सोमवार, 27 जुलाई 2009

"समीर लाल उड़नतश्तरी वाले" : आख़िर इस नाम का राज क्या है

सबसे पहले तो गुस्ताखी माफ़! पर जब से मैंने 'समीर लाल उड़न तश्तरी वाले' का नाम ब्लॉगवाणी पर देखा तभी से मेरे पेट में दर्द शुरू हो गया. वैसे तो मैंने भी बाबा समीरानंद को इस नए नाम की बधाई आनन-फानन में दे डाली ताकि कोई और पहले से इसका कॉपीराइट लेने के बारे में विचार शुरू न कर सके. पर अब तक नहीं समझ पाया कि आखिर इस नाम की जरूरत क्यों पड़ी - 'समीर लाल उड़न तश्तरी वाले'!

अब सारी ब्लॉग दुनिया जानती है की उड़नतश्तरी सिर्फ और सिर्फ उन्हीं की है और कोई भी इसमें उड़ने की जुर्रत करने की सोच भी नहीं सकता है ऐसे में इस नाम की जरूरत क्यों पड़ी? अब कोई दो-चार उड़नतश्तरी हो तो शायद सोचें कि कुछ ख़ास पहचान के लिए यह किया जाय. जैसे दिल्ली में मिठाई की दुकानों पर लिखा होता है. अग्रवाल स्वीट्स 'करांची वाले' या अग्रवाल स्वीट्स 'देशी घी वाले' या चांदनी चौक के पराँठे वाली गली में अपनी पहचान के लिए लिखा होता है पराँठे वाली दुकान 'असली वाले' .... आदि-आदि. पर यह समस्या कम से कम अपने बाबा समीरानंद को तो नहीं हो सकती है।

न ही बाबा को यह समस्या है कि ब्लॉग पर उनके हमनाम कई पैदा हो गए हों और उनसे प्रतियोगिता का कोई खतरा हो गया हो. वैसे कुछ समीर को मैं जानता हूँ पर निश्चिंत हूँ कि उनके पास ब्लॉग लिखने के बारे में हम निठल्लों की तरह सोचने का भी वक्त नहीं है. जैसे दुनिया के सबसे बड़े अखबार के मालिक भी समीर साहेब ही हैं. पर ब्लॉग लेखन (ख़ास कर हिंदी से) उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. तो यह खतरा बाबा समीरानद को कतई नहीं है. एक समीर हमारे पुराने बॉस हुआ करते थे, बड़े प्यारे से. पार्टियाँ देने में उनकी कोई सानी नहीं थी और घूमने के भी गजब शौकीन थे. बाद में वे देश के एक बेहद मशहूर टीवी चैनल में बॉस बनकर चले गए.

एक समीर काग्डी नाम का मेरा मित्र बना, जब मैं नेशनल डिफेन्स अकादेमी में चयनित होकर उसके साक्षात्कार के लिए बंगलोर गया था. चार दिन की दोस्ती वह परवान चढी की सेलेक्शन होने बाद भी काफी दिनों तक पत्र लिखता रहा जब तक की नेवी में वह पायलट नहीं बन गया और मैंने उसे चिठ्ठी के जबाव में लिखा था की पत्रकारों से मित्रता कहीं तुम्हारे करियर में दिक्कत तो नहीं देगी? उसके बाद तो वह महानुभाव गधे की सींग की तरह गायब हो गए.

एक समीर और मेरा मित्र बना. समीर महेन्द्रू नामक यह मित्र तब आया जब मैं पीटीआई में काम कर रहा था और वह भी साथ ही था. बाद में वह Dow jones में चला गया और मेरा संपर्क टूट गया. और, एक समीर साहेब हमारे पडोसी हैं. ऐसे की उनके दरवाजे और मेरे दरवाजे को संभालने वाला खम्बा भी फ्लैट में एक ही है. पर इन साहब से पिछले चार साल में चार बार से ज्यादा बात नहीं हुई है. पेशे से आईटी पेशेवर हैं और लिखने-पढने के धंधे को निचले तबके का काम मानते हैं. गनीमत यह है कि एक अखबार लेते हैं और उसे कभी-कभी पढ़ते भी हैं.

