस्ट्रेलिया के शिक्षा के बजट का एक बड़ा हिस्सा भारतीय छात्रों से आता है. आंकडों में देखें तो करीब ८००००० छात्र वहां पढ़ने के लिए जाते हैं जिनका सालाना खर्चा औसतन छः लाख से १२ लाख प्रतिवर्ष होता है. साथ ही उनसे वसूली जाने वाली फीस भी वहां के स्थानीय छात्रों से करीब चार गुनी होती है. यानी कि करीब ५००० से ६००० करोड़ की रकम भारतीय खुशी-खुशी ऑस्ट्रेलिया की झोली में शिक्षा के नाम पर डालते रहे हैं. जाहिर है कि हाल के हमलों से ऑस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या में कमी आयी है जो ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक सेहत के लिए नुकसानदेह है. सारी कवायद इसे संभालने के लिए ही है. फिर यह मौसम दाखिलों का मौसम है अगर इसमें चूकें तो पूरा साल ही खाली जाएगा. सारी छवि सुधार के पीछे का सत्य यही है - कम से कम फिलहाल.

रविवार, 5 जुलाई 2009

तुम

तुम
होती हो पास
जब खिलते हैं फूल महुआ के
खुशबू भीनी-भीनी सी बिखर जाती है
फिजां में
लगता है महुआ का खुमार
सर चढ़ कर बोलेगा
तभी आना होता है तुम्हारा
पत्तों की सरसराहट से छुप कर
ठीक वैसे ही
जैसे चाँद छुप जाता है बादलों की ओट में
इन दिनों शर्म के मारे
पर चांदनी उसकी छुपती नहीं

तुम
होती हो मेरे पास
जब चलती है हवा
इन चिपचिपाती गर्मियों में
ठण्ड का अहसास देती हुई
रेगिस्तान में ज्यों चल पड़े
बर्फीली बयार

तुम
होती हो पास
जब भरी भीड़ में
होता हूँ तनहा
किसी समंदर के लाइट पोस्ट के मानिंद
लहरों के शोर में तनहा, अडोल,
अकेले

चुपचाप तुम्हारा यूँ दबे पाँव आना
न जाना छोड़कर
तनहा
कहीं

यूँ लगता है
खुशबू बस गयी हो
हवा में
या
घुल गया हो रंग फूलों में
कुछ नया सा
कुछ अपना सा
कि जुदा करना मुश्किल हो

बुधवार, 1 जुलाई 2009

थोड़ा लिबरहान -सिबरहान भी

अरे ई का! ई लिबरहान तो गजबे कर दिया. हम तो सोच-सोच के एकदम तेंसनिय गए थे की अबकी ई पार्लियामेन्ट में क्या करेंगे. ई कल से शुरू होगा संसद तो कुछ मुद्दा चाहिए न. आ ई अखबारवाला सब केत्ता बड़ा-बड़ा छापा है जैसे की एकदम, उ का कहते हैं, एक्सक्लूसिव हो, नेताजी आज एकदम उछल रहे थे आज सुबह-सुबह अखबार पढ़ के.


एकदम से हांक लगाई, अरे, पी ऐ साब को बुलाओ. अब बेचारे पी ऐ को क्या मालूम. घुसते ही डाट पड़ी. अरे बबुआ जी ई इत्ता बड़ा ख़बर आया आ हमको बताये भी नही. बबुआ जी ने जान बचाने की कोशिश की – ई ख़बर तो टीवी में कल्हे से चल रहा है. ई तो सब पुराना बात है. नेताजी बिदके – ई तुम्ही को मालूम है की क्या पुराना बात है और क्या नया? जानते तो पी ऐ ही बने रहते! आ टीवी के ख़बर पर तो परतिकिरिया दिया जाता है न. एक्शन थोड़े लिया जाता है. जाइए सब को बुलाएये. आ सबको फ़ोन लगाकर हमको भी बात कराइए. और हाँ ई वातानुकूलन यंत्र, क्या कहते हैं, अ सी भी बंद कर के जाइए. दो दिन से सोचते सोचते पाँच किलो पसीना निकल गया है. कोई काम का नही है ऐ सी.

अखबार dekhne से पहले नेताजी को लग रहा था की इस बार पार्लियामेन्ट के गेट पर खड़ा होके ई मानसून का बारिश देखने और ई बंगाली बाबु के बजट पर ताली बजाने के अलावा और कोनो काम ही नही रहेगा. अब कम से कम उ ‘लोहा पुरूष’ को गरिया के पिघ्लायेंगे तो. अब नेताजी तो चिंता में निमग्न थे तो फ़ोन बज उठा. लगता है बबुआजी ने फ़ोन लगा दिया. नेताजी सही थे. उधर दूसरी तरफ़ पार्टी का ही आदमी था. नेताजी ने तुंरत फरमान जारी किया ‘सुनिए, अब जब तक बजट नही आ जाता है ई लिबरहान की भट्टी में फूँक मारना है. ई भट्टी पुराना हो गया है. थोड़ा जोड़ लगायेंगे तो नया हो जाएगा. अबकी सब लोहा पिघला के ही दम लेना है. बजट में ताली-गाली तो सभे करेगा. इसमें लीड लेना है, समझे.

शनिवार, 27 जून 2009

अनिल विल्सन, सेंट स्टीफेंस और हिन्दी


चंदन शर्मा
अनिल विल्सन और हिन्दी! कुछ अजीब सा लगता है.पर सेंट स्टीफेंस के पूर्व प्रिंसिपल का नाम इस कॉलेज के साथ यूँ चस्पा हो चुका है कि कोई उन्हें इससे अलग कर देखने की सोच भी नहीं सकता है. यह भी नही कि इतनी जल्दी उन्हें श्रधांजलि देने का वक्त आ जाएगा?

मेरा अनिल विल्सन से मिलना ज्यादा नही रहा, सिवाय एक बार उनके साथ बैठकर चाय पीने और कुछ छिटपुट मुलाकातों को छोड़ कर. करीब आठ या नौ साल पहले. उनदिनों मैं हिन्दी अखबार अमर उजाला के लिए काम करता था और मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय की रिपोर्टिंग का काम सौंपा गया था.

चूँकि, दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले का मौसम था इसलिए करीब हर दिन दो-तीन कॉलेज का चक्कर लगाना होता था, खबरों के लिए. सेंट स्टीफेंस में भी इसी सिलसिले में जाना हुआ था. वैसे अंगरेजी के रिपोर्टरों को भी सेंट स्टीफेंस से ख़बर निकालने में नानी याद आती थी तो हिन्दी वाले का क्या कहना. पर हिम्मत कर के कॉलेज चला ही गया. जब प्रिंसिपल (अनिल विल्सन) के कार्यालय में पहुंचा तो मुझे बताया गया कि कुछ अंगरेजी के रिपोर्टर अभी-अभी आकर गए हैं पर ‘सर’ ने मिलने से मना कर दिया है. फ़िर भी रिपोर्टर की आदत से मजबूर, मैंने अपना विजिटिंग कार्ड देकर कहा कि इसे दीजिये मन कर देंगे तो वापस चला जाउंगा. आर्श्चय तो तब हुआ की अन्दर से दो मिनट में ही बुलावा आ गया.

“तो आप ही चंदन हैं”, यह उनका पहला वाक्य था. मैं चौंका की एक खांटी अंग्रेजीपरस्त कॉलेज में ये एक हिंदीवाले को कैसे जानते हैं? पर अभी कुछ और झटके लगने बाकी थे. यूनिवर्सिटी के बारे में आपकी रिपोर्ट मैं देखता हूँ, लगभग हर दिन! उनका दूसरा वाक्य था. पर उस दिन उन्होंने दाखिले पर बात करने से साफ़ मना कर दिया यह कहते हुए की अखबार में छपने वाली कोई बात मैं नहीं करूंगा. पर उसके बाद करीब आधे घंटे तक यह मुलाक़ात चली और उन्होंने चाय भी पिलाई. उन्होंने मॉस-मीडिया के बारे में एक नया कोर्स शुरू करने की योजना के बारे में भी बताया.

बातों ही बातों में मैंने उनसे हिन्दी का पाठ्यक्रम कॉलेज में नही होने की बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर नही लिखने का वादा करो तभी इस पर बात करूंगा. मेरे हामी भरने पर उन्होंने बताया कि हिन्दी का पाठ्यक्रम वे यहाँ लाना चाहते हैं पर कई दिक्कतें और दबाव हैं. कॉलेज की भलाई के लिए वे इसका खुलासा नहीं कर सकते हैं पर उनकी इच्छा है की हिन्दी यहाँ भी शुरू हो.

