बुधवार, 17 जून 2009

देवनागरी के ख़त्म होने का खतरा तो है: नित्यानंद तिवारी


हिन्दी अकादमी के सदस्य और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर नित्यानंद तिवारी न सिर्फ़ हिन्दी के आलोचक और विद्वान है बल्कि उन्होंने उस दौर को काफी नजदीक से देखा है jise हिन्दी के लिए सूचना तकनीक का संक्रमण काल कहा जाता है. ‘युवा’ से एक लम्बी बातचीत में उन्होंने इस तकनीक और हिन्दी भाषा पर इससे पड़ रहे प्रभावों और आज की रचनात्मकता के बारे में विस्तार से चर्चा की है. उनके विचार हम किस्तों में पेश कर रहे हैं. प्रस्तुत है इसकी पहली किस्त:

हिन्दी के जाने-माने नाम और मेरे मित्र मैनैजर पाण्डेय जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से रिटायर होने वाले थे तो मैं उनके घर गया था उनकी सेवानिवृत्ति से करीब छः- सात महीने पूर्व. तब मैंने उनके यहाँ कंप्यूटर रखा देखा था. पूछने पर उन्होंने कहा कि चूंकि सब (शिक्षकों) के यहाँ कंप्यूटर लगा दिया गया है इसीलिए यहाँ भी इसे लगा दिया है. पर यह मेरे किसी काम का नहीं है.
इस घटना के काफी दिन हो चुके हैं पर मुझे लगता है की कंप्यूटर पर काम करना आना चाहिए. हिन्दी देश में सब जगह बोली जाने वाली भाषा है इसलिए हिन्दी में कंप्यूटर में काम जानना जरूरी है. हिन्दी का सूचना तकनीक से जुडाव जरूरी है. अब इस उम्र में इस काम को मैं सीख नही पाया और शायद इसकी जरूरत भी अब नही है. लेकिन इसमें काम करने के फायदे तो हैं. कागज़ पर माथा पच्ची से बचने के अलावे कई और सुविधाएं हैं. जैसे आप किसी रचना को स्टोर कर सकते हैं. उसमे बिना परेशानी के परिवर्तन कर सकते हैं आदि.

पर सुविधा ऐसी चीज है जो सब भुला देती है. जो स्थिति है उसमें तो देवनागरी ख़त्म हो जाने का खतरा तो है. जब रोमन में हिन्दी लिखने की सुविधा होगी तो लोग देवनागरी पर क्यो मेहनत करेंगे? मैं अपना उदाहरण बताता हूँ. मैं ख़ुद अच्छी भोजपुरी बोल लेता हूँ पर मेरे बच्चे नही बोल पाते हैं. उन्हें मैं इसके लिए दबाव नही दे सकता हूँ क्योंकि उन्हें अब इसकी जरूरत भी नही है. यह (भोजपुरी) तो दिल्ली में संपर्क भाषा नही है. पर हिन्दी तो दैनिक व्यवहार की भाषा है और उसी में कंप्यूटर पर काम करने में दिक्कत बनी हुई है. अगर इस स्थिति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सरकारी सरंक्षण प्राप्त है तब तो बहुत मुश्किल है की स्थिति में सुधर हो पायेगा. हिन्दी का इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है. हिन्दी भाषा में पढने-लिखने वाले लोग हैं और यह उनको अयोग्य बनाने की कोशिश है.

दरअसल भाषा आपका कमिटमेंट है और लिपि शब्द लिखने का एक तरीका है. यह वास्तविकता है और हमारे पहचान का एक हिस्सा भी. लिपि को बचाने के लिए कमिटमेंट या इमोशन होना चाहिए. बल्कि मैं तो कहता हूँ की कमिटमेंट और इमोशन दोनों होना चाहिए. कहा जा सकता है की लिपि बाहरी है. हमारे शरीर का रंग भी बाहरी है. पर क्या सचमुच यह बाहरी है. रंग बाहर की चीज नही है. यह तो रक्त की आंतरिक विशेषता है जो बाहर हमारे त्वचा के रंग के रूप में दिखती है. यह हमारे स्वस्थ्य और व्यक्तित्व का भी परिचायक है. ठीक लिपि भी इससे जुदा नही है. यह भी हमारे सामाजिक और रचनात्मक व्यक्तित्व का हिस्सा है. इसे हम अलग कर देख नही सकते हैं.

जहाँ तक कंप्यूटर पर रोमन में हिन्दी लिखी जाने की सुविधा (यूनीकोड) से हिन्दी के विकास की बात है तो यह दुधारी तलवार की तरह है. इससे हिन्दी का विकास तो होगा पर लिपि के रूप में देवनागरी ख़त्म भी हो जायेगी. अगर इसे बचाना है तो कमिटमेंट और इमोशन के साथ टेक्नोलॉजी में पर्याप्त विकास की जरूरत है वह भी इमानदारी से . नही तो बहाव कभी पीछे नहीं जाता है. हमेशा आगे जाता है और इसमें देवनागरी के मिटने का खतरा बरकरार है… (जारी).