पर जहाँ तक मेरी समझ है तो इन चारों-पाँचों समीर से इन्हें तो कतई खतरा नहीं है. फिर यह 'समीर लाल उड़नतश्तरी वाले' जैसा खोजपूर्ण नाम क्यों? अगर पाठकगण मेरी मदद कर सकते हैं तो जरूर सुझाव दें क्योंकि मैं उम्र के इस पड़ाव पर दिल्ली में दूसरा चांदनी चौक नहीं बनवाना चाहता हूँ (अपने सर पर).... पर यह न कहियेगा कि नाम में क्या रखा है?

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

हाँ, देवनागरी के विकास का इतिहास ६००० साल पुराना

कुछ समय पूर्व एक लेख (हिंदी: आखिर कहाँ चूकें हम, २१ जून) में वरिष्ठ ब्लॉगर और इतिहास के विद्वान पी एन सुब्रमनियन ने अपनी प्रतिक्रिया में यह सवाल उठाया था कि आखिर देवनागरी लिपि का इतिहास ६००० साल पुराना कैसे हुआ? सुब्रमनियन जी के सवाल गंभीर थे और जवाब की अपेक्षा रखते हैं. ऐसे में मैंने इस मामले को फिर से डॉ. महेंद्र के सामने रखने का मन बनाया और साथ ही इतिहास में भी कुछ गोता मारने की कोशिश की.

देवनागरी मूलतः संस्कृत की लिपि कही जाती है पर संस्कृत का इतिहास भी ६००० साल पुराना नहीं है. "द वंडर दैट वाज इंडिया" के लेखक और इतिहासविद ए एल बाशम प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद को ज्यादा से ज्यादा २००० ईसा पूर्व का मानते हैं. इस प्रकार से यह देवनागरी के विकास की बात मात्र ४००० वर्ष पुरानी ही होती है. वह भी खरोष्ठी, ब्राह्मी व अन्य लिपियों के रास्ते से. हांलाकि बाशम साथ यह भी स्वीकारोक्ति भी करते हैं कि संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरुप ही पश्चिम में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है.

जैसा कि बाशम लिखते हैं " प्राचीन भारत के महत्तम उपलब्धियों में से एक उसकी विलक्षण वर्णमाला है जिसमें प्रथम स्वर आते हैं और फिर व्यंजन जो सभी उत्पत्ति क्रम के अनुसार अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत किये गए हैं. इस वर्णमाला का अविचारित रूप से वर्गीकृत तथा अपर्याप्त रोमन वर्णमाला से, जो तीन हजार वर्षों से क्रमशः विकसित हो रही थी, पर्याप्त अंतर है. पश्चिमी देशों द्वारा संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरूप ही यूरोप में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है."

खैर, इस कथन से संस्कृत की श्रेष्ठता भले ही सिद्ध होती हो पर इससे देवनागरी के ६००० साल पुराने होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है. पर डा. महेंद्र के अनुसार लिपि का विकास महज वेदों के विकास भर से नहीं जुड़ा हुआ है. वस्तुतः इनका विकास समझने के लिए चित्र लिपि और भित्ति चित्रों की ओर भी देखना होगा जहाँ से दुनिया कि सभी लिपियों का विकास हुआ है. चित्र लिपि से देवनागरी के विकास की बात समझनी हो तो पवर्ग सबसे अच्छा उदाहरण है जिसमें उच्चारण के समय ओष्ठद्वय ठीक उसी प्रकार की सरंचना बनाते हैं जिस प्रकार से पवर्ग के वर्ण लिखे जाते हैं.

डा. महेंद्र का यह भी कहना है कि अगर यह चित्र लिपि का देश में सबसे प्राचीन प्रमाण में से एक देखना हो तो मध्य प्रदेश में भीमवेदका की गुफाएं देखनी चाहिए. ये गुफाएं चित्र लिपि का बेजोड़ नमूना है और ६००० वर्ष से भी ज्यादा पुराना इसका इतिहास है. इसमें ज्यामितिक चित्रों से लेकर आधुनिक लिपियों के प्रमाण मिल जाते हैं. ऐसे में देवनागरी के विकास का इतिहास ६००० वर्ष से ज्यादा पुराना होता है. वैसे वेदों के बारे में एक बात और समझने की है कि वेद लिखित रूप में काफी बाद में अस्तित्व में आये. पर वाचिक परंपरा में वेदों ने भोजपत्रों पर अपना अस्तित्व कायम करने से पूर्व सैकडों या शायद हजारों सालों की यात्रा तय की है.