खैर, इस आधे घंटे की मुलाक़ात के बाद उनसे एक-दो बार यूनिवर्सिटी के कार्यक्रमों में उनसे मुलाक़ात हुई पर बेहद संक्षिप्त. वैसे भी कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति दुर्लभ होती थी दूसरे अधिकारियों या प्रिंसिपल के मुकाबले. उसके कुछ समय के बाद विवादों के बीच कॉलेज से विदाई की ख़बर आयी और हिमाचल विश्वविद्यालय के कुलपति बनने की भी. अपनी अखबारी व्यस्तता और शिक्षा की बजाय राजनीति का खबरी बनने के कारण और कुछ अपने आलस्य के कारण भी उनसे बात नही हो पाई. पर उनका हिन्दी के लिए दर्द… क्या स्टीफेंस सुनेगा?

गुरुवार, 25 जून 2009

प्रवासी भारतीय भी कूदे सरबजीत को बचाने की मुहिम में

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय सरबजीत को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद उसे बचाने की मुहीम में प्रवासी भारतीय भी कूद पड़े हैं. ‘फच्चा.कॉम’ के अनुसार एक प्रवासी द्वारा जारी किए गए ई-मेल में इस मुहीम के लिए पाकिस्तान के नीति निर्माताओं और वहां के राष्ट्रपति को लिखने की अपील की गयी है. इस ई-मेल को हम पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं.

Dear Friends,

Sub: MERCY APPEAL

Would you be kind enough to write your lawmaker and President of Pakistan to spare the life of an innocent person. he did not commit.
It is absolutely beyond the shadow of doubt that Sarabjit Singh is a victim of mistaken identity or framed being an Indian national who unknowingly walked across the border.and arrested by Pakistani Security forces.

Please support the mercy petition being filed by Ansar Burney. Your support might save an innocent person from being executed for the crimes
Address of Embassy of Pakistan:

3517 International Ct., NW
Washington, DC, 20008
(202) 243-6500


Thank you
Ramesh Gupta

मंगलवार, 23 जून 2009

हिन्दी से गायब हो सकता है 'ष'

हिन्दी के चाहने वालों के लिए एक ख़बर यह है की वर्तनी से अब 'ष' को हटाने की तैयारी हो गयी है. यांनी की हिन्दी वर्णमाला में आने वाले समय में तीन की बजाय दो ही स होंगे – स और श. राष्ट्रीय शक्षनिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसी ई आर टी) में यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. दूसरे शब्दों में कहें तो षष्ठ, षड्कों जैसे शब्द आने वाले समय में मूर्धन्य 'ष' की जगह तालव्य 'श' से लिखे जायेंगे.

अब यह कैसा लगेगा यह आप जाने पर एन सी ई आर टी ने हिन्दी की वर्तनी में कई बदलाव पहले से ही कर दिया है. और, व्यापक बदलाव पर केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय में काम चल रहा है. भाषाविदों की मानें तो लिपि और वर्तनी के मानक १९४२ में बनाए गए थे तब से अब तक मानकों में कोई बदलाव नही किया गया है और इसकी बेहद जरूरत है. भाषाविद महेंद्र कुमार के अनुसार मीडिया खासकर टेलीविजन के प्रसार से भाषा में कई बदलाव आ चुके हैं और इनको भाषा में समाहित करने की जरूरत है. उच्चारण के स्तर पर भी कई बदलाव हो चुके हैं. केंद्रीय हिन्दी निदेशालय भी इस पर काम कर रहा है.

अगर सब कुछ ठीक रहा तो कई और वर्ण की छुट्टी वर्णमाला से हो सकती है जिनका व्यापक उपयोग नही हो रहा है और जिनके बिना हिन्दी का काम यथावत चल सकता है. विद्वानों की राय में हिन्दी को इससे जहाँ सरल बनाने में मदद मिलेगी वहीं इससे हिन्दी और व्यापक भी होगी. यह अलग बात है की भाषा के स्तर पर आम हिन्दीभाषी इसे कितना स्वीकार कर पायेगा पर स्कूलों में पाठ्यक्रम में बदलाव से आने वाली पीढी के लिए हिन्दी का स्वरुप जरूर बदल जाएगा.

रविवार, 21 जून 2009

हिन्दी: आख़िर कहाँ चूकें हम

डॉक्टर महेंद्र एक जाने माने भाषाविद हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में लंबे समय तक शिक्षक रहे है. इन दिनों वे मिलर-फिशेर सिंड्रोम जैसी जटिल बीमारी से जूझ रहे हैं. पर इसके बावजूद उन्होंने हिन्दी के लिए अपना काम जारी रखा है. साथ ही स्कूलों के लिए उनका काम जारी है. इस मुश्किल समय में भी उन्होंने ‘युवा’ से हिन्दी के बारे में बातचीत की. पेश है मुख्या अंश:

कंप्यूटर या आई टी को तो रोक नही सकते है. पर यह सच्चाई है की हिन्दी में काम बहुत कम हुआ है इस (कंप्यूटर के) क्षेत्र में. भले ही अंगरेजी को हम कोसते रहें पर इन्टरनेट खोलिए तो अंगरेजी में आपको किसी भी विषय पर ढेर सारी सामग्री मिल जायेगी. भले ही सभी स्तरीय नही हों पर आप थोड़ा मेहनत करें तो अंगरेजी में नेट पर आपकी उम्मीद से ज्यादा मिल जाएगा.

सवाल यह है की आख़िर कहाँ चूकें हम. नेट पर हिन्दी में सामग्री की काफी कमी है. हिन्दी की पुस्तकें नेट पर नहीं के बराबर है. ब्लोग्स की बात छोडिये. सभी लोग ब्लॉग्गिंग नहीं करते हैं. पर कंप्यूटर का इस्तेमाल आज की नयी पीढी बहुतायत से करती है. उनके लिए कहाँ सामग्री है. नयी पुस्तकें आती हैं पर नेट पर शायद ही होती हैं. ऐसे में यह पीढी अंगरेजी की और भागेगी ही. भाषाविद होने के नाते कह सकता हूँ की रोमन देवनागरी से आसान लिपि है और इसमें काम करना कंप्यूटर पर और भी आसान है. हांलाकि देवनागरी ख़त्म होने का संकट नही है क्योंकि इसका इतिहास ६००० साल पुराना है. पर तकनीकी विकास में तेजी बहुत जरूरी है.

जहाँ तक लिपि की बात है तो लिपि का संकट तो है. मेरी बेटी कनाडा में रहती है. उसे हिन्दी बोलने और लिखने में परेशानी नही है. पर उसकी छोटी बेटी को है. वह हिन्दी समझ तो लेती है पर पढ़ और लिख नही पाती है. मैं जब वहां गया था तो उसे मैंने काफी कुछ पढाया था. पर कनाडा वाली स्थिति अभी भारत में आने की संभावना नही है.

दिक्कत तो यह है की हिन्दी में नाम और पैसा सभी तुंरत कमाना चाहते हैं पर काम करने वालों का अभाव है. ‘हैरी पॉटर’ का हिन्दी संस्करण लोकप्रिय नही हो पाया क्योंकि हिन्दी में कोई ढंग का अनुवादक उन्हें लंबे समय तक नही मिल पाया. दिल्ली विश्विद्यालय में ही नही देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों में भाषा-विज्ञानं पढाने वालों का अभाव है. दूसरे विषयों के विशेषज्ञ हिन्दी में भाषा-विज्ञानं पढ़ा रहे हैं. यही हालत काव्य शास्त्र, छायावाद में भी है.

कंप्यूटर और हिन्दी में भी तकनीकी किस्म की दिक्कतें कई बार हिन्दी वालों की कृपा से भी है. मुरली मनोहर जोशी जी मानव संसाधन विकास मंत्री बन कर आए पर उन्होंने भी हिन्दी के लिए कुछ नही किया. जबकि वे ख़ुद हिन्दी के हैं. ज्योतिष लेकर आ गए. नामवर सिंह का अमेरिका का विश्व हिन्दी सम्मलेन का बहिष्कार तो आप जानते ही हैं. रही-सही कसार हमारी राजनीतिक व्यवस्था कर देती है. नही तो टेक्नोलॉजी के स्तर पर हिन्दी का कब ही विकास हो चुका होता. कोई कारण नही है की भारत, जिसने दुनिया भर में बेहतरीन कंप्यूटर इंजीनीयर दिए, ख़ुद हिन्दी के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित नही कर सका. पर यह सब तो चलता रहता है. असल बात यह है की हम हिन्दी वालों ने क्या किया है.

