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शनिवार, 27 जून 2009

अनिल विल्सन, सेंट स्टीफेंस और हिन्दी


चंदन शर्मा
अनिल विल्सन और हिन्दी! कुछ अजीब सा लगता है.पर सेंट स्टीफेंस के पूर्व प्रिंसिपल का नाम इस कॉलेज के साथ यूँ चस्पा हो चुका है कि कोई उन्हें इससे अलग कर देखने की सोच भी नहीं सकता है. यह भी नही कि इतनी जल्दी उन्हें श्रधांजलि देने का वक्त आ जाएगा?

मेरा अनिल विल्सन से मिलना ज्यादा नही रहा, सिवाय एक बार उनके साथ बैठकर चाय पीने और कुछ छिटपुट मुलाकातों को छोड़ कर. करीब आठ या नौ साल पहले. उनदिनों मैं हिन्दी अखबार अमर उजाला के लिए काम करता था और मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय की रिपोर्टिंग का काम सौंपा गया था.

चूँकि, दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले का मौसम था इसलिए करीब हर दिन दो-तीन कॉलेज का चक्कर लगाना होता था, खबरों के लिए. सेंट स्टीफेंस में भी इसी सिलसिले में जाना हुआ था. वैसे अंगरेजी के रिपोर्टरों को भी सेंट स्टीफेंस से ख़बर निकालने में नानी याद आती थी तो हिन्दी वाले का क्या कहना. पर हिम्मत कर के कॉलेज चला ही गया. जब प्रिंसिपल (अनिल विल्सन) के कार्यालय में पहुंचा तो मुझे बताया गया कि कुछ अंगरेजी के रिपोर्टर अभी-अभी आकर गए हैं पर ‘सर’ ने मिलने से मना कर दिया है. फ़िर भी रिपोर्टर की आदत से मजबूर, मैंने अपना विजिटिंग कार्ड देकर कहा कि इसे दीजिये मन कर देंगे तो वापस चला जाउंगा. आर्श्चय तो तब हुआ की अन्दर से दो मिनट में ही बुलावा आ गया.

“तो आप ही चंदन हैं”, यह उनका पहला वाक्य था. मैं चौंका की एक खांटी अंग्रेजीपरस्त कॉलेज में ये एक हिंदीवाले को कैसे जानते हैं? पर अभी कुछ और झटके लगने बाकी थे. यूनिवर्सिटी के बारे में आपकी रिपोर्ट मैं देखता हूँ, लगभग हर दिन! उनका दूसरा वाक्य था. पर उस दिन उन्होंने दाखिले पर बात करने से साफ़ मना कर दिया यह कहते हुए की अखबार में छपने वाली कोई बात मैं नहीं करूंगा. पर उसके बाद करीब आधे घंटे तक यह मुलाक़ात चली और उन्होंने चाय भी पिलाई. उन्होंने मॉस-मीडिया के बारे में एक नया कोर्स शुरू करने की योजना के बारे में भी बताया.

बातों ही बातों में मैंने उनसे हिन्दी का पाठ्यक्रम कॉलेज में नही होने की बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर नही लिखने का वादा करो तभी इस पर बात करूंगा. मेरे हामी भरने पर उन्होंने बताया कि हिन्दी का पाठ्यक्रम वे यहाँ लाना चाहते हैं पर कई दिक्कतें और दबाव हैं. कॉलेज की भलाई के लिए वे इसका खुलासा नहीं कर सकते हैं पर उनकी इच्छा है की हिन्दी यहाँ भी शुरू हो.

खैर, इस आधे घंटे की मुलाक़ात के बाद उनसे एक-दो बार यूनिवर्सिटी के कार्यक्रमों में उनसे मुलाक़ात हुई पर बेहद संक्षिप्त. वैसे भी कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति दुर्लभ होती थी दूसरे अधिकारियों या प्रिंसिपल के मुकाबले. उसके कुछ समय के बाद विवादों के बीच कॉलेज से विदाई की ख़बर आयी और हिमाचल विश्वविद्यालय के कुलपति बनने की भी. अपनी अखबारी व्यस्तता और शिक्षा की बजाय राजनीति का खबरी बनने के कारण और कुछ अपने आलस्य के कारण भी उनसे बात नही हो पाई. पर उनका हिन्दी के लिए दर्द… क्या स्टीफेंस सुनेगा?