बुधवार, 22 जुलाई 2009

जब सूर्यग्रहण के चक्कर में फंसे हनुमान जी

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सूर्य ग्रहण का नजारा देखने के लिए कल रात से ही तैयारी कर ली थी- कैमरा, फिल्म वाला चश्मा ... - पर इन्द्र भगवान की कृपा. ऐन वक्त पर धोखा दे दिया. बादलों के साथ वो लुका-छिपी खेली कि टीवी के सामने बैठ कर ही पूर्ण ग्रहण देखने का संतोष करना पड़ा.

नहीं तो क्या-क्या तैयारी मैंने कर रखी थी मैं आपको कैसे बताऊँ? अब कल गया था शाम को हनुमान जी के मंदिर में. मंगलवार था हनुमान जी के दर्शन जरूरी थे. वैसे भी हनुमान जी एकमात्र देवता (वैसे देवगण उन्हें यह श्रेणी देने को तैयार नहीं है) है जिन्होंने सूर्य जैसे विशाल ब्रह्मांडीय पिंड को निगलने का दुस्साहस दिखाया था- कोई फल समझ कर! कम से कम तुलसीदास जी और वाल्मीकि तो यही कह गए हैं नहीं तो इस अज्ञ को इतना ज्ञान कहाँ?

खैर, चर्चा हनुमान जी की हो रही थी. तो मंदिर पहुँचने पर देखा तो हनुमान जी के दर्शन की लाइन ही गायब थी. मात्र दस बारह लोग खड़े थे. मैं खुश भी हुआ और विस्मित भी. खुश इसलिए की चलो जल्दी निबट लेंगे और विस्मित इसलिए कि यह क्या हुआ? इस विकसित दिल्ली में हनुमान भक्तों कि संख्या में एकदम से गिरावट कैसे आ गयी. मानो लाइन न हुई बजट के दिन सेंसेक्स का ग्राफ हो गया. पर इससे पहले मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाता कि पता चला मैं पवनपुत्र के सामने खडा हूँ.

पर यह क्या? जिस परमवीर ने सूर्य को निगल कर पूरी धरती पर ना जाने कितना लम्बा सूर्य ग्रहण कर दिया था वे खुद आज सूर्य ग्रहण की डर से लाल वस्त्र ओढे पड़े थे. जय हो हमारे पंडितों की. इधर उ़धर नजर दौडाई तो पता चला कि सभी मूर्तियों पर यही नजारा था. पूछा तो पता चला कि सूतक है और ग्रहण ख़त्म होने तक ऐसा ही रहेगा. अब अंधविश्वाशी आदमी तो आदमी भगवान तक को हमारे पंडितों ने ग्रहण के नाम पर डरा के रखा हुआ था. हनुमान जी तक को नहीं छोडा, इंसान को क्या छोडेंगे. अब, हनुमान जी क्या सोच रहे होंगे यह तो सिर्फ अनुमान ही कर सकते हैं. पर इतना तो जरूर कसमसा रहे होंगे कि ग्रहण तक इन पुजारियों ने मुझे ढँक रखा है इनको फिर से रामायण पढ़ाऊं. नहीं तो कम से कम टीवी तो देखने देते तो मैं ग्रहण का नजारा अपनी आँखों से ही सही देख तो लेता! अब इतने लम्बे सूर्य ग्रहण के लिए पूरी एक सदी तक इन्तजार करना पडेगा. आपकी क्या राय है?

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

कॉलेज में मेरा पहला दिन, जब हंसी फूट पड़ी

दिल्ली विश्वविद्यालय में आज से नया सत्र शुरू हो गया. दिल्ली विश्वविद्यालय में कॉलेज के छात्रों के लिए पहला दिन नए अनुभव वाला होता है. हमारी एक पाठिका ने अपना अनुभव 'yuva' के साथ बांटा है. उसका नाम और उसके साथियों का नाम इस पाठिका के अनुरोध पर बदल दिया गया है. पर अनुभव को ज्यों का त्यों पाठकों के लिए पेश किया जा रहा है :