दरअसल भाषा के विकास के लिए स्कूल के स्तर पर काम और व्यापक सुधार जरूरी है. स्कूलों में हिन्दी के शिक्षण का स्तर सुधर जाए तो हिन्दी का संकट काफी हद तक ख़ुद ही कम हो जाएगा. मैं ख़ुद भी इनदिनों कई स्कूलों में जा रहा हूँ. तकनीकी स्तर पर अगर फॉण्ट की समस्या का निवारण हो जाता है तो हिन्दी को अंगरेजी से आगे निकलने में वक्त नही लगेगा. पर यह काम जरूरी है भले ही इसमें कुछ वक्त लगेगा. दूसरा अगर हिन्दी में काम करने वाले प्रतिबद्ध होकर काम करते रहे तो भविष्य में कोई मुश्किल नही होगी. (जारी)

बुधवार, 17 जून 2009

देवनागरी के ख़त्म होने का खतरा तो है: नित्यानंद तिवारी


हिन्दी अकादमी के सदस्य और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर नित्यानंद तिवारी न सिर्फ़ हिन्दी के आलोचक और विद्वान है बल्कि उन्होंने उस दौर को काफी नजदीक से देखा है jise हिन्दी के लिए सूचना तकनीक का संक्रमण काल कहा जाता है. ‘युवा’ से एक लम्बी बातचीत में उन्होंने इस तकनीक और हिन्दी भाषा पर इससे पड़ रहे प्रभावों और आज की रचनात्मकता के बारे में विस्तार से चर्चा की है. उनके विचार हम किस्तों में पेश कर रहे हैं. प्रस्तुत है इसकी पहली किस्त:

हिन्दी के जाने-माने नाम और मेरे मित्र मैनैजर पाण्डेय जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से रिटायर होने वाले थे तो मैं उनके घर गया था उनकी सेवानिवृत्ति से करीब छः- सात महीने पूर्व. तब मैंने उनके यहाँ कंप्यूटर रखा देखा था. पूछने पर उन्होंने कहा कि चूंकि सब (शिक्षकों) के यहाँ कंप्यूटर लगा दिया गया है इसीलिए यहाँ भी इसे लगा दिया है. पर यह मेरे किसी काम का नहीं है.
इस घटना के काफी दिन हो चुके हैं पर मुझे लगता है की कंप्यूटर पर काम करना आना चाहिए. हिन्दी देश में सब जगह बोली जाने वाली भाषा है इसलिए हिन्दी में कंप्यूटर में काम जानना जरूरी है. हिन्दी का सूचना तकनीक से जुडाव जरूरी है. अब इस उम्र में इस काम को मैं सीख नही पाया और शायद इसकी जरूरत भी अब नही है. लेकिन इसमें काम करने के फायदे तो हैं. कागज़ पर माथा पच्ची से बचने के अलावे कई और सुविधाएं हैं. जैसे आप किसी रचना को स्टोर कर सकते हैं. उसमे बिना परेशानी के परिवर्तन कर सकते हैं आदि.

पर सुविधा ऐसी चीज है जो सब भुला देती है. जो स्थिति है उसमें तो देवनागरी ख़त्म हो जाने का खतरा तो है. जब रोमन में हिन्दी लिखने की सुविधा होगी तो लोग देवनागरी पर क्यो मेहनत करेंगे? मैं अपना उदाहरण बताता हूँ. मैं ख़ुद अच्छी भोजपुरी बोल लेता हूँ पर मेरे बच्चे नही बोल पाते हैं. उन्हें मैं इसके लिए दबाव नही दे सकता हूँ क्योंकि उन्हें अब इसकी जरूरत भी नही है. यह (भोजपुरी) तो दिल्ली में संपर्क भाषा नही है. पर हिन्दी तो दैनिक व्यवहार की भाषा है और उसी में कंप्यूटर पर काम करने में दिक्कत बनी हुई है. अगर इस स्थिति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सरकारी सरंक्षण प्राप्त है तब तो बहुत मुश्किल है की स्थिति में सुधर हो पायेगा. हिन्दी का इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है. हिन्दी भाषा में पढने-लिखने वाले लोग हैं और यह उनको अयोग्य बनाने की कोशिश है.

दरअसल भाषा आपका कमिटमेंट है और लिपि शब्द लिखने का एक तरीका है. यह वास्तविकता है और हमारे पहचान का एक हिस्सा भी. लिपि को बचाने के लिए कमिटमेंट या इमोशन होना चाहिए. बल्कि मैं तो कहता हूँ की कमिटमेंट और इमोशन दोनों होना चाहिए. कहा जा सकता है की लिपि बाहरी है. हमारे शरीर का रंग भी बाहरी है. पर क्या सचमुच यह बाहरी है. रंग बाहर की चीज नही है. यह तो रक्त की आंतरिक विशेषता है जो बाहर हमारे त्वचा के रंग के रूप में दिखती है. यह हमारे स्वस्थ्य और व्यक्तित्व का भी परिचायक है. ठीक लिपि भी इससे जुदा नही है. यह भी हमारे सामाजिक और रचनात्मक व्यक्तित्व का हिस्सा है. इसे हम अलग कर देख नही सकते हैं.

जहाँ तक कंप्यूटर पर रोमन में हिन्दी लिखी जाने की सुविधा (यूनीकोड) से हिन्दी के विकास की बात है तो यह दुधारी तलवार की तरह है. इससे हिन्दी का विकास तो होगा पर लिपि के रूप में देवनागरी ख़त्म भी हो जायेगी. अगर इसे बचाना है तो कमिटमेंट और इमोशन के साथ टेक्नोलॉजी में पर्याप्त विकास की जरूरत है वह भी इमानदारी से . नही तो बहाव कभी पीछे नहीं जाता है. हमेशा आगे जाता है और इसमें देवनागरी के मिटने का खतरा बरकरार है… (जारी).

रविवार, 14 जून 2009

हिन्दी पर खतरे और लुप्त होती देवनागरी

चंदन शर्मा

जय हो! हिन्दी का काफी विकास हुआ है. इतना कि ‘जय हो’ ऑक्सफोर्ड का दस लाखवां शब्द बनते-बनते रह गया. इतना कि आज हिन्दी में स्नातक और परा स्नातक करने वालों के लिए शिक्षण के अलावा रोजगार पाने के कई विकल्प हैं. इतना कि अब भारत में कहीं भी आप हिन्दी में काम चला सकते हैं. यहाँ तक कि बड़े-बड़े कारपोरेट कंपनियों की बोर्ड मीटिंगों में भी अंगरेजी के साथ-साथ हिन्दी में भी विचार-विमर्श होने लगा है, भले ही घुसपैठिये के रूप में. चलिए हम भी इस पर थोडी देर के लिए खुश हो लेते हैं.

पर यह खुशी काफूर हो जाती है जब हम हिन्दी में कंप्यूटर पर काम करना चाहते हैं. सबसे पहली समस्या का सामना तो की-बोर्ड के साथ ही हो जाता है कि हर फॉण्ट के साथ लोगों को की-बोर्ड भी सीखना पड़ता है. हिन्दी भाषी या हिन्दी प्रेमी के लिए इससे तकलीफदेह बात और कुछ नही हो सकती है कि कंप्यूटर के इस युग में भी हिन्दी के लिए फॉण्ट और की-बोर्ड की लड़ाई अभी तक चल रही है. अभी तक कोई सार्वभौमिक और सर्वमान्य की-बोर्ड नही विकसित हो पाया है जिसे करने पर किसी भी हिन्दी फॉण्ट में टाइप किया जा सके. अंगरेजी के साथ ऐसा नही है. अंगरेजी में फॉण्ट और की-बोर्ड का कोई झगडा नही है. आप चाहे दुनिया के किसी कोने में जाएँ आपको एक समान की-बोर्ड मिलेगा साथ ही उनपर टाइप करने के लिए चुने जा सकने वाले दर्जनों फोंट्स और उनकी विभिन्न रूप. पर हिन्दी में यह सुविधा आज तक उपलब्ध नही हो पाई है भले ही कंप्यूटर के आए पचास वर्ष से ज्यादा हो चुका है. हांलाकि कई कोशिशें हुई पर सभी अधूरे मन से. सरकार के तरफ़ से भी और निजी प्रयास भी हुए पर अंगरेजी वाली स्थिति हिन्दी में अभी दूर की कौडी है. कहने को तो आप हिन्दी के फॉण्ट को अपने लिए अनुकूल फॉण्ट में परिवर्तित कर सकते हैं. पर इसके लिए समय लगाने के अलावा प्रयास भी करना पड़ता है.

दूसरी समस्या हिन्दी के साथ है कि किसी दूसरे के कंप्यूटर पर यह दिखता नही है अगर उसने ख़ास सॉफ्टवेर डाउनलोड नही किया हो. फॉण्ट की तरह ही यह एक ऐसी समस्या है जो हिन्दी को कंप्यूटर पर विकसित उस गति से नही होने दे रही है जो गति अंगरेजी की है. कहने को तो गूगल की कृपा से लोगों को रोमन में हिन्दी टाइप करने की सुविधा मिल गयी है पर यह निश्चित मानिए की यह सुविधा देवनागरी जानने वाले हिन्दीप्रेमियों के लिए नही है. उससे ज्यादा यह उन अंगरेजी प्रेमियों की समस्या हल करता है जिन्हें देवनागरी में काम करने में कठिनाई होती है. वैसे भी रोमन लिपि से लिप्यांतर कर के आप त्रुटिरहित हिन्दी नही लिख सकते हैं.