गुरुवार, 25 जून 2009

प्रवासी भारतीय भी कूदे सरबजीत को बचाने की मुहिम में

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय सरबजीत को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद उसे बचाने की मुहीम में प्रवासी भारतीय भी कूद पड़े हैं. ‘फच्चा.कॉम’ के अनुसार एक प्रवासी द्वारा जारी किए गए ई-मेल में इस मुहीम के लिए पाकिस्तान के नीति निर्माताओं और वहां के राष्ट्रपति को लिखने की अपील की गयी है. इस ई-मेल को हम पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं.

Dear Friends,

Sub: MERCY APPEAL

Would you be kind enough to write your lawmaker and President of Pakistan to spare the life of an innocent person. he did not commit.
It is absolutely beyond the shadow of doubt that Sarabjit Singh is a victim of mistaken identity or framed being an Indian national who unknowingly walked across the border.and arrested by Pakistani Security forces.

Please support the mercy petition being filed by Ansar Burney. Your support might save an innocent person from being executed for the crimes
Address of Embassy of Pakistan:

3517 International Ct., NW
Washington, DC, 20008
(202) 243-6500


Thank you
Ramesh Gupta

मंगलवार, 23 जून 2009

हिन्दी से गायब हो सकता है 'ष'

हिन्दी के चाहने वालों के लिए एक ख़बर यह है की वर्तनी से अब 'ष' को हटाने की तैयारी हो गयी है. यांनी की हिन्दी वर्णमाला में आने वाले समय में तीन की बजाय दो ही स होंगे – स और श. राष्ट्रीय शक्षनिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसी ई आर टी) में यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. दूसरे शब्दों में कहें तो षष्ठ, षड्कों जैसे शब्द आने वाले समय में मूर्धन्य 'ष' की जगह तालव्य 'श' से लिखे जायेंगे.

अब यह कैसा लगेगा यह आप जाने पर एन सी ई आर टी ने हिन्दी की वर्तनी में कई बदलाव पहले से ही कर दिया है. और, व्यापक बदलाव पर केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय में काम चल रहा है. भाषाविदों की मानें तो लिपि और वर्तनी के मानक १९४२ में बनाए गए थे तब से अब तक मानकों में कोई बदलाव नही किया गया है और इसकी बेहद जरूरत है. भाषाविद महेंद्र कुमार के अनुसार मीडिया खासकर टेलीविजन के प्रसार से भाषा में कई बदलाव आ चुके हैं और इनको भाषा में समाहित करने की जरूरत है. उच्चारण के स्तर पर भी कई बदलाव हो चुके हैं. केंद्रीय हिन्दी निदेशालय भी इस पर काम कर रहा है.

अगर सब कुछ ठीक रहा तो कई और वर्ण की छुट्टी वर्णमाला से हो सकती है जिनका व्यापक उपयोग नही हो रहा है और जिनके बिना हिन्दी का काम यथावत चल सकता है. विद्वानों की राय में हिन्दी को इससे जहाँ सरल बनाने में मदद मिलेगी वहीं इससे हिन्दी और व्यापक भी होगी. यह अलग बात है की भाषा के स्तर पर आम हिन्दीभाषी इसे कितना स्वीकार कर पायेगा पर स्कूलों में पाठ्यक्रम में बदलाव से आने वाली पीढी के लिए हिन्दी का स्वरुप जरूर बदल जाएगा.