आज मेरे कॉलेज का पहला दिन था. जैसा हमें परिचय कक्षा के दौरान १५ जुलाई को बताया गया था उस हिसाब से मैं दिल्ली विश्विद्यालय के साउथ कैम्पस में स्थित ARSD कॉलेज सबेरे ८.३० बजे पहुंच गयी. हमें कहा गया था विज्ञान की कक्षाएं सबेरे ८.३० से ही लगेंगी.
खैर, कॉलेज पहुँचने पर पता चला कि कक्षा की बात तो दूर यहाँ बैठना कहाँ है यह भी हम लोगों के लिए तय नहीं हो पाया था. अब ऐसे में मेरी स्कूल की सहेली नमिता जिसने रसायन शास्त्र में प्रवेश लिया था उसके साथ कॉलेज में अपनी कक्षा तलाशने निकल पड़ी. पता चला कि ऊपर के कमरे में कक्षा लगने वाली है. मैं भी उस कमरे में अन्य छात्रों के साथ बैठ गयी. उस थियेटरनुमा कमरे में बैठने के कुछ देर के बाद ही चार शिक्षकनुमा युवकों ने प्रवेश किया. यह बताया गया कि हमारा ओरिएन्तशन क्लास होने वाला है. हम लोगों से परिचय पूछा जाने लगा. हमारी होउबी के बारे में पूछा गया. जब मेरी सहेली की बारी आयी तो उसने कहा कि पुस्तकें पढना उसकी रूचि का काम है. इस पर उन युवकों के मुंह से निकला 'अरे, ये लडकियां किताब इतना क्यों पढ़ती हैं' . तब कही जाकर हमें समझ में आया कि हम उल्लू बनाए जा रहे है और ये शिक्षक नहीं हमारे सीनियर हैं. हमलोग फिर वहां से निकलने कि जुगत में लग गए.

पर एक बार फंसने के बाद निकलना आसान नहीं था. जो भी जाने के लिए उठ रहा था उसे गाना सुनाना पड़ रहा था. मेरी भी बारी आयी तो मेरे मुंह से निकल गया कि हम लोगों ने इतना सुना दिया है कुछ आप लोग भी सुनाएँ. इस पर वो थोडा घबराएं. पर कहा कि पहले मैं सुनाऊं फिर वे गायेंगे. मैंने गाना गाया - 'चंदा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे ...' इतना सुनना था कि उन चारों ने गाना शुरू किया - ' बहना ओ बहना तेरी डोली मैं सजाऊंगा ...' और गाते-गाते भाग खड़े हुए. फिर तो हम लोगों कि जो हंसी छूटी कि पूछिए मत. यहाँ तक कि अभी भी याद कर के हंस रही हूँ. कॉलेज का पहला दिन इतना मजेदार होगा मैंने तो सोचा नहीं था.

सोमवार, 13 जुलाई 2009

सितारा देवी, भूपेन हजारिका को संगीत अकादेमी फेलोशिप

जानी-मानी कत्थक नृत्यागना सितारा देवी और मशहूर संगीतकार भूपेन हजारिका को इस वर्ष के प्रतिष्ठित संगीत अकादेमी फेलोशिप से सम्मानित किया जायेगा। भारत के राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल १४ जुलाई को एक विशेष समारोह में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में इनके साथ-साथ कला और संस्कृति क्षेत्र की अन्य कई मशहूर हस्तियों को सम्मानित करेंगी. विस्त्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर जाएँ:
http://fachcha.com/youngistan/sangeet-natak-akademi-fellowship-for-sitara-devi-bhupen-hazarika/

रविवार, 12 जुलाई 2009

तो समलैंगिकता के नाम पर लूट की तैयारी है

(समलैंगिकता के बहाने-II)
इनदिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिलों का मौसम चल रहा है। 'युवा' की ओर से कॉलेज में दाखिले के लिए कुछ छात्रों से जब समलैंगिकता पर राय जानने की कोशिश की गयी तो अधिकाँश तो इस मामले पर चर्चा करने से बचते रहे पर कुछ छात्रों ने बड़ा ही अजीब सा सवाल खडा कर दिया. हिन्दू कॉलेज में दाखिले के लिए आये एक छात्र ने उल्टे पूछ डाला कि वह कॉलेज में हॉस्टल चाहता है वह भी सिंगल कमरे वाला ताकि उसे कोई समलैंगिक कि श्रेणी में नहीं डाले. यह बड़ा ही अजीब किस्म का सवाल था. पर सच्चाई यही है कि इस ताजा फैसले से सिंगल सेट के कमरों की मांग एकाएक बढ़ गयी है, सिर्फ इसलिए कि दूसरे दोस्त उसे इस श्रेणी में डालकर चिढाने न लगे.