कहने को तो यह भी हिन्दी का विकास है. पर इस बहाने हिन्दी का लोप भी हो रहा है. कम से कम कंप्यूटर की दुनिया से. अभी नही तो दो-तीन दशकों में. ठीक संस्कृत की तरह. आप पूछ सकते हैं की मेरी इस शंका का कारण क्या है? दरअसल नए जमाने में किसी भी भाषा के कम से कम चार मजबूत स्तंभ होते है – १. लोक संपर्क का मध्यम होना, २.भाषा का सुदृढ़ और व्यापक आधार वाला व्याकरण, ३. रोजी-रोटी कमाने के सन्दर्भ में इसकी स्वीकार्यता और ४. इन सबसे बढ़कर कंप्यूटर के इस युग में भाषा का सूचना तकनीक से बेहतर तालमेल. हिन्दी में ऊपर के तीन तत्व तो हैं पर चौथा नया तत्व अभी भी आधे- अधूरे रूप में है. व्याकरण वाला आधार भी थोड़ा दरकने लगा है. हिन्दी में हिज्जे की त्रुटियाँ अब जितने व्यापक रूप में दीखतीं हैं वह अपने-आप में खतरे की घंटी है. कहने को भाषा का निर्माण लोगो से होता है और व्याकरण बाद में आता है. पर इतने व्यापक लेवल पर अशुद्धियों की अनुमति कहीं नही है. जहाँ तक रोजी-रोटी का सवाल है अंगरेजी और हिन्दी का भेद कायम है. कुछ अपवाद हो सकते हैं.

इस भेद का लेवल क्या है इसे दिल्ली विश्वविद्यालय में इन दिनों चल रही प्रवेश प्रक्रिया से समझें की जहाँ हिन्दी और अन्य विषयों में प्रवेश अंकों के आधार पर होता है वहीं अंगरेजी में प्रवेश के लिए अधिकाँश कालेजों में प्रवेश परीक्षा होती है. हांलांकि इसका मतलब यह भी लगाया जा सकता है की केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम दिल्ली विश्वविद्यालय को भाता नही है या उसमें कोई खामी है. या फिर, अंग्रेजी की शिक्षा देने वाले अभी भी अपने-आप को नस्लवाद या अभिजात्यवाद के दायरे से मुक्त नही कर पाये हैं. खैर यह विषयांतर है और इस पर कभी और चर्चा करेंगे.

फिलहाल हम देवनागरी के लोप होने और हिन्दी पर मंडराते खतरे की बात कर रहे थे. अगर कंप्यूटर पर देवनागरी का यही हाल रहा तो हिन्दी बोली और पढ़ी जाने वाली भाषा तो होगी पर लिखी जाने वाली नही. ठीक फ्रेंच की तरह. पर यहाँ याद रखिये की भाषा के रूप में फ्रेंच को ऐसी कई सुविधाएं मिली हुई हैं जो हिन्दी के पास नही है. ऐसे में हिन्दी सबसे पहले आने वाली पीढी से गायब होगी, जो कि कंप्यूटर से पूरी तरह से जुरा हुआ है. याद रखें की आज जो भाषा कंप्यूटर से जुडी हुई नही है, वह धीरे-धीरे नष्ट हो रही है भले ही उसका एक व्याकरण हो और वह लोक संपर्क में हो. कंप्यूटर पर अंगरेजी का दबाव झेलना किसी भी भाषा के लिए आसान नही है भले ही वह करोडो में बोली जाती हो. हिन्दी के लिए तो और भी मुश्किल क्योंकि इस देश में हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार का इतिहास पुराना है और हिन्दी को श्रेष्ठ बनाने की बजाय इसे गिराने वालों की संख्या ज्यादा है कम से कम ऊँची कुर्सियों पर बैठे लोगों के बीच. ऐसे में इस ‘जय हो’ का मतलब क्या है?

रविवार, 7 जून 2009

ऑस्ट्रेलिया: हमलों में छुपा सच

चंदन शर्मा

ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों को लेकर मीडिया में काफी कुछ कहा और लिखा गया है. और, इसके कारण रंगभेद और नस्लवादी राजनीति और न जाने क्या-क्या कारण बताये गए. वैसे भी मीडिया की स्थिति भेडचाल वाली है. एक रिपोर्ट और बाकी बयानबाजी… सत्य क्या है न तो इस बारे में जानने की जैसे इच्छा है हमारे मीडिया में और न ही शायद इसकी फुर्सत, क्योंकि TRP, सर्कुलेशन के चक्कर में यह सब गौण हो जाते हैं. शायद यह भी भुला दिया जाता है की मीडिया ही देश में जनमत का निर्माण भी करता है.

संभवतया यही कारण था की जब ‘युवा’ ने ऑस्ट्रेलिया से उर्मी चक्रबर्ती का लेख ‘ऑस्ट्रेलिया में नहीं है रंगभेद’ प्रकाशित किया तो ब्लोग्गेर्र्स ही नही बल्कि मेरे कई दोस्त और जानने वाले भी मुझसे खफा हो गए की इतनी सारी मीडिया ग़लत नही हो सकती है. एक ने तो यहाँ तक सलाह दे डाली की इस लेख के काट में मुझे कुछ लिखना चाहिए. मेरे एक मीडिया के मित्र ने तो सीधे ओवेर्सीज मामलों के मंत्री व्यालार रवि से ही इस बारे में पूछ डाला की भारतीयों पर हमले के क्या कारण हो सकते हैं. धन्यवाद मंत्री जी का जिन्होंने स्वीकार किया की इन हमलों के पीछे रंगभेद से इतर भी कई कारण हो सकते हैं.

बाद में कई मीडिया घरानों ने अपने पत्रों में (जिनमें टाईम्स ऑफ़ इंडिया भी शामिल है) ने माना की इन हमलों के पीछे नस्लवाद से बढ़कर कई सामाजिक आर्थिक कारण शामिल हैं. (देखें टाईम्स ऑफ़ इंडिया की ०७ जून को प्रकाशित स्पेशल रिपोर्ट “It is hate, mate of just economics – अविजित घोष और If the world is shrinking, our horizons must broaden-वलीद अली). यह उल्लेख कर कोई शाबाशी लेने का प्रयास नही है बल्कि वास्तविकता को जानने और समझने की ईमानदार कोशिश भर है.
हमले के बारे में ऑस्ट्रेलिया की इतनी चर्चा है. हम क्यों नही अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन में भारतीयों पर हुए हमलों के बारे में सोचते हैं. दरअसल यह हमले भारत की दुनिया में निरंतर मजबूत होती जा रही स्थिति का भी परिचायक है. गांवों में एक कहावत है की अगर लोग आपको गली देने लगें या वैर भाव रखने लगें तो समझिये की आपकी स्थिति मजबूत हो रही है या आप सही में प्रगति कर रहे हैं. अगर इस कहावत पर विशवास किया जाए तो भारतीयों को न सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया बल्कि अन्य जगहों पर भी इसके लिए तैयार रहना होगा. नस्लवाद तो बहाना भर है. दिनेश द्विवेदी की टिप्पणी एकदम सटीक है की आर्थिक मंडी और बेरोजगारी के नाम पर नस्लवाद के समर्थक इस तरह के हमलों से अपने आप को जीवित रखे हुए हैं.

गुरुवार, 4 जून 2009

ऑस्ट्रेलिया में नही है रंगभेद


उर्मी चक्रवर्ती ऑस्ट्रेलिया से


उर्मी ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड में रहती हैं और शायरी पर अपना ब्लॉग 'गुलदस्ता-ऐ-शायरी' भी लिखतीं हैं। यह अनुभव उन्होंने 'युवा' के लिए विशेष रूप से लिखा है , जो कहीं यह भी बतलाता है की अगर एक उंगली आप दूसरों की तरफ़ दिखातें हैं तो बाकी की चार उंगलियाँ आपकी तरफ़ भी उठातीं हैं। इस का उद्देश्य न तो किसी को क्लीन चिट देना है न ही किसी पर दोष डालना है, बस कहीं हममें भी सुधार की गुंजाइश है , शायद यही इसका आशय है :