रविवार, 21 जून 2009

हिन्दी: आख़िर कहाँ चूकें हम

डॉक्टर महेंद्र एक जाने माने भाषाविद हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में लंबे समय तक शिक्षक रहे है. इन दिनों वे मिलर-फिशेर सिंड्रोम जैसी जटिल बीमारी से जूझ रहे हैं. पर इसके बावजूद उन्होंने हिन्दी के लिए अपना काम जारी रखा है. साथ ही स्कूलों के लिए उनका काम जारी है. इस मुश्किल समय में भी उन्होंने ‘युवा’ से हिन्दी के बारे में बातचीत की. पेश है मुख्या अंश:

कंप्यूटर या आई टी को तो रोक नही सकते है. पर यह सच्चाई है की हिन्दी में काम बहुत कम हुआ है इस (कंप्यूटर के) क्षेत्र में. भले ही अंगरेजी को हम कोसते रहें पर इन्टरनेट खोलिए तो अंगरेजी में आपको किसी भी विषय पर ढेर सारी सामग्री मिल जायेगी. भले ही सभी स्तरीय नही हों पर आप थोड़ा मेहनत करें तो अंगरेजी में नेट पर आपकी उम्मीद से ज्यादा मिल जाएगा.

सवाल यह है की आख़िर कहाँ चूकें हम. नेट पर हिन्दी में सामग्री की काफी कमी है. हिन्दी की पुस्तकें नेट पर नहीं के बराबर है. ब्लोग्स की बात छोडिये. सभी लोग ब्लॉग्गिंग नहीं करते हैं. पर कंप्यूटर का इस्तेमाल आज की नयी पीढी बहुतायत से करती है. उनके लिए कहाँ सामग्री है. नयी पुस्तकें आती हैं पर नेट पर शायद ही होती हैं. ऐसे में यह पीढी अंगरेजी की और भागेगी ही. भाषाविद होने के नाते कह सकता हूँ की रोमन देवनागरी से आसान लिपि है और इसमें काम करना कंप्यूटर पर और भी आसान है. हांलाकि देवनागरी ख़त्म होने का संकट नही है क्योंकि इसका इतिहास ६००० साल पुराना है. पर तकनीकी विकास में तेजी बहुत जरूरी है.

जहाँ तक लिपि की बात है तो लिपि का संकट तो है. मेरी बेटी कनाडा में रहती है. उसे हिन्दी बोलने और लिखने में परेशानी नही है. पर उसकी छोटी बेटी को है. वह हिन्दी समझ तो लेती है पर पढ़ और लिख नही पाती है. मैं जब वहां गया था तो उसे मैंने काफी कुछ पढाया था. पर कनाडा वाली स्थिति अभी भारत में आने की संभावना नही है.

दिक्कत तो यह है की हिन्दी में नाम और पैसा सभी तुंरत कमाना चाहते हैं पर काम करने वालों का अभाव है. ‘हैरी पॉटर’ का हिन्दी संस्करण लोकप्रिय नही हो पाया क्योंकि हिन्दी में कोई ढंग का अनुवादक उन्हें लंबे समय तक नही मिल पाया. दिल्ली विश्विद्यालय में ही नही देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों में भाषा-विज्ञानं पढाने वालों का अभाव है. दूसरे विषयों के विशेषज्ञ हिन्दी में भाषा-विज्ञानं पढ़ा रहे हैं. यही हालत काव्य शास्त्र, छायावाद में भी है.

कंप्यूटर और हिन्दी में भी तकनीकी किस्म की दिक्कतें कई बार हिन्दी वालों की कृपा से भी है. मुरली मनोहर जोशी जी मानव संसाधन विकास मंत्री बन कर आए पर उन्होंने भी हिन्दी के लिए कुछ नही किया. जबकि वे ख़ुद हिन्दी के हैं. ज्योतिष लेकर आ गए. नामवर सिंह का अमेरिका का विश्व हिन्दी सम्मलेन का बहिष्कार तो आप जानते ही हैं. रही-सही कसार हमारी राजनीतिक व्यवस्था कर देती है. नही तो टेक्नोलॉजी के स्तर पर हिन्दी का कब ही विकास हो चुका होता. कोई कारण नही है की भारत, जिसने दुनिया भर में बेहतरीन कंप्यूटर इंजीनीयर दिए, ख़ुद हिन्दी के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित नही कर सका. पर यह सब तो चलता रहता है. असल बात यह है की हम हिन्दी वालों ने क्या किया है.