यह सामाजिक संबंधों में अदालती फैसले के बाद रातों-रात आये बदलाव का परिचायक है। संबंधों को इस प्रकार परिभाषित कर दिया जाय कि एक सहपाठी दूसरे सहपाठी को शक की निगाह से देखने लगे यह आने वाले समय में खतरनाक बदलाव के संकेत हैं. परिवार के स्तर पर क्या होने वाला है इसका अभी अंदाजा लगाने में समाजशास्त्रियों को वक्त लग सकता है पर वैसे भी बिखरते परिवारों के युग में यह अधिकार एक बहुत बड़ा झटका है जिसे संभालना आसान काम नहीं होगा. वैसे भी भारतीय संयुक्त परिवार प्रगतिशील मध्यमवर्ग की प्रगति में रोड़ा बनता रहा है.

भारत में एकल परिवारों का उदय और विकास इस मध्यवर्ग के मदद से ही हुआ है। वर्ना उच्च स्तरीय या निम्न वर्गीय परिवार अभी भी संयुक्त परिवारों की थाती संभाले हुए हैं. कहने को यह मध्य वर्ग सबसे प्रगतिशील है पर सबसे स्वार्थी भी और उसके इस स्वार्थपरता व तथाकथित प्रगतिशीलता का फायदा सबसे ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उठा रही हैं. (यही काम पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी का भी था ब्रिटिश राज में). क्योंकि जितना ज्यादा आप अकेले होंगे उतना ही ज्यादा आपकी निर्भरता इन कम्पनियों, इनकी सेवाओं और इनके उत्पादों पर होगी. तब आप अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा इन्हें देंगे जो कि आप अब तक बैंकों में बचत करते रहें हैं. परिवार में रहते हुए यह खुली लूट संभव नहीं है. इसलिए अधिक आमदनी के लिए इन परिवारों को तोड़ना बेहद जरूरी है क्योंकि एकल परिवार भी अब संयुक्त परिवारों की तरह (बदलते समय और बुजुर्गों की सूझ-बूझ की वजह से) ही मजबूत हो चुके हैं. अगर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों व उनकी सेवाओं का आप हिसाब लगाएं तो आपको खुद समझ में आ जाएगा की आपके वेतन का कितना बड़ा हिस्सा इनको नियमित रूप से चला जाता है. और, यही कंपनियाँ इन गे परेड के लिए पैसे देती है, सेमीनार करवाती हैं और इनका मीडिया में भरपूर प्रसार हो सके इसकी भी व्यवस्था करती है.इन स्थितियों में परिवार और अन्ततः समाज को बचाए रखने की जिम्मेदारी किसकी बनती है इसका निर्णय मैं आप पाठकों पर छोड़ता हूँ.

जहां तक मनोविज्ञान की बात है तो मैंने समाजशास्त्र भी पढ़ा है और मनोविज्ञान का भी विद्यार्थी रहा हूँ। इस नाते मुझे पता है कि हर मानवीय क्रिया की एक न्यायसंगत और तार्किक व्याख्या भी होती है. यहाँ तक की बलात्कार, हत्या और दंगे जैसे कृत्यों की भी. अगर ये भी ज्यादा संख्या में होने लगे और कानूनी व्यवस्था इसे संभालने में सफल न हो पाए तो कानून को इसे सिर्फ इसलिए मान्यता दे देना चाहिए कि अब इसे ज्यादा संख्या में लोग करने लगे हैं? कानूनविदों को इस पर विचार करना चाहिए.

जहाँ तक समलैंगिकों की बात है तो इनमें अधिकाँश वे लोग हैं जो यौनातिरेकता से उब चुके हैं और यौन आनंद के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार खड़े हैं। और, ऐसे लोगों में अधिसंख्य ऐसे हैं जिनके पास प्राकृतिक यौन सुख के एक नहीं अनेक साधन उपलब्ध हैं. जो लोग कामसूत्र और अजंता, खजुराहो का उदाहरण देते हैं वे शायद यह भूल जाते हैं कि इनमें समलैंगिकों का कोई स्थान नहीं है. क्षेपक या अपवाद की बात अलग है. और, इन सबकी रचना तब हुई थी जब भारत का स्वर्णिम काल था और इनके रचना काल के बाद से ही तत्कालीन साम्राज्य के पतन की भी शुरुआत हो गयी थी.