ऑस्ट्रेलिया में जो हंगामा हो रहा है काफी दिनों से उसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है! चूँकि मैं ख़ुद ऑस्ट्रेलिया में रहती हूँ इसलिए यहाँ के बारे में बहुत अच्छी तरह से बता सकती हूँ! दरअसल यहाँ पर जो स्टूडेंट्स पढने आते हैं वे ज्यादातर गुजराती और पंजाबी हैं! अब यहाँ पर तो एक ही भाषा चलती है और वो है अंग्रेजी इसके सिवा और किसी भाषा में बात नहीं की जा सकती! पर भारत से जो स्टूडेंट्स पड़ने आते है वो बस पर जब सवार होते हैं तो ज़ोर ज़ोर से पंजाबी और हिन्दी गाने सुनते हैं, रास्ते में निकलते हैं तो हिन्दी में बात करते हैं, अपने इंडियन ग्रुप में ही शामिल रहना चाहते हैं, किसी और के साथ बात नहीं करते, रात के अंधेरे में सुनसान सड़क से गुज़रते हैं कान में आईपॉड तो हाथ में मोबाइल और पॉकेट में ढेर सारा पैसा लिए। अगर ये सब करें तो फिर ऑस्ट्रेलिया में रहना मुश्किल है! हमें तो कभी कोई दिक्कत नहीं हुई और कभी भी इस बात का एहसास भी नहीं हुआ की ऑस्ट्रेलिया रेसिस्ट देश है! बल्कि मैं तो ये कहूँगी कि ऑस्ट्रेलिया सबसे उम्दा देश है जहाँ पर कोई भेद भाव नहीं है और उरोपीयन यूनियन अमेरिका या ब्रिटेन में तो रेसिस्म बहुत ज़्यादा है! जिस देश में जो भाषा चलती है उसी भाषा का प्रयोग करनी चाहिए! मैं तो Townsville में रहती हूँ जो की क्वींसलैंड स्टेट में पड़ता है और यहाँ कोई हंगामा नहीं है बिल्कुल सुरक्षित है!

बुधवार, 3 जून 2009

मैं तुम्हे लिखूंगा एक चिठ्ठी

रवीन्द्र दास दर्शन और संस्कृत के विद्वान होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी है. उनकी कवितायेँ भावपूर्ण होने के साथ मर्मस्पर्शी भी होती हैं. उनकी ऐसी ही एक कविता पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनके ‘अलक्षित’ से. रचना तो कुछ दिनों पूर्व की है पर भाव एकदम ताजे और दिल को छू जाने वाले:

तुम्हें चिट्ठी मैं लिखूंगा
जो हो फुर्सत तो पढ़ लेना
नहीं, मैं काह नहीं पाता जुबां से
बात मैं अपनी
कि मैं आकाश हो जाऊँ
अगर तुम हो गई धरती
तुम्हारी मरमरी बांहों को छू कर छिप कहीं पाऊँ
मुझे तकलीफ होती है तुझे जब फोन करता हूँ
कि गोया लाइन कटते ही
अकेला ही अकेला मैं
कभी फुर्सत बना कर
तुम जरा दो हर्फ़ लिख देना
उसीको बुत बनाकर मैं
कभी तो प्यार कर लूँगा
तुमें मेरी लिखावट में मेरे ज़ज्वात के चहरे
तेरे बोसा को जानेमन
कहीं कोई शरारत कर उठे
तो माफ़ कर देना
कि उनका हक छिना है
तो बगावत लाजिमी है
नहीं देना उन्हें बोसा
न उनका मन बढ़ाना तुम
अगर मिल जाए जो चिट्ठी
तो पलकें बंद कर लेना उसी सूरत में
चिट्ठी जरा हौले से सहलाना
जरा हौले से सहलाना
जरा ............... ।

मंगलवार, 2 जून 2009

नया क़ानून लाने का विचार है ऑस्ट्रेलिया सरकार का

भारतीय छात्रों पर ऑस्ट्रेलिया में हो रहे हमले के विरोध में युवाओं की गांधीगिरी और चौतरफा राजनयिक दबाव के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार को विदेशी छात्रों की सुध आयी है. चौतरफा दबाव के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार अब देश में रहने वाले विदेशी छात्रों की सुरक्षा के लिए जल्दी हे एक क़ानून लाने पर विचार कर रही है. दिल्ली स्थित उच्चायोग पर प्रदर्शन करने गए भारतीय जनता युवा मोर्चा के एक प्रतिनिधिमंडल को ऑस्ट्रेलिआई उच्चायुक्त जोन मेक कार्थी ने यह भरोसा दिया है. उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को सभी भारतीय छात्रों को पूरी सुरक्षा मुहेय्या कराने का भी भरोसा दिलाया है.

इस बीच भारत के बढ़ते दबाव के मद्देनजर ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री केविन रुद्ड ने हमले के दोषियों को दण्डित करने का आश्वाशन संसद में दिया है. साथ ही उन्होंने कहा है सभी ९०,००० भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया में मेहमान हैं.

रविवार, 31 मई 2009

अब सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए आवेदन की भीड़

चंदन शर्मा

दिल्ली में शायद कई दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है. दसवीं और बारहवीं के नतीजों में इन स्कूलों के छात्रों ने पब्लिक और कॉन्वेंट स्कूलों को तो कड़ी टक्कर दी ही है और बेहतर परिणाम दिए हैं. पर इससे भी बड़ी बात यह है की दिल्ली के सरकारी स्कूलों में प्रवेश के चाह रखने वालों की भीड़ एकाएक बढ़ गयी है. दिल्ली के शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह और शिक्षा सचिव रीना रे की मानें तो दिल्ली के सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए ९२००० आवेदन आ चुके हैं और इस संख्या में ५२००० का और इजाफा होने की आशा है.

यानी की दिल्ली के सरकारी स्कूलों में इस बार करीब १.४० लाख छात्र प्रवेश के इच्छुक है. यह चमक-दमक वाले आदम्बर्पूर्ण और मोटी फीस वसूलने वाले निजी स्कूलों के लिए चिंता का विषय हो सकता है. पर आम अभिवावकों के लिए संतोष का कारण है जो जीवन की जरूरतें मुश्किल से पूरा करते हैं और अपने बच्चों के बेहतर शिक्षा के मुश्किल से फीस जुटा पाते हैं. इस बार के परिणामों से कम से कम वह ये आशा तो रख ही सकते हैं की सरकारी स्कूल में पढाने से उनके बच्चे पिछादेंगें नहीं और इन निजी स्कूल के छात्रों के बराबर या उनसे बेहतर प्रदर्शन कर सकते है. आंकडों की और देखें तो इन स्कूलों के औसत परिणाम दसवीं और बारहवी में ८० से ९० फीसदी तो रहे ही हैं. पर इससे बढ़कर यह की इनके छात्र ९५ फीसदी से भी ज्यादा अंक लाने में सफल रहे हैं जो किसी भी स्कूल और छात्र का सपना होता है. निश्चित रूप से मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह और शिक्षा विभाग की नीतियों के साथ-साथ योग्य शिक्षकों का मार्गदर्शन और सबसे बढ़कर छात्रों की कड़ी मेहनत इस अभूतपूर्व सफलता के कारक रहे हैं. और, इन्ही सब ने इन स्कूलों के प्रति आस्था वापस लौटाई है और निजी स्कूलों का ahankaar भी टूटा है.

पर अभी भी कई कमियां हैं जिनमें व्यापक सुधार की जरूरत है. इनमें बेहतर शिक्षण के साथ सभी स्कूलों में समान और स्तरीय शिक्षण, छात्रों को बेहतर वक्तृत्व कला , कंप्यूटर शिक्षण, खेल-कूद व अन्य पाठ्येतर गतिविधियों का विस्तार इन स्कूलों में जरूरी है. ताकी बेहतर विकास के लिए ये निजी स्कूलों की तरफ़ ना देखें .

कभी मेट्रो, बस में सफर करते हुए, या अपनी गाड़ियों में सफर करते हुए जब स्कूली छात्र की भीड़ देखतें हैं तो अभिभावकों के पसीने छूट जाते हैं. कई बार तो इन्हे अच्छी शिक्षा के लिए १५ से २० किलोमीटर तक दूर जाना पड़ता है. यह स्थिति दिल्ली के छात्रों के लिए आम है और इसे ख़त्म करने की जरूरत है. अमेरिका जैसे ‘विकसित’ देशों में भी बच्चों के लिए स्कूल नजदीक में ही उपलब्ध होते हैं और साथ ही वहां सरकारी और निजी स्कूलों जैसी कोई स्थिति नही है. आख़िर यह स्थिति यहाँ क्यों नही हो सकती है.

बुधवार, 27 मई 2009

'युवा' से बनेंगे सरकारी स्कूल बेहतर व आकर्षक

आखिरकार दिल्ली सरकार और इसके शिक्षा विभाग ने पाठ्येतर गतिविधियों का महत्त्व समझते हुए इसे सरकारी स्कूलों में सुनियोजित ढंग से लागू करने के लिए कदम बढ़ा दिया है. सुविधा वंचित स्कूली छात्रों को ध्यान में रखते हुए जीवन कौशल शिक्षा 'युवा' का आज दूसरा संस्करण दिल्ली के सरकारी स्कूलों के लिए लागू कर दिया. दिल्ली के शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह ने आज इसे लागू करते हुए स्वीकार किया की सरकारी स्कूलों को और बेहतर और आकर्षक बनाने की जरूरत है ताकि सीखने की प्रक्रिया आनंददायक, रुचिकर और सार्थक हो सके.