दरअसल भाषा के विकास के लिए स्कूल के स्तर पर काम और व्यापक सुधार जरूरी है. स्कूलों में हिन्दी के शिक्षण का स्तर सुधर जाए तो हिन्दी का संकट काफी हद तक ख़ुद ही कम हो जाएगा. मैं ख़ुद भी इनदिनों कई स्कूलों में जा रहा हूँ. तकनीकी स्तर पर अगर फॉण्ट की समस्या का निवारण हो जाता है तो हिन्दी को अंगरेजी से आगे निकलने में वक्त नही लगेगा. पर यह काम जरूरी है भले ही इसमें कुछ वक्त लगेगा. दूसरा अगर हिन्दी में काम करने वाले प्रतिबद्ध होकर काम करते रहे तो भविष्य में कोई मुश्किल नही होगी. (जारी)

बुधवार, 17 जून 2009

देवनागरी के ख़त्म होने का खतरा तो है: नित्यानंद तिवारी


हिन्दी अकादमी के सदस्य और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर नित्यानंद तिवारी न सिर्फ़ हिन्दी के आलोचक और विद्वान है बल्कि उन्होंने उस दौर को काफी नजदीक से देखा है jise हिन्दी के लिए सूचना तकनीक का संक्रमण काल कहा जाता है. ‘युवा’ से एक लम्बी बातचीत में उन्होंने इस तकनीक और हिन्दी भाषा पर इससे पड़ रहे प्रभावों और आज की रचनात्मकता के बारे में विस्तार से चर्चा की है. उनके विचार हम किस्तों में पेश कर रहे हैं. प्रस्तुत है इसकी पहली किस्त:

हिन्दी के जाने-माने नाम और मेरे मित्र मैनैजर पाण्डेय जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से रिटायर होने वाले थे तो मैं उनके घर गया था उनकी सेवानिवृत्ति से करीब छः- सात महीने पूर्व. तब मैंने उनके यहाँ कंप्यूटर रखा देखा था. पूछने पर उन्होंने कहा कि चूंकि सब (शिक्षकों) के यहाँ कंप्यूटर लगा दिया गया है इसीलिए यहाँ भी इसे लगा दिया है. पर यह मेरे किसी काम का नहीं है.
इस घटना के काफी दिन हो चुके हैं पर मुझे लगता है की कंप्यूटर पर काम करना आना चाहिए. हिन्दी देश में सब जगह बोली जाने वाली भाषा है इसलिए हिन्दी में कंप्यूटर में काम जानना जरूरी है. हिन्दी का सूचना तकनीक से जुडाव जरूरी है. अब इस उम्र में इस काम को मैं सीख नही पाया और शायद इसकी जरूरत भी अब नही है. लेकिन इसमें काम करने के फायदे तो हैं. कागज़ पर माथा पच्ची से बचने के अलावे कई और सुविधाएं हैं. जैसे आप किसी रचना को स्टोर कर सकते हैं. उसमे बिना परेशानी के परिवर्तन कर सकते हैं आदि.

पर सुविधा ऐसी चीज है जो सब भुला देती है. जो स्थिति है उसमें तो देवनागरी ख़त्म हो जाने का खतरा तो है. जब रोमन में हिन्दी लिखने की सुविधा होगी तो लोग देवनागरी पर क्यो मेहनत करेंगे? मैं अपना उदाहरण बताता हूँ. मैं ख़ुद अच्छी भोजपुरी बोल लेता हूँ पर मेरे बच्चे नही बोल पाते हैं. उन्हें मैं इसके लिए दबाव नही दे सकता हूँ क्योंकि उन्हें अब इसकी जरूरत भी नही है. यह (भोजपुरी) तो दिल्ली में संपर्क भाषा नही है. पर हिन्दी तो दैनिक व्यवहार की भाषा है और उसी में कंप्यूटर पर काम करने में दिक्कत बनी हुई है. अगर इस स्थिति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सरकारी सरंक्षण प्राप्त है तब तो बहुत मुश्किल है की स्थिति में सुधर हो पायेगा. हिन्दी का इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है. हिन्दी भाषा में पढने-लिखने वाले लोग हैं और यह उनको अयोग्य बनाने की कोशिश है.