अगर इस हिसाब से देखें तो इस मामले में हम स्वर्ण युग?? में जी रहे हैं क्योंकि अमेरिका, यूरोप जैसी महाशक्तियां अभी मंदी के दौर से गुजर रही हैं और भारत ने फिलहाल अपने को बेहतर स्थिति में बनाए रखा है. आने वाला साल और भी बेहतर होगा क्योंकि दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम होने वाले हैं. यह दिल्ली के लिए कम से कम इस दशक में सबसे बेहतर साल होगा. अब इतिहास के अनुसार चलें तो इस एक-डेढ़ साल में हम ऐसे विकसित कामुक समाज की रचना कर चुके होंगे जिसमें किसी भी प्रकार के यौन सुख पर किसी प्रकार की बाधा नहीं होगी क्योंकि हमें विदेशियों को खुश रखना है. चाहे वे गे या लेस्बियन का यौन सुख हो या फिर अन्य प्रकार के यौनाचार. इस स्वर्णिम अवसर पर सब कुछ उपलब्ध कराने की व्यवस्था इस फैसले के बहाने होने लगी है. अब इससे चाहे देश में ऐड्स फैले या फिर देश कि संस्कृति नष्ट हो. पैसा बनाने वाले इससे पैसा बनाने का रास्ता तैयार कर चुके हैं. मीडिया, कोर्ट इनके लिए औजार भर हैं वह भी इसलिए की आम जनता या हम अब भी इसपर बात करने से कतरा रहे हैं. और, हमारी कमजोरी को उन्होंने समझ लिया है बहुत ही अच्छी तरह.

शनिवार, 11 जुलाई 2009

समलैंगिकता के बहाने




चंदन शर्मा

सोचा था इस विषय पर नहीं लिखूंगा. पर जब मोहल्ले में आग लगी हो तो आपके सामने बस दो ही विकल्प बचते हैं- या तो आग बुझाने में मदद की जाय या फिर अपने घर को जलते देखने के लिए तैयार रहा जाय. यह आशा करना कि मोहल्ला जलने के बाद भी आग से मेरा घर सुरक्षित रह जाएगा, ऐसा सोचना बेबकूफी के अलावा और कुछ नहीं है. और, अभी वक्त ऐसा नहीं आया है कि मूक दर्शक बनकर घर जलते देखते रहा जाय.

समलैंगिकता को मिले कानूनी अधिकार पर बहस में पता नहीं कितने हजार क्विंटल अखबारी कागज़ और टेलीविजन के कितने घंटे जाया हो चुके होंगे पर मित्रों के इतने फ़ोन और मेल आये कि इस मुद्दे पर लिखने से रोकना मुश्किल हो गया. वैसे कानूनी पक्ष के बारे में दिनेश राय द्विवेदी जैसे विद्वानों ने काफी कुछ लिखा है इसलिए इसपर विस्तार में ना जाते हुए सिर्फ इतना ही कहूँगा कि भारत के पूर्व अत्तोर्नी जनरल सोली सोराबजी ने व्यक्तिगत निजता के समर्थन के साथ धारा ३७७ के दंडात्मक प्रावधानों को भी बनाए रखने कि वकालत की है.

पर सवाल क्या सिर्फ व्यक्तिगत निजता भर से जुड़ा हुआ है. कतई नहीं. अगर ऐसा होता तो यह मामला कोर्ट में चुपचाप आता और एक सामान्य खबर या अनजान फैसला बन कर रह जाता. पर जिस तरह से तैयारी कर के पूरे देश में 'तथाकथित समलैंगिकों' के परेड निकाले गए और लाखों-करोडों रूपये इसके नाम पर फूंके गए वह कुछ और ही इशारा करता है. और, इन 'तथाकथित समलैंगिकों' की परेड मैंने भी कवर की है. अस्सी फीसदी भीड़ इसमें किन्नरों की होती है जो निश्चित रूप से भाड़े पर लाए जाते हैं ताकि मीडिया पर कवरेज़ का दबाव बनाया जा सके. और, हमारे देश का कोर्ट और मीडिया? जो मुजफ्फरनगर, मेरठ जैसे शहरों में युवाओं के प्रेम-प्रसंगों के कारण हर महीने हो रही हत्याओं का हिसाब नहीं रख पाता वह समलैंगिकों के अधिकार के लिए तुंरत आगे आ जाता है क्योंकि इससे 'बड़े नाम' जुड़े हुए हैं. ..