10 टिप्‍पणियां:

  1. यूनिकोड और 'रोमन से अंग्रेजी लिखने की सुविधा' , अलग-अलग चीजें हैं।

    मुझे नहीं लगता कि देवनागरी इस कारण विलुप्त हो सकती है कि उसे एक ऐसे कुंजीपटल की सहायता से लिखा जा रहा है जिस पर रोमन में कुछ 'चिंह' अंकित हैं। इन चिन्हों से क्या हो रहा है? इन्हें मिटाया भी जा सकता है। इनके उपर देवनागरी वर्णों वाले 'स्टिकर' चिपकाये जा सकते हैं।


    मुझे लगता है कि हिन्दी और देवनागरी को सबसे अधिक नुकसान तब होता है जब अपने को हिन्दी का प्राध्यापक कहने वाले लोग 'कमिटमेन्ट' और 'इमोशन' जैसे शब्दों के लिये उचित हिन्दी शब्द नहीं खोज पाते हैं।

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  2. निश्चित ही चौंकानेवाला शीर्षक है तथा इस शीर्षक की वज़ह से इसे अनदेखा करना कठिन है लिहाज़ा मैंने भी बॉच लिया। वही पुरानी हिंदी धुन की तासीर से शब्द दर शब्द ओतप्रोत लगा। अभिभावक जब बच्चों को उनके मातृभाषा के परिवेश से अलग रखेंगें तब मातृभाषा में बोल पाना कैसै संभव होगा। आज काफी बच्चे, किशोर और युवा अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं,उससे जुड़ रहे हैं। दूसरी बात सरकारी संरक्षण की कही गई है। यदि सरकारी संरक्षण नहीं होता तो प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देवनागरी के सॉफ्टवेयर की बाढ़ ना आती। हिंदी के विकास पर लिखते या बोलते समय सरकारी संरक्षण शब्द का प्रयोग एक फैशन बन चुका है। देवनागरी लिपि प्रौद्योगिकी में काफी तेजी से लोकप्रिय हो रही है तथा यूनिकोड ने इस विकास की गति को दोगुना कर दिया है. मेरे विचार से देवनागरी लिपि पर किसी भी प्रकार का संकट नहीं है।

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  3. चिंता की कोई बात नहीं है. इतना ही है की हम अंग्रेजी के कुंजी पटल का प्रयोग करते हुए हिंदी में अपनी बात को लिपि बद्ध कर लेते हैं. हिंदी टंकण सीख लिया जावे तो हिंदी कुंजी पटल का सीधे प्रयोग हो सकता है.

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  4. SAWAAL YAH VYAKTIGAT NAHI HAI. NA HEE 'COMMITMENT' KE BADLE PRTIBADHTAA AUR 'IMOTION' KE BADLE BHAAVNA LIKHNE SE IS SAMSYA KA SAMAADHAAN HAI. Sawaal agar puraane hai to abhi tak iska hal kyon nahi dhoondh paaye hai ham. Main apna udaaharan deta hun. Main kruti dev men type jaanta hun par unicode ke liye mujhe alag keyboard seekhne kee jaroorat hai.

    Jahaan tak suvidha kee baat hai to ek sawaal poochhta hun ki aaj kitne log thande paani ke liye ghade kaa istemaal karte hain? Refrigerator kee suvidha ke kaaran is puraani parampara ka lop ho raha hai. Yah hai suvidha ka khel. Aashavaadi hona aur samasya ko najarandaaj karna do alag baaten hain aur main aasha karta hun ki aap ise alag hee rakhenge.

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  5. khair ye bahas to chaltee rahegi, magar hindi aur kshetriya bhasaaon me bahut antar hai. uicode ne hindi ko naya jeewan diya hai.

    Nityanandjee ne kah dia, to aap jap rahe hain, magar blog par har roz, kam se kam 100 article aa rahe hain, wo aapko nahin dikh raha.

    zaroor aap hindi vibhag, dilli vishvavidyala ke kshtra honge.

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  6. khatra to isee ka hai jiskee taraf se aap ne aankh moond lee hai.

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  7. शायद हिन्दी आलोचक की बात सही भी हो पर यह भी तो सत्य है कि उनका कम्प्यूटर किसी काम का नहीं है क्योंकि पुरानी पीढी को ये सब चलाना नहीं आता है ओर शर्म के मारे या कह सकते हैं कि डर के कारण वो कम्प्य़ूटर अपनाना ही नहीं चाहते हैं। अगर ये लोग नई टेक्नोलोजी अपना लेंगे तो शायद हिन्दी चिठ्ठाकारी अपने सबसे अच्छे युग में होगी।

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  8. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
    बहुत बढ़िया लिखा है आपने! पहले के ज़माने में तो कंप्यूटर नहीं था और आजकल कंप्यूटर के बिना तो एक कदम चला नहीं जाता! पर पुराने ज़माने के लोग कंप्यूटर को स्तामल करने से और सिखने से कतराते हैं!