दरअसल भाषा आपका कमिटमेंट है और लिपि शब्द लिखने का एक तरीका है. यह वास्तविकता है और हमारे पहचान का एक हिस्सा भी. लिपि को बचाने के लिए कमिटमेंट या इमोशन होना चाहिए. बल्कि मैं तो कहता हूँ की कमिटमेंट और इमोशन दोनों होना चाहिए. कहा जा सकता है की लिपि बाहरी है. हमारे शरीर का रंग भी बाहरी है. पर क्या सचमुच यह बाहरी है. रंग बाहर की चीज नही है. यह तो रक्त की आंतरिक विशेषता है जो बाहर हमारे त्वचा के रंग के रूप में दिखती है. यह हमारे स्वस्थ्य और व्यक्तित्व का भी परिचायक है. ठीक लिपि भी इससे जुदा नही है. यह भी हमारे सामाजिक और रचनात्मक व्यक्तित्व का हिस्सा है. इसे हम अलग कर देख नही सकते हैं.

जहाँ तक कंप्यूटर पर रोमन में हिन्दी लिखी जाने की सुविधा (यूनीकोड) से हिन्दी के विकास की बात है तो यह दुधारी तलवार की तरह है. इससे हिन्दी का विकास तो होगा पर लिपि के रूप में देवनागरी ख़त्म भी हो जायेगी. अगर इसे बचाना है तो कमिटमेंट और इमोशन के साथ टेक्नोलॉजी में पर्याप्त विकास की जरूरत है वह भी इमानदारी से . नही तो बहाव कभी पीछे नहीं जाता है. हमेशा आगे जाता है और इसमें देवनागरी के मिटने का खतरा बरकरार है… (जारी).

रविवार, 14 जून 2009

हिन्दी पर खतरे और लुप्त होती देवनागरी

चंदन शर्मा

जय हो! हिन्दी का काफी विकास हुआ है. इतना कि ‘जय हो’ ऑक्सफोर्ड का दस लाखवां शब्द बनते-बनते रह गया. इतना कि आज हिन्दी में स्नातक और परा स्नातक करने वालों के लिए शिक्षण के अलावा रोजगार पाने के कई विकल्प हैं. इतना कि अब भारत में कहीं भी आप हिन्दी में काम चला सकते हैं. यहाँ तक कि बड़े-बड़े कारपोरेट कंपनियों की बोर्ड मीटिंगों में भी अंगरेजी के साथ-साथ हिन्दी में भी विचार-विमर्श होने लगा है, भले ही घुसपैठिये के रूप में. चलिए हम भी इस पर थोडी देर के लिए खुश हो लेते हैं.

पर यह खुशी काफूर हो जाती है जब हम हिन्दी में कंप्यूटर पर काम करना चाहते हैं. सबसे पहली समस्या का सामना तो की-बोर्ड के साथ ही हो जाता है कि हर फॉण्ट के साथ लोगों को की-बोर्ड भी सीखना पड़ता है. हिन्दी भाषी या हिन्दी प्रेमी के लिए इससे तकलीफदेह बात और कुछ नही हो सकती है कि कंप्यूटर के इस युग में भी हिन्दी के लिए फॉण्ट और की-बोर्ड की लड़ाई अभी तक चल रही है. अभी तक कोई सार्वभौमिक और सर्वमान्य की-बोर्ड नही विकसित हो पाया है जिसे करने पर किसी भी हिन्दी फॉण्ट में टाइप किया जा सके. अंगरेजी के साथ ऐसा नही है. अंगरेजी में फॉण्ट और की-बोर्ड का कोई झगडा नही है. आप चाहे दुनिया के किसी कोने में जाएँ आपको एक समान की-बोर्ड मिलेगा साथ ही उनपर टाइप करने के लिए चुने जा सकने वाले दर्जनों फोंट्स और उनकी विभिन्न रूप. पर हिन्दी में यह सुविधा आज तक उपलब्ध नही हो पाई है भले ही कंप्यूटर के आए पचास वर्ष से ज्यादा हो चुका है. हांलाकि कई कोशिशें हुई पर सभी अधूरे मन से. सरकार के तरफ़ से भी और निजी प्रयास भी हुए पर अंगरेजी वाली स्थिति हिन्दी में अभी दूर की कौडी है. कहने को तो आप हिन्दी के फॉण्ट को अपने लिए अनुकूल फॉण्ट में परिवर्तित कर सकते हैं. पर इसके लिए समय लगाने के अलावा प्रयास भी करना पड़ता है.