दुर्भाग्य से अधिसंख्य जनता जो समलैंगिकता के विरोध में है वह भी कमजोर दिखती है क्योंकि अव्वल तो वह 'कुतर्की' नहीं है और दूसरा इन सब बातों पर चर्चा करने से वह कतराती है। पर अगर इससे बचा जाएगा तो कल इसकी लपटें आप के घर तक नहीं पहुंचेगी इस भरम में कतई नहीं रहना चाहिए. यह समलैंगिकों बनाम अन्य की लड़ाई नहीं है बल्कि समाज और परिवार के अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई है. और, माफ़ करें कोर्ट, जो सिर्फ प्रमाणों और महज वकीलों के तर्क पर फैसले सुनाता है वह आपके और लिए और आपके समाज के लिए लडेगा यह उम्मीद करना बेमानी है. (जारी)

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

हमलों के बाद आर्थिक सेहत के लिए ऑस्ट्रेलिया छवि सुधार में

चंदन शर्मा

इन दिनों एक ऑस्ट्रेलिया का एक प्रतिनिधि मंडल भारत के दौरे पर आया हुआ है. शिक्षा से सम्बंधित यह प्रतिनिधि मंडल भारत में ऑस्ट्रेलिया की छवि सुधार करने में लगा हुआ है और उन्ही बातों को दुहरा रहा है जिसकी चर्चा हम इस मंच पर पहले भी कर चुके हैं (देखें: ऑस्ट्रेलिया में नहीं है रंगभेद और ऑस्ट्रेलिया से सम्बंधित अन्य लेख व खबरें). इस प्रतिनिधिमंडल ने कल मीडिया को कहा कि वहां भारतीयों पर हो रहे हमले रंगभेदी न होकर अवसरवादी और लूट-पाट की नीयत से किये गए हैं.
ऑस्ट्रेलिया के शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कॉलिन वाल्टर्स के अनुसार ऑस्ट्रेलिया भारतीयों के लिए 'सुरक्षित' देश है और हमलों को रोकने के लिए कई कानूनी प्रावधान भी किये गए हैं. उनका यह भी तर्क है कि इस देश में एक लाख से ज्यादा भारतीय बसते हैं. वाल्टर्स साहब कि बात से चलिए सहमत भी हो लेते हैं पर सच्चाई यह है कि भारतीयों पर हमले रुक नहीं रहे हैं. मान भी लिया जाय कि यह सब लूट-पाट के लिए किया जा रहा है तो भी भारतीय छात्र ही इसके निशाने पर क्यों हैं. कहीं न कहीं रंगभेदी मानसिकता तो काम कर ही रही है. और, भारत जैसे देश में ऑस्ट्रेलिया को छवि सुधार कि जरूरत क्या है?
दरअसल सारा खेल यहाँ पैसों का है. ऑस्ट्रेलिया के शिक्षा के बजट का एक बड़ा हिस्सा भारतीय छात्रों से आता है. आंकडों में देखें तो करीब ८००००० छात्र वहां पढ़ने के लिए जाते हैं जिनका सालाना खर्चा औसतन छः लाख से १२ लाख प्रतिवर्ष होता है. साथ ही उनसे वसूली जाने वाली फीस भी वहां के स्थानीय छात्रों से करीब चार गुनी होती है. यानी कि करीब ५००० से ६००० करोड़ की रकम भारतीय खुशी-खुशी ऑस्ट्रेलिया की झोली में शिक्षा के नाम पर डालते रहे हैं. जाहिर है कि हाल के हमलों से ऑस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या में कमी आयी है जो ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक सेहत के लिए नुकसानदेह है. सारी कवायद इसे संभालने के लिए ही है. फिर यह मौसम दाखिलों का मौसम है अगर इसमें चूकें तो पूरा साल ही खाली जाएगा. सारी छवि सुधार के पीछे का सत्य यही है - कम से कम फिलहाल.