मालूम हो की इसी मंच पर पाँच दिन पूर्व “शाबाश अनुज गोयल” में सरकारी स्कूलों को बेहतर और आकर्षक बनाने के लिए किताबी शिक्षा के साथ-साथ पाठ्येतर गतिविधियों को भी पूरा महत्त्व देने की वकालत की गयी थी. युवा का यह कार्यक्रम छात्रों के समग्र और स्वस्थ विकास के साथ-साथ उन्हें समाज के साथ सफल ढंग से तालमेल बिठाने के उद्देश्य से बनाया गया है. इसके तहत स्थानीय और बाहरी जगहों पर भ्रमण, एनीमेशन वाला पाठ्यक्रम, एको-क्लब, खेल-कूद, क्विज, वार्तालाप आदि कई चीजें समाहित की गयीं हैं.
शिक्षा मंत्री के अनुसार, यह प्रयास बच्चों को स्कूल की और न सिर्फ़ आकर्षित करेगा बल्कि उन्हें स्कूली शिक्षा से भी जोड़े रखने में भी मदद करेगा. इसके अलावा यह बचपन से किशोरावस्था और किशोरावस्था से वयस्क होने की जटिल प्रक्रिया में भी छात्रों का मददगार साबित होगा.

शनिवार, 16 मई 2009

yuva संदेश: काम बस और कुछ नही







चंदन शर्मा

तो यह एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया की राहुल गाँधी फिलहाल प्रधान मंत्री नही बनेंगे. पर राहुल के प्रयास (और उनकी ८७००० kilometer की यात्रा) से जो देश भर के युवा ने इस बार जागकर जो संदेश दिया है वह आइने की तरह साफ़ है की बगैर काम के देश के मतदाताओं को भरमाया नही जा सकता है. इस बार चुनाव परिणाम में जो तस्वीर सामने आयी है उसमें साफ़ है की हर युवा जो काम करने का जज्बा रखता है उसका लोगों ने समर्थन किया है. चाहे वह राहुल हों या उसकी टीम के अशोक तंवर, सचिन पायलट, जीतेन्द्र सिंह या संदीप दीक्षित हों या ६० साल के युवा नीतीश कुमार हों.

नीतिश को युवा कहना थोड़ा अटपटा लग सकता है पर हर वह आदमी जो कुछ नया करने और विपदा को अवसर के रूप में बदलने में सक्षम है वह युवा है. और नीतीश कुमार इस कसौटी पर खरे उतरते है. ऐसे में आर्श्चय नही होना चाहिए की राहुल अभी भी इस बेदाग़ और ‘युवा’ नीतीश के साथ के पक्षधर हैं.

युवा कांग्रेस के अशोक तंवर इस युवा के दूसरे उदाहरण हैं. जिन्होंने लंबे समय तक यूथ कांग्रेस के साथ रहकर कांग्रेस की उपेक्षित इकाई को जीवंत और सार्थक बनाया. कहने की जरूरत नही है की राहुल का मार्गदर्शन इसमें प्रमुख रहा पर इस लोकसभा चुनाव में तंवर ने सिरसा में चौटाला और भजनलाल का जिस तरह से प्रभुत्व तोडा वह अपने आप में नया है.

संदीप दीक्षित न सिर्फ़ दिल्ली की मुख्या मंत्री के सुपुत्र है पर उससे बढ़कर उन्होंने यमुना पार क्षेत्र में काम दिखाया है उसे क्षेत्र की जनता ने भी हाथों हाथ लिया है. यही बात सचिन पायलट और दर्जनों ‘युवा’ उमीदवारों पर भी लागू होती है चाहे वे किसी भी पार्टी से हों. काम के बजाय जनता को फालतू मुद्दों में उलझा कर चुनाव जीतने की चाह रखने वालों के लिए यह सबक है चाहे वे लेफ्ट के हों या बीजेपी के या अन्य किसी पार्टी से. जनता को काम चाहिए और इस बार उन्होंने वोट इसी के लिए दिया है.

गुरुवार, 14 मई 2009

एलीट बने रहने के फंडे


चंदन शर्मा

दिल्ली का प्रतिष्ठित स्टीफेंस कॉलेज फिर से एक बार चर्चा में आ गया है. दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश का सीजन शुरू होते ही दिल्ली की मीडिया इस एलीट कॉलेज के पीछे ही पड़ जाती है. आख़िर क्या दिक्कत है अगर स्टीफेंस ने अंकों को अपने यहाँ दाखिले का एकमात्र मापदंड नही बनाया है और पुराने प्रिंसिपल अनिल विल्सन के ढर्रे पर चलते हुए पर्सनल इंटरव्यू को एक प्रमुख मापदंड के रूप में फिर से स्थापित कर रहा है.

वैसे भी एलिट या भद्र समाज हमेशा से कुछ ऐसा करता आया है जिससे आम लोगों की पहुँच इस भद्र समाज तक आसानी से नही हो पाये. अब देखिये स्टीफेंस ऐसा कॉलेज है जहाँ प्रवेश के लिए इंटरव्यू में पास होना अनिवार्य है भले ही आप ने बारहवीं कक्षा ९९ फीसदी अंक लेकर पास की हो . मतलब साफ़ है की आपने अगर किसी सरकारी स्कूल से इतने ऊँचे अंकों के साथ परीक्षा पास की है तो आप के प्रवेश की संभावना क्षीण ही है. और अगर आपने अपनी पढ़ाई हिन्दी मीडियम से पास की है तो फिर यहाँ प्रवेश का ख्वाब नही देखें तो अच्छा है.

बात सिर्फ़ इतनी ही नही है यह कॉलेज उनसे भी दूर ही रहता है जो आम लोगों के या गैय्या -पट्टी के छात्रों की पसंद है. अब हिन्दी को लीजिये दिल्ली का शायद यह अकेला कॉलेज होगा (गैर-व्यावसायिक श्रेणी में) जिसमें हिन्दी की पढ़ाई नही होती है. आप कितना भी हिन्दी का गुणगान कर लें की यह अब रोजगार देने वाला विषय बन गया है. वैसे इसी कॉलेज में क्षयमान होते विषय दर्शन और संस्कृत की पढ़ाई होती रही है.

वैसे यह अंग्रेजों के जमाने के नुस्खे है जो आज भी अपने आप को एलिट बनाये रखने में कारगर है. कहने को तो संस्कृत भी एक जमाने में एलिट वर्ग की ही भाषा थी पर भला हो तुलसीदास जी का जिन्होंने रामचरितमानस हिन्दी में लिखकर सारे संस्कृत के पुराने एलिट को ठंडा कर दिया. पर भद्रजन तो भद्रजन है चाहे वे वैदिक काल के हों या अंगरेजी युग के या फिर आज के. एलिट बने रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना जरूरी है. नही तो उन्हें कौन आम आदमी पूछेगा?

बात सिर्फ़ यहीं तक हो तो ठीक था. यहाँ पूरे देश के नेता युवाओं को पता कर उन्हें वोट करने और उन्हें नेता चुनने के लिए घर से बाहर निकालने केलिए पूरा जोर लगा रखा था पर स्टीफेंस में नेतागिरी को दरवाजा दिखा दिया जाता है. बेचारे यूनिवर्सिटी के छात्र संघ (डूसू) के नेता वहां जिंदाबाद मुर्दाबाद तक नहीं कर सकते है.दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है. पर ब्रिटिश राज के कॉलेज और ब्रिटिश राज के ख़यालात. वैसे भी पुराने जमाने में कॉलेज का काम लीडर नहीं बल्कि नौकर तैयार करना होता था. सो, वह रिवाज बदस्तूर कायम है. आख़िर एलिट बने रहना है, जन सेवक या जन प्रतिनिधि नही!


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बुधवार, 13 मई 2009

काले धन के मामले में ५० को नोटिस

चंदन शर्मा

आखिरकार काले धन के मामले में सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी है. चुनाव के इस मौसम में विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन के बारे में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने ५० भारतीयों को नोटिस जारी किया है. इसमें देश के कई बड़े पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों के नाम शामिल बताये जा रहें है. हांलाकि सरकार की और से इन लोगों के नाम गुप्त रखे गए है.

माना जा रहा है की इन बैंकों में जमा काला धन बड़ी मात्रा में विदेशी संस्थागत निवेशकों के जरिये शेयर बाज़ार में लगाया जा रहा है. सरकार की संभावित कार्रवाई के मद्देनज़र इन लोगों ने यह काम शुरू किया है. वैसे चुनाव के मौसम में सेंसेक्स के इतनी तेजी से बढ़ने का यह एक बड़ा कारण माना जा रहा है. पहले भी इसी ‘युवा’ में एक रिपोर्ट “काला धन, युवा, मंडी और सेंसेक्स के रिश्ते” में इस बारे में चर्चा की जा चुकी है. दुनिया भर की आर्थिक रिपोर्टों की मानें तो भारतीयों का विदेशी बैंकों में करीब ३००००० करोड़ रुपये जमा है. यह धन कुछेक लोगों ने कर चोरी के लिए विदेशी बैंकों ने छुपा रखा है.