दूसरी समस्या हिन्दी के साथ है कि किसी दूसरे के कंप्यूटर पर यह दिखता नही है अगर उसने ख़ास सॉफ्टवेर डाउनलोड नही किया हो. फॉण्ट की तरह ही यह एक ऐसी समस्या है जो हिन्दी को कंप्यूटर पर विकसित उस गति से नही होने दे रही है जो गति अंगरेजी की है. कहने को तो गूगल की कृपा से लोगों को रोमन में हिन्दी टाइप करने की सुविधा मिल गयी है पर यह निश्चित मानिए की यह सुविधा देवनागरी जानने वाले हिन्दीप्रेमियों के लिए नही है. उससे ज्यादा यह उन अंगरेजी प्रेमियों की समस्या हल करता है जिन्हें देवनागरी में काम करने में कठिनाई होती है. वैसे भी रोमन लिपि से लिप्यांतर कर के आप त्रुटिरहित हिन्दी नही लिख सकते हैं.

कहने को तो यह भी हिन्दी का विकास है. पर इस बहाने हिन्दी का लोप भी हो रहा है. कम से कम कंप्यूटर की दुनिया से. अभी नही तो दो-तीन दशकों में. ठीक संस्कृत की तरह. आप पूछ सकते हैं की मेरी इस शंका का कारण क्या है? दरअसल नए जमाने में किसी भी भाषा के कम से कम चार मजबूत स्तंभ होते है – १. लोक संपर्क का मध्यम होना, २.भाषा का सुदृढ़ और व्यापक आधार वाला व्याकरण, ३. रोजी-रोटी कमाने के सन्दर्भ में इसकी स्वीकार्यता और ४. इन सबसे बढ़कर कंप्यूटर के इस युग में भाषा का सूचना तकनीक से बेहतर तालमेल. हिन्दी में ऊपर के तीन तत्व तो हैं पर चौथा नया तत्व अभी भी आधे- अधूरे रूप में है. व्याकरण वाला आधार भी थोड़ा दरकने लगा है. हिन्दी में हिज्जे की त्रुटियाँ अब जितने व्यापक रूप में दीखतीं हैं वह अपने-आप में खतरे की घंटी है. कहने को भाषा का निर्माण लोगो से होता है और व्याकरण बाद में आता है. पर इतने व्यापक लेवल पर अशुद्धियों की अनुमति कहीं नही है. जहाँ तक रोजी-रोटी का सवाल है अंगरेजी और हिन्दी का भेद कायम है. कुछ अपवाद हो सकते हैं.

इस भेद का लेवल क्या है इसे दिल्ली विश्वविद्यालय में इन दिनों चल रही प्रवेश प्रक्रिया से समझें की जहाँ हिन्दी और अन्य विषयों में प्रवेश अंकों के आधार पर होता है वहीं अंगरेजी में प्रवेश के लिए अधिकाँश कालेजों में प्रवेश परीक्षा होती है. हांलांकि इसका मतलब यह भी लगाया जा सकता है की केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम दिल्ली विश्वविद्यालय को भाता नही है या उसमें कोई खामी है. या फिर, अंग्रेजी की शिक्षा देने वाले अभी भी अपने-आप को नस्लवाद या अभिजात्यवाद के दायरे से मुक्त नही कर पाये हैं. खैर यह विषयांतर है और इस पर कभी और चर्चा करेंगे.