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  9. तिवारी जी की इस बात से मैं सहमत हूं कि हिंदी को रोमन में लिखने की तकनीकी सुविधा घातक सिद्ध हो सकती है। इससे आलसी लेखकों को देवनागरी सीखने से बचने का बहाना मिल जाता है। मैं तो मानता हूं कि हिंदी ब्लोगरों को अपने ब्लोगों के पाठकों से देवनागरी में ही टिप्पणी लिखने की मांग करनी चाहिए।

    स्कूलों में ही बच्चों को देवनागरी टाइपिंग सिखाई जानी चाहिए। आजकल वे कंप्यूटर शिक्षण के नाम पर माइक्रोसोफ्ट वर्ड, एक्सेल, पावरपोइंट आदि व्यावसायिक सोफ्टवेयर चलाना सीखते हैं, और वह भी अंग्रेजी में। सरकार को इन व्यावसायिक सोफ्टवेयरों को कतई प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए।

    माइक्रोसोफ्ट के सोफ्टवेयरों से भी बढ़िया सोफ्टवेयर मुक्त स्रोत में उपलब्ध हैं, जैसे ओपन ओफिस। वह निश्शुल्क अलग है। स्कूलों में बच्चों को ये सोफ्टवेयर सिखाए जाने चाहिए, और साथ ही कंप्यूटर पर हिंदी कैसे टाइप कर सकते हैं, यह भी।

    यदि ऐसा किया जाए, तो 10-15 वर्षों में ही सभी हिंदी भाषी कंप्यूटर-सैवी हो जाएंगे।

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  10. मुझे अभी तक समस्या क्या है यह बात समझ में नहीं आई, एक समय था जब देवनागरी लुप्त होती दीखाई दे रही थी परन्तु अब तो देवनागरी ज्यादा दृढ दीखाई देती है, देवनागरी को अपने कम्पूटर पर साक्षात् देख कर कितनी प्रसन्नता होती है बता नहीं पाते हैं, नयी पीढी भी इसे लिखने का आनंद ले रही है, तिवारी जी घड़े से पानी पीना अब कभी कभी हो भी जाता है, लेकिन आज से पचास वर्षों के बाद घड़ा सिर्फ म्यूज़ियम में ही मिलेंगे, और देखिये ना किसी का भी होना या ना होना उसकी उपयोगिता पर आकर रूकती है, अब अगर घड़े की उपयोगिता की जगह फ्रिज ने ले ली और यह सुविधाजनक भी है तो फिर क्यों हम घड़े का रोना रोएँ, आपने भी अपने बच्चों को भोजपुरी नहीं सिखाई क्योंकि उसकी उपयोगिता नहीं थी, लेकिन मैं कनाडा में रहती हूँ और मैंने अपने बच्चों को हिंदी बोलना, लिखना, पढ़ना सब सिखाया जब की उसकी उपयोगिया यहाँ शून्य है,
    जब हिंदी बिलकुल अनाथ थी तब तो इसका किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा अब क्या बिगड़ेगा, देवनागरी लिपि का टंकण पहले भी बहुत कम लोग जानते थे, और तब भी यह आसन नहीं था, एक वर्तनी के लिए बहुत सारे बटन दबाने पड़ते थे शायद यही वजह है कि लोग इसे सीखने से कतराते थे, एक मिसाल देना चाहूंगी:
    बेग़म अख्तर बहुत अच्छी ग़ज़ल गायिका थीं, लेकिन हमेशा पक्के रागों में ही गाती थीं लोग उसकी नक़ल नहीं कर पाते थे शायद यही वजह है कि बहुत काम लोग उस ज़माने में ग़ज़ल गाते थे, लेकिन जगजीत सिंह जी ग़ज़ल को वो रूप दिया जिसे हर कोई गा पाया और ग़ज़ल के साथ खुद को जोड़ पाया, अब आप कहेंगे कि असली ग़ज़ल वही है जो बेग़म अख्तर गाती थी- सही लेकिन क्या फायदा जब हम उसका आनंद सही तरीके से नहीं ले पायें
    ज़माना बदलता रहा है और बदलता रहेगा, हिंदी ने अपनी अच्छी खासी जगह बना ली है, और देवनागरी तो रोज-रोज नए मकाम तय कर रही है, अब तक १५०००० चिट्ठे देवनागरी में छप चुके हैं:

    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
    सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा

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