पर देश के आर्थिक विश्लेषकों का मानना है की इस पैसे को शेयर बाज़ार में लगा कर पैसा तो बनाया जा रहा है लेकिन देश के मूलभूत आर्थिक संरचना के विकास में इसका कोई योगदान नही हो रहा है. जबकि इतनी बड़ी राशिः से देश की मंडी और बेरोजगारी का आसानी से सफाया हो सकता है. मालूम हो की पिछले दिनों jee-८ के शिखर सम्मलेन में काले धन का मुद्दा जोर-शोर से उठा था और मंदी की मार झेल रहे ‘विकसित’ देशों ने इस काले धन को छुपाने में सहयोग करने वाले देशों के ख़िलाफ़ शिकंजा कसने की जोरदार वकालत की थी.

गुरुवार, 7 मई 2009

आपबीती: वोट देने के लिए लगानी पड़ी चुनाव आयोग में गुहार

युवा को हमने ए़क ऐसा मंच बनने का सपना देखा था जिसमें सबकी भागीदारी हो सके, खासकर युवा वर्ग के लोगों की। यह आपबीती इसी सपने की ए़क कड़ी है। जिसमें लेखिका ने ए़क आम वोटर के द्वारा भोगी जाने वाली दिक्कतों का खुलासा किया है।

शची

दिल्ली में मताधिकार का प्रयोग मेरे लिए ए़क ऐसा अविस्मरणीय संस्मरण बन गया है जिसे मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी। पप्पू नहीं बनने के लिए उप-मुख्य चुनाव अधिकारी तक का दरवाजा खटखटाना पड़ा। वैसे तो 'पप्पू मत बनिए, वोट करिए' की गूँज तो चारों ओर है और लगभग सभी मीडिया चैनलों और घरानों ने बाकायदा इसबारेमें अभियान चला रखा है। पर पप्पू नहीं बनाना इस देश में पप्पू बनने से कहीं ज्यादा मुश्किल है।

वैसे तो वोट करने की मेरी आदत नहीं रही है पर पति के बार-बार के तानों (और अनुरोध ) से तंग आकर मैंने वोट करने का फ़ैसला कर लिया। बगैर यह समझे की भारत में बोगस वोटिंग तो आसान है पर सच्ची वोटिंग नहीं। खैर, अपने पति और बच्चों के साथ मैं करीब १२.३० बजे दिल्ली के द्वारका स्थित बी जी एस स्कूल, सेक्टर-५ पहुँच गयी, जहाँ पोलिंग बूथ बनाया गया था। मटियाला विधान सभा (एसी-३४) का बूथ नंबर-४५। वैसे चुनाव आयोग के अधिकारियों को बधाई देना चाहिए कि उन्होंने ऐसी बढ़िया जगह वोटिंग के लिए चुनी, खासकर गरमी के मौसम में। जो भी हो, पहले हमलोग स्कूल के बाहर के पोलिंग एजेंट के पास गए अपना नाम वोटर लिस्ट में देखने के लिए। वहां वोटर लिस्ट में हम दोनों का फोटो तो था पर नाम किसी और का था। इस पर पोलिंग एजेंट ने हमें अंदर जाकर चुनाव आयोग की आधिकारिक सूची देखने की सलाह दी।

अंदर जाकर सूची देखने पर नाम और फोटो दोनों लिस्ट में थे। हमदोनों ने रहत की साँस ली की चलो मुसीबत छूट गयी। पर मुझे नहीं पता था की अन्दर इससे बड़ा संकट खड़ा है। । अन्दर जाने पर मुझसे आई-कार्ड की मांग की गयी। चूँकि चुनाव आयोग ने वोटर आई कार्ड अब तक बना कर भेजने की जहमत नही उठाई और किसी आई कार्ड की मुझे जरूरत नहीं पडी तो ऐसे में किसी पहचान पत्र के होने का सवाल ही नहीं उठता था। हांलाकि मेरे पतिदेव ने कहा कि यह मेरे साथ है । मेरी पत्नी है और वोटर लिस्ट में इनका नाम है। चूँकि वोटर लिस्ट फोटो वाला है इसलिए इससे मिलान करके इन्हे वोट देने दिया जाय। पर पीठासीन अधिकारी जो कि ए़क बुजुर्ग महिला थी, ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया यह कहते हुए कि उन्होंने अपने ऊँचे अधिकारियों से बात करने के बाद ऐसा निर्णय लिया है। वैसे हम दोनों ने समझाया की सरकारी नियम बोगस वोटिंग रोकने के लिए हैं न कि सही वोटरों को अपने मताधिकार का प्रयोग रोकने के लिए। हमारे पतिदेव ने मेरे लिए ए़क वचन पत्र भी देने का प्रस्ताव रखा । पर वह अधिकारी तैयार नहीं हुई। हार कर हमने चुनाव कार्यालय में अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया। पर हाय रे, भारत के स्टील फ्रेम सरकारी अधिकारी, उन्होंने इन अधिकारियों को भी गोली दे दी। आखिरकार थक कर , इसके लिए उप मुख्य चुनाव अधिकारी के यहाँ गुहार लगाई गयी। पर सरकारी अधिकारियों को जनता के सुविधा केलिए बनाये गए नियमों को जनता के बाधा वाले नियमों में बदलने में महारत हासिल होती है। तो, पीठासीन अधिकारी ने वहां भी गोली दे दी। और हमारे पतिदेव से मांग की कि कोई ऐसा प्रमाणपत्र लाइए जिसमें मेरा और मेंरे पति का नाम हो। वैसे मेरे पति को वोट करने की अनुमति मिल गई थी अपना पहचान पत्र दिखने के बाद। पर इस मांग के बाद हमदोनों ने उस महान पीठासीन अधिकारी को करबद्ध प्रणाम किया और बगैर वोट डाले वापस हो लिए।

पर मेरे पतिदेव इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे। आख़िर मैं भी उनके तानों को ही सुनकर वोट देने आयी थी। बहरहाल मेरे पति ने सोचा कि उप मुख्य चुनाव अधिकारी से संपर्क करने कीकोशिश की जाय तो शायद कोई हल निकल आए। संयोग से उप-मुख्य चुनाव अधिकारी उदय बक्शी से बात हो गयी । उन्होंने छूटते ही कहा कि आपको तो वोट देने के बारे में कह दिया गया था। बस आपको ए़क वचनपत्र देना पड़ेगा कि मैं उनकी पत्नी हूँ। बाद में पीठासीन अधिकारी को फिर से निर्देश दिएगये तब जाकर मैंने दिल्ली में अपने मताधिकार का प्रयोग किया, काफी देर की मशक्कत के बाद। आख़िर पप्पू नहीं बनना था। तो फिर आप सोचिये कि आप पप्पू रहना चाहेंगे या उसकी श्रेणी से बाहर रहेंगे।