फिलहाल हम देवनागरी के लोप होने और हिन्दी पर मंडराते खतरे की बात कर रहे थे. अगर कंप्यूटर पर देवनागरी का यही हाल रहा तो हिन्दी बोली और पढ़ी जाने वाली भाषा तो होगी पर लिखी जाने वाली नही. ठीक फ्रेंच की तरह. पर यहाँ याद रखिये की भाषा के रूप में फ्रेंच को ऐसी कई सुविधाएं मिली हुई हैं जो हिन्दी के पास नही है. ऐसे में हिन्दी सबसे पहले आने वाली पीढी से गायब होगी, जो कि कंप्यूटर से पूरी तरह से जुरा हुआ है. याद रखें की आज जो भाषा कंप्यूटर से जुडी हुई नही है, वह धीरे-धीरे नष्ट हो रही है भले ही उसका एक व्याकरण हो और वह लोक संपर्क में हो. कंप्यूटर पर अंगरेजी का दबाव झेलना किसी भी भाषा के लिए आसान नही है भले ही वह करोडो में बोली जाती हो. हिन्दी के लिए तो और भी मुश्किल क्योंकि इस देश में हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार का इतिहास पुराना है और हिन्दी को श्रेष्ठ बनाने की बजाय इसे गिराने वालों की संख्या ज्यादा है कम से कम ऊँची कुर्सियों पर बैठे लोगों के बीच. ऐसे में इस ‘जय हो’ का मतलब क्या है?

रविवार, 7 जून 2009

ऑस्ट्रेलिया: हमलों में छुपा सच

चंदन शर्मा

ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों को लेकर मीडिया में काफी कुछ कहा और लिखा गया है. और, इसके कारण रंगभेद और नस्लवादी राजनीति और न जाने क्या-क्या कारण बताये गए. वैसे भी मीडिया की स्थिति भेडचाल वाली है. एक रिपोर्ट और बाकी बयानबाजी… सत्य क्या है न तो इस बारे में जानने की जैसे इच्छा है हमारे मीडिया में और न ही शायद इसकी फुर्सत, क्योंकि TRP, सर्कुलेशन के चक्कर में यह सब गौण हो जाते हैं. शायद यह भी भुला दिया जाता है की मीडिया ही देश में जनमत का निर्माण भी करता है.

संभवतया यही कारण था की जब ‘युवा’ ने ऑस्ट्रेलिया से उर्मी चक्रबर्ती का लेख ‘ऑस्ट्रेलिया में नहीं है रंगभेद’ प्रकाशित किया तो ब्लोग्गेर्र्स ही नही बल्कि मेरे कई दोस्त और जानने वाले भी मुझसे खफा हो गए की इतनी सारी मीडिया ग़लत नही हो सकती है. एक ने तो यहाँ तक सलाह दे डाली की इस लेख के काट में मुझे कुछ लिखना चाहिए. मेरे एक मीडिया के मित्र ने तो सीधे ओवेर्सीज मामलों के मंत्री व्यालार रवि से ही इस बारे में पूछ डाला की भारतीयों पर हमले के क्या कारण हो सकते हैं. धन्यवाद मंत्री जी का जिन्होंने स्वीकार किया की इन हमलों के पीछे रंगभेद से इतर भी कई कारण हो सकते हैं.

बाद में कई मीडिया घरानों ने अपने पत्रों में (जिनमें टाईम्स ऑफ़ इंडिया भी शामिल है) ने माना की इन हमलों के पीछे नस्लवाद से बढ़कर कई सामाजिक आर्थिक कारण शामिल हैं. (देखें टाईम्स ऑफ़ इंडिया की ०७ जून को प्रकाशित स्पेशल रिपोर्