रविवार, 5 जुलाई 2009

तुम

तुम
होती हो पास
जब खिलते हैं फूल महुआ के
खुशबू भीनी-भीनी सी बिखर जाती है
फिजां में
लगता है महुआ का खुमार
सर चढ़ कर बोलेगा
तभी आना होता है तुम्हारा
पत्तों की सरसराहट से छुप कर
ठीक वैसे ही
जैसे चाँद छुप जाता है बादलों की ओट में
इन दिनों शर्म के मारे
पर चांदनी उसकी छुपती नहीं

तुम
होती हो मेरे पास
जब चलती है हवा
इन चिपचिपाती गर्मियों में
ठण्ड का अहसास देती हुई
रेगिस्तान में ज्यों चल पड़े
बर्फीली बयार

तुम
होती हो पास
जब भरी भीड़ में
होता हूँ तनहा
किसी समंदर के लाइट पोस्ट के मानिंद
लहरों के शोर में तनहा, अडोल,
अकेले

चुपचाप तुम्हारा यूँ दबे पाँव आना
न जाना छोड़कर
तनहा
कहीं

यूँ लगता है
खुशबू बस गयी हो
हवा में
या
घुल गया हो रंग फूलों में
कुछ नया सा
कुछ अपना सा
कि जुदा करना मुश्किल हो

बुधवार, 1 जुलाई 2009

थोड़ा लिबरहान -सिबरहान भी

अरे ई का! ई लिबरहान तो गजबे कर दिया. हम तो सोच-सोच के एकदम तेंसनिय गए थे की अबकी ई पार्लियामेन्ट में क्या करेंगे. ई कल से शुरू होगा संसद तो कुछ मुद्दा चाहिए न. आ ई अखबारवाला सब केत्ता बड़ा-बड़ा छापा है जैसे की एकदम, उ का कहते हैं, एक्सक्लूसिव हो, नेताजी आज एकदम उछल रहे थे आज सुबह-सुबह अखबार पढ़ के.


एकदम से हांक लगाई, अरे, पी ऐ साब को बुलाओ. अब बेचारे पी ऐ को क्या मालूम. घुसते ही डाट पड़ी. अरे बबुआ जी ई इत्ता बड़ा ख़बर आया आ हमको बताये भी नही. बबुआ जी ने जान बचाने की कोशिश की – ई ख़बर तो टीवी में कल्हे से चल रहा है. ई तो सब पुराना बात है. नेताजी बिदके – ई तुम्ही को मालूम है की क्या पुराना बात है और क्या नया? जानते तो पी ऐ ही बने रहते! आ टीवी के ख़बर पर तो परतिकिरिया दिया जाता है न. एक्शन थोड़े लिया जाता है. जाइए सब को बुलाएये. आ सबको फ़ोन लगाकर हमको भी बात कराइए. और हाँ ई वातानुकूलन यंत्र, क्या कहते हैं, अ सी भी बंद कर के जाइए. दो दिन से सोचते सोचते पाँच किलो पसीना निकल गया है. कोई काम का नही है ऐ सी.

अखबार dekhne से पहले नेताजी को लग रहा था की इस बार पार्लियामेन्ट के गेट पर खड़ा होके ई मानसून का बारिश देखने और ई बंगाली बाबु के बजट पर ताली बजाने के अलावा और कोनो काम ही नही रहेगा. अब कम से कम उ ‘लोहा पुरूष’ को गरिया के पिघ्लायेंगे तो. अब नेताजी तो चिंता में निमग्न थे तो फ़ोन बज उठा. लगता है बबुआजी ने फ़ोन लगा दिया. नेताजी सही थे. उधर दूसरी तरफ़ पार्टी का ही आदमी था. नेताजी ने तुंरत फरमान जारी किया ‘सुनिए, अब जब तक बजट नही आ जाता है ई लिबरहान की भट्टी में फूँक मारना है. ई भट्टी पुराना हो गया है. थोड़ा जोड़ लगायेंगे तो नया हो जाएगा. अबकी सब लोहा पिघला के ही दम लेना है. बजट में ताली-गाली तो सभे करेगा. इसमें लीड लेना है, समझे.