बुधवार, 6 मई 2009

काला धन, युवा, मंदी और सेंसेक्स के रिश्ते

कालाधन, युवा और चुनाव पर लेकर बड़ी चर्चा हो रही है। मेरे एक मित्र ने अपने ब्लॉग 'hindivani' पर इसे राजनीति का मुद्दा ही बना दिया . पर जब हमने कुछ आर्थिक विशेषज्ञों से बात की तो कुछ और ही खेल समझ में आया. जिसका सार संक्षेप यहाँ दे रहा हूँ.
चुनाव में मुद्दे की कमी नहीं होती है और चुनाव जब लोक सभा का हो तो मुद्दा और भी गरम हो जाता है। पर जिस तरह से इन चुनावों में शेयर बाजार ने उछाल मारी है वह बाज़ार के विशेषज्ञों को भी अचंभित कर देने वाला है। आप पूछ सकते हैं की शेयर बाज़ार का इस युवावाणी में क्या काम है? पर चुनाव और शेयर बाज़ार का गहरा नाता है। और, शेयर बाज़ार का नौकरी के अवसरों व विकास डर से बेहद करीबी सम्बन्ध है। इसलिए युवा को इससे अलग कर के नहीं देख सकते हैं। खासकर तब जबकि लोगों की नौकरियां इस तथाकथित मंदी के नाम पर थोक में जा रहीं हों।
ऐतिहासिक रूप में चुनाव के दौरान शायद ही कभी दुनिया में कहीं का शेयर बाज़ार ऊपर गया हो। वैसे अपवाद सब जगह होते हैं. तकनीकी रूप में राजनातिक अस्थिरता के कारण बाज़ार मंदी के दौर में ही होता है. हाल मैं अमेरिकी चुनाव में यही हुआ. पर भारत में इसका उल्टा हुआ. करीब ७००० पॉइंट पर पहुँचा सेंसेक्स सीधे १२००० पॉइंट पर पिछले चार महीने में पहुँच गया है. सारे आर्थिक अखबार, चैनल लोगों को इसके कारण समझा, समझा कर थक चुके हैं पर जो यह नही बता रहे है वह यह की इन चार महीनो में बाज़ार के खिलाड़ियों पर सरकार का नियंत्रण नहीं रहा है.दूसरी जो सबसे अहम् बात यह है की विदेशों में जमा कला धन विदेशी संस्थागत निवेशकों के जरिये एकाएक देश के शेयर बाज़ार में आ गया. यह वही कला धन है जिसकी बात अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से लेकर अडवाणी और मनमोहन तक करते आए हैं. यह कैसे और क्यों आया इसके पीछे एक लम्बी कहानी है पर यह काला धन कितना हो सकता है इसका अंदाजा आप इस तथ्य से लगा लें की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अकेले भारत में एक परिवार ने ७०००० करोड़ रुपये का धन जर्मनी के एक बैंक में जमा कर रखा था. यह धन किसी एक राज्य के पूरे वर्ष के बज़ट से भी ज्यादा है. यह धन कौन लायेगा, यह कहाँ छुपा है इन सब के कोई मायने नही है. असल तो यह है की इस धन के कारण जो दुनिया भर में मंदी की तबाही मची उसका जिम्मेदार कौन है . लाखों युवाओं की नौकरियां गई उसकी जिम्मेदारी किसके ऊपर आती है .

मंगलवार, 5 मई 2009

सिविल सेवा में हिन्दी, क्षेत्रीय भाषा का बोलबाला

यह उनके लिए एक करारा जबाब है जो क्षेत्रीय भाषाओं को उपेक्षा की नजरों से देखते हैं। आईएस की परीक्षा में इस बार शुभ्रा सक्सेना समेत तीन महिला उम्मीदवारों ने इस प्रतिष्ठित परीक्षा में पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर बाज़ी मार ली है वहीं इससे बड़ी ख़बर यह है कि इस परीक्षा में इस बार हिन्दी समेत क्षेत्रीय भाषाओं का बोलबाला रहा है। हांलांकि अंग्रेजी के सबसे पैरोकार मीडिया हाउस टाईम्स ऑफ़ इंडिया ने हिन्दी के बारे में एक भी शब्द लिखना गवारा नहीं समझा है जबकि इसी अखबार ने पंजाबी से सफल होने वाले वीरेंदर शर्मा कि चर्चा अपने फ्रंट पेज में की है।

मालूम हो कि तीसरे स्थान पर रहने वाली रायपुर कि किरण कौशल ने हिन्दी माध्यम से परीक्षा दी थी। 'अमर उजाला' ने हांलाकि इस बारे में ज्यादा तटस्थ रहते हुए क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व को स्थान दिया है। वैसे यह पहली बार नहीं है कि हिन्दी, जिसे बोलने वालों कि संख्या ५० करोड़ से ज्यादा है, को इलीट अंगेरजी मीडिया ने उपेक्षित किया है। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। दिलचस्प बात यह है कि इस इलीट क्लास मीडिया का सबसे बड़ा पाठक वर्ग हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा की दुनिया से ही आता है और इसी वर्ग के दम पर यह अंग्रेजी मीडिया विज्ञापनों के खजाने पर कब्जा किए बैठा है।

बिडंवना तो यह है कि जब भी हिन्दी कि बात होती है तो यही इलीट क्लास क्षेत्रीय भाषाओं का मसला लेकर बैठ जाता है और इसके विकास कि हर प्रक्रिया को उलझाने कि कोशिश करता है। यह स्थिति तब है जबकि देश कि ६० फीसदी आबादी हिन्दी में कार्य करती है और करीब ९० फीसदी से ज्यादा हिन्दी को जानती समझती है।

रविवार, 3 मई 2009

मनमोहन व आडवाणी पश्चिमी दिल्ली में आमने-सामने

देश की राजधानी दिल्ली की पश्चिमी दिल्ली लोक सभा सीट पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प हो चुका है। दोनों पार्टियों ने इस सीट पर पूरी ताकत झोंकने का फैसला कर लिया है। इसी के तहत अब से कुछ ही घंटों बाद पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं की सभा इस इलाके में होने वाली है। जहाँ कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यहाँ एक चुनावी सभा को संबोधित करने वाले हैं वहीं दूसरी ओर बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पदके दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी इस इलाके में जनसमर्थन मांगेंगे।
यहाँ जहाँ कांग्रेस की ओर से दिल्ली के लालू कहे जाने वाले महाबल मिश्रा चुनाव मैदान में हैं तो बीजेपी की ओर से दिल्ली के पूर्व वित्त मंत्री जगदीश मुखी चुनाव मैदान में हैं। दोनों ही वर्तमान में दिल्ली विधान सभा के विधायक हैं। हांलाकि इस इलाके में पेय जल, बिजली और विकास से जुड़ी कई अन्य समस्याएँ हैं। इसके अलावे इसके कई इलाकों में सिखों का बाहुल्य है।
पर दोनों बड़े नेताओं का एक ही दिन करीब एक ही समय चुनावी सभा करने का मतलब साफ़ है की यहां टक्कर कांटे की है। वैसे जनता को इस बारे में फैसला सात मई को करना है।

शनिवार, 2 मई 2009

युवा नेताओं के समर्थन में निकले राहुल



कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी इन दिनों पार्टी के अन्य युवा नेताओं के लिए जन समर्थन मांग रहे हैं। शुक्रवार को ४४ डिग्री की चिलचिलाती गरमी में राहुल ने युवा कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक तंवर के समर्थन में हरियाणा के सिरसा में सभा की और जनता से समर्थन माँगा। राहुल ने कहा की तंवर न सिर्फ़ दलितों काप्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि वे जेएनयू जैसे विख्यात संस्थान से पीएचडी भी हैं और तंवर के नेतृत्व में क्षेत्र का बहुमुखी विकास सुनिश्चित है। राहुल के साथ सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा और प्रधान मंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री पृथिवी राज चौहान ने भी जन समर्थन माँगा।

तंवर न सिर्फ़ दलितों का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि लंबे समय से जेएनयू के छात्र रहे हैं और कांग्रेस के छात्र विंग भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के अध्यक्ष रहे हैं।

रविवार, 26 अप्रैल 2009

चुनाव का नया फंडा: मटुकनाथ का दिल या बदली फिजा

वैसे तो इस बार चुनाव में काफ़ी कुछ हो रहा है पर कुछेक लोक सभा उम्मीदवारों ने देश के युवाओं का ध्यान खास तौर से आकर्षित किया है। मजे की बात तो यह है कि इन लोगों की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है पर युवाओं के बीच इनकी खासी चर्चा है। इनमें अपनी शिष्या जूली से विवाह रचाने वाले पटना विश्वविद्यालय के शिक्षक मटुकनाथ और हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री चन्द्रमोहन उर्फ़ चाँद की तलाकशुदा पत्नी व पूर्व सहायक सोलिसिटर जनरल अनुराधा बाली उर्फ़ फ़िजा और दिल्ली से लोकसभा उम्मीदवार दीपक भारद्वाज शामिल हैं।
हालाँकि तीनों उम्मीदवार अलग-अलग कारणों से चर्चा में हैं। मटुकनाथ ने इस चुनाव में 'प्रेम पार्टी' ही बना ली है और पटना के सभी प्रेमियों के लिए एक प्रेम पार्क बनाने का वादा किया है। उन्होंने अपने लिए 'दिल' चुनाव चिन्ह की मांग की है। यह अलग बात है कि तकनीकी कारणों से उनकी उम्मीदवारी का पर्चा चुनाव आयोग ने खारिज कर दिया। दूसरी ओर फिजा ने अपने पूर्व पति के समर्थित उम्मीदवार को हराने के लिए हरियाणा में अभियान छेड़ रखा है। दीपक भारद्वाज देश के सबसे रईस उम्मीदवार हैं और बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी संपत्ति इस मंदी के दौर में भी ६०० करोड़ रूपए से भी ज्यादा है।
पर सवाल यह है की इन उम्मीदवारों को युवाओं का समर्थन क्यों मिलें? इनका समाज में क्या योगदान है? क्या ये उम्मीदवार मीडिया में मिले प्रचार को राजनीतिक रूप से भुनाना चाहते हैं या धनबल को जनशक्ति पर थोपना चाहते है? यह सारे सवाल विचारणीय हैं। क्योंकि ऐसे लोगों की सफलता में समाज के गंभीर निहितार्थ भी जुड़े हैं।