

चंदन शर्मा
सोचा था इस विषय पर नहीं लिखूंगा. पर जब मोहल्ले में आग लगी हो तो आपके सामने बस दो ही विकल्प बचते हैं- या तो आग बुझाने में मदद की जाय या फिर अपने घर को जलते देखने के लिए तैयार रहा जाय. यह आशा करना कि मोहल्ला जलने के बाद भी आग से मेरा घर सुरक्षित रह जाएगा, ऐसा सोचना बेबकूफी के अलावा और कुछ नहीं है. और, अभी वक्त ऐसा नहीं आया है कि मूक दर्शक बनकर घर जलते देखते रहा जाय.
समलैंगिकता को मिले कानूनी अधिकार पर बहस में पता नहीं कितने हजार क्विंटल अखबारी कागज़ और टेलीविजन के कितने घंटे जाया हो चुके होंगे पर मित्रों के इतने फ़ोन और मेल आये कि इस मुद्दे पर लिखने से रोकना मुश्किल हो गया. वैसे कानूनी पक्ष के बारे में दिनेश राय द्विवेदी जैसे विद्वानों ने काफी कुछ लिखा है इसलिए इसपर विस्तार में ना जाते हुए सिर्फ इतना ही कहूँगा कि भारत के पूर्व अत्तोर्नी जनरल सोली सोराबजी ने व्यक्तिगत निजता के समर्थन के साथ धारा ३७७ के दंडात्मक प्रावधानों को भी बनाए रखने कि वकालत की है.
पर सवाल क्या सिर्फ व्यक्तिगत निजता भर से जुड़ा हुआ है. कतई नहीं. अगर ऐसा होता तो यह मामला कोर्ट में चुपचाप आता और एक सामान्य खबर या अनजान फैसला बन कर रह जाता. पर जिस तरह से तैयारी कर के पूरे देश में 'तथाकथित समलैंगिकों' के परेड निकाले गए और लाखों-करोडों रूपये इसके नाम पर फूंके गए वह कुछ और ही इशारा करता है. और, इन 'तथाकथित समलैंगिकों' की परेड मैंने भी कवर की है. अस्सी फीसदी भीड़ इसमें किन्नरों की होती है जो निश्चित रूप से भाड़े पर लाए जाते हैं ताकि मीडिया पर कवरेज़ का दबाव बनाया जा सके. और, हमारे देश का कोर्ट और मीडिया? जो मुजफ्फरनगर, मेरठ जैसे शहरों में युवाओं के प्रेम-प्रसंगों के कारण हर महीने हो रही हत्याओं का हिसाब नहीं रख पाता वह समलैंगिकों के अधिकार के लिए तुंरत आगे आ जाता है क्योंकि इससे 'बड़े नाम' जुड़े हुए हैं. ..
दुर्भाग्य से अधिसंख्य जनता जो समलैंगिकता के विरोध में है वह भी कमजोर दिखती है क्योंकि अव्वल तो वह 'कुतर्की' नहीं है और दूसरा इन सब बातों पर चर्चा करने से वह कतराती है। पर अगर इससे बचा जाएगा तो कल इसकी लपटें आप के घर तक नहीं पहुंचेगी इस भरम में कतई नहीं रहना चाहिए. यह समलैंगिकों बनाम अन्य की लड़ाई नहीं है बल्कि समाज और परिवार के अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई है. और, माफ़ करें कोर्ट, जो सिर्फ प्रमाणों और महज वकीलों के तर्क पर फैसले सुनाता है वह आपके और लिए और आपके समाज के लिए लडेगा यह उम्मीद करना बेमानी है. (जारी)
सोचा था इस विषय पर नहीं लिखूंगा. पर जब मोहल्ले में आग लगी हो तो आपके सामने बस दो ही विकल्प बचते हैं- या तो आग बुझाने में मदद की जाय या फिर अपने घर को जलते देखने के लिए तैयार रहा जाय. यह आशा करना कि मोहल्ला जलने के बाद भी आग से मेरा घर सुरक्षित रह जाएगा, ऐसा सोचना बेबकूफी के अलावा और कुछ नहीं है. और, अभी वक्त ऐसा नहीं आया है कि मूक दर्शक बनकर घर जलते देखते रहा जाय.
समलैंगिकता को मिले कानूनी अधिकार पर बहस में पता नहीं कितने हजार क्विंटल अखबारी कागज़ और टेलीविजन के कितने घंटे जाया हो चुके होंगे पर मित्रों के इतने फ़ोन और मेल आये कि इस मुद्दे पर लिखने से रोकना मुश्किल हो गया. वैसे कानूनी पक्ष के बारे में दिनेश राय द्विवेदी जैसे विद्वानों ने काफी कुछ लिखा है इसलिए इसपर विस्तार में ना जाते हुए सिर्फ इतना ही कहूँगा कि भारत के पूर्व अत्तोर्नी जनरल सोली सोराबजी ने व्यक्तिगत निजता के समर्थन के साथ धारा ३७७ के दंडात्मक प्रावधानों को भी बनाए रखने कि वकालत की है.
पर सवाल क्या सिर्फ व्यक्तिगत निजता भर से जुड़ा हुआ है. कतई नहीं. अगर ऐसा होता तो यह मामला कोर्ट में चुपचाप आता और एक सामान्य खबर या अनजान फैसला बन कर रह जाता. पर जिस तरह से तैयारी कर के पूरे देश में 'तथाकथित समलैंगिकों' के परेड निकाले गए और लाखों-करोडों रूपये इसके नाम पर फूंके गए वह कुछ और ही इशारा करता है. और, इन 'तथाकथित समलैंगिकों' की परेड मैंने भी कवर की है. अस्सी फीसदी भीड़ इसमें किन्नरों की होती है जो निश्चित रूप से भाड़े पर लाए जाते हैं ताकि मीडिया पर कवरेज़ का दबाव बनाया जा सके. और, हमारे देश का कोर्ट और मीडिया? जो मुजफ्फरनगर, मेरठ जैसे शहरों में युवाओं के प्रेम-प्रसंगों के कारण हर महीने हो रही हत्याओं का हिसाब नहीं रख पाता वह समलैंगिकों के अधिकार के लिए तुंरत आगे आ जाता है क्योंकि इससे 'बड़े नाम' जुड़े हुए हैं. ..
दुर्भाग्य से अधिसंख्य जनता जो समलैंगिकता के विरोध में है वह भी कमजोर दिखती है क्योंकि अव्वल तो वह 'कुतर्की' नहीं है और दूसरा इन सब बातों पर चर्चा करने से वह कतराती है। पर अगर इससे बचा जाएगा तो कल इसकी लपटें आप के घर तक नहीं पहुंचेगी इस भरम में कतई नहीं रहना चाहिए. यह समलैंगिकों बनाम अन्य की लड़ाई नहीं है बल्कि समाज और परिवार के अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई है. और, माफ़ करें कोर्ट, जो सिर्फ प्रमाणों और महज वकीलों के तर्क पर फैसले सुनाता है वह आपके और लिए और आपके समाज के लिए लडेगा यह उम्मीद करना बेमानी है. (जारी)