रविवार, 21 जून 2009

हिन्दी: आख़िर कहाँ चूकें हम

डॉक्टर महेंद्र एक जाने माने भाषाविद हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में लंबे समय तक शिक्षक रहे है. इन दिनों वे मिलर-फिशेर सिंड्रोम जैसी जटिल बीमारी से जूझ रहे हैं. पर इसके बावजूद उन्होंने हिन्दी के लिए अपना काम जारी रखा है. साथ ही स्कूलों के लिए उनका काम जारी है. इस मुश्किल समय में भी उन्होंने ‘युवा’ से हिन्दी के बारे में बातचीत की. पेश है मुख्या अंश:

कंप्यूटर या आई टी को तो रोक नही सकते है. पर यह सच्चाई है की हिन्दी में काम बहुत कम हुआ है इस (कंप्यूटर के) क्षेत्र में. भले ही अंगरेजी को हम कोसते रहें पर इन्टरनेट खोलिए तो अंगरेजी में आपको किसी भी विषय पर ढेर सारी सामग्री मिल जायेगी. भले ही सभी स्तरीय नही हों पर आप थोड़ा मेहनत करें तो अंगरेजी में नेट पर आपकी उम्मीद से ज्यादा मिल जाएगा.

सवाल यह है की आख़िर कहाँ चूकें हम. नेट पर हिन्दी में सामग्री की काफी कमी है. हिन्दी की पुस्तकें नेट पर नहीं के बराबर है. ब्लोग्स की बात छोडिये. सभी लोग ब्लॉग्गिंग नहीं करते हैं. पर कंप्यूटर का इस्तेमाल आज की नयी पीढी बहुतायत से करती है. उनके लिए कहाँ सामग्री है. नयी पुस्तकें आती हैं पर नेट पर शायद ही होती हैं. ऐसे में यह पीढी अंगरेजी की और भागेगी ही. भाषाविद होने के नाते कह सकता हूँ की रोमन देवनागरी से आसान लिपि है और इसमें काम करना कंप्यूटर पर और भी आसान है. हांलाकि देवनागरी ख़त्म होने का संकट नही है क्योंकि इसका इतिहास ६००० साल पुराना है. पर तकनीकी विकास में तेजी बहुत जरूरी है.

जहाँ तक लिपि की बात है तो लिपि का संकट तो है. मेरी बेटी कनाडा में रहती है. उसे हिन्दी बोलने और लिखने में परेशानी नही है. पर उसकी छोटी बेटी को है. वह हिन्दी समझ तो लेती है पर पढ़ और लिख नही पाती है. मैं जब वहां गया था तो उसे मैंने काफी कुछ पढाया था. पर कनाडा वाली स्थिति अभी भारत में आने की संभावना नही है.

दिक्कत तो यह है की हिन्दी में नाम और पैसा सभी तुंरत कमाना चाहते हैं पर काम करने वालों का अभाव है. ‘हैरी पॉटर’ का हिन्दी संस्करण लोकप्रिय नही हो पाया क्योंकि हिन्दी में कोई ढंग का अनुवादक उन्हें लंबे समय तक नही मिल पाया. दिल्ली विश्विद्यालय में ही नही देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों में भाषा-विज्ञानं पढाने वालों का अभाव है. दूसरे विषयों के विशेषज्ञ हिन्दी में भाषा-विज्ञानं पढ़ा रहे हैं. यही हालत काव्य शास्त्र, छायावाद में भी है.

कंप्यूटर और हिन्दी में भी तकनीकी किस्म की दिक्कतें कई बार हिन्दी वालों की कृपा से भी है. मुरली मनोहर जोशी जी मानव संसाधन विकास मंत्री बन कर आए पर उन्होंने भी हिन्दी के लिए कुछ नही किया. जबकि वे ख़ुद हिन्दी के हैं. ज्योतिष लेकर आ गए. नामवर सिंह का अमेरिका का विश्व हिन्दी सम्मलेन का बहिष्कार तो आप जानते ही हैं. रही-सही कसार हमारी राजनीतिक व्यवस्था कर देती है. नही तो टेक्नोलॉजी के स्तर पर हिन्दी का कब ही विकास हो चुका होता. कोई कारण नही है की भारत, जिसने दुनिया भर में बेहतरीन कंप्यूटर इंजीनीयर दिए, ख़ुद हिन्दी के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित नही कर सका. पर यह सब तो चलता रहता है. असल बात यह है की हम हिन्दी वालों ने क्या किया है.

दरअसल भाषा के विकास के लिए स्कूल के स्तर पर काम और व्यापक सुधार जरूरी है. स्कूलों में हिन्दी के शिक्षण का स्तर सुधर जाए तो हिन्दी का संकट काफी हद तक ख़ुद ही कम हो जाएगा. मैं ख़ुद भी इनदिनों कई स्कूलों में जा रहा हूँ. तकनीकी स्तर पर अगर फॉण्ट की समस्या का निवारण हो जाता है तो हिन्दी को अंगरेजी से आगे निकलने में वक्त नही लगेगा. पर यह काम जरूरी है भले ही इसमें कुछ वक्त लगेगा. दूसरा अगर हिन्दी में काम करने वाले प्रतिबद्ध होकर काम करते रहे तो भविष्य में कोई मुश्किल नही होगी. (जारी)

8 टिप्‍पणियां:

  1. यहाँ लिखन चाहता था पर जवाब लंबा हो गया इसलिए यहाँ लिखा है।
    जाल पर हिन्दी - रोना धोना बन्द करो आदरणीय शिक्षको!

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  2. आपकी बात से सहमत हैं.अछि प्रस्तुति. लेकिन "हांलाकि देवनागरी ख़त्म होने का संकट नही है क्योंकि इसका इतिहास ६००० साल पुराना है" यह किस आधार पर कहा जा रहा है

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  3. मै आपके विचारो से सहमत नहीं हूँ . आज नेट जगत पर हिंदी ब्लागों का जाल बिछ गया है . विदेशो में आज हिंदी अपना परचम फहरा रही है . शुक्रिया.
    महेन्द्र मिश्र
    जबलपुर.

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  4. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! बिल्कुल सही फ़रमाया! ज़्यादा से ज़्यादा ब्लॉग तो हिन्दी में ही है और हमारी राष्ट्रभाषा होने पर ये तो फक्र की बात है की हम हिन्दी में लिखते हैं !

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  5. मैं डा. महेंद्र जी के बहुतांश से सहमत हूँ.

    मैं सन्दर्भ नहीं दे पा रहा हूँ पर जाना है की विश्व कम्प्युटर कांग्रेस ने बहुत पहले ही देवनागरी को कम्प्युटर के लिए समग्र प्रचलित लिपियों में सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि माना था . लेकिन प्रचलन में रोमन सर्वाधिक होने तथा वैश्विक अनिवार्यता के चलते इस दिशा को अव्यवहार्य भी माना .

    दिन दूर नहीं की ये सुविधा /टेक्नालोजी ( कम्प्युटर और नेट ) जब और बढेगी तब ६० करोड़ लोगों और उनकी भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी का दबदबा चढ़ कर बोलेगा .

    बाज़ार अपनी जरूरतों के हिसाब से झुकेगा / झुक रहा है और वह भी काफी काम कर रहा है .लिपि की समस्या का समाधान तो पूर्णतः होगा भी / हुआ भी है हो भी रहा है लेकिन उसका भण्डार बढ़ाने तथा विकास करते रहने का भार या आनंद तो हम हिन्दी भाषा भाषियों पर ही है .

    बस हम ये ना चूकें और कमर बाँध फ़िलहाल इस मिसन में लगें .

    भाषा और लिपि का चाहे जितना भी मोह हो , जब उसमे ' ज्ञान ' की कमी रहेगी तो वह मजबूर होगा किसी भी भाषा और लिपि की और उन्मुख होने के लिए .

    और फिर वह गलत भी नहीं होगा .

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  6. हैरी पोटर के हिंदी संस्करण के बारे में मैं सहमत नहीं हूं। हैरी पोटर सिरीस की सातों किताबों का बहुत सुंदर अनुवाद भोपाल के मंजुल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

    मेरी जानकारी के अनुसार ये हिंदी किताबें भारत में पोटर सिरीज के अंग्रेजी संस्करण से भी ज्यादा बिकी हैं। प्रथम किताब की शायद 90,000 प्रतियां कुछ ही महीनों में बिक गई थीं। साधारणतः हिंदी की बच्चों की किताबें की 1000 प्रतियां भी बिक जाए, तो बड़ी बात है।

    इसलिए हिंदी के बारे में नेगेटिव न सोचकर आशावादी रहते हुए उसकी उन्नति के लिए कार्य करते जाएं।

    आपके ब्लोग में जितने भी लोगों का आपने इंटर्व्यू आदि लिया है, वे सब अंग्रेजी दां लोग हैं, जिन्हें हिंदी की असली स्थिति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। इसलिए आपका ब्लोग हिंदी के बारे में एक-पक्षीय नजारा ही प्रस्तुत कर पा रहा है। यह आपके ब्लोग की बड़ी कमी मुझे लगती है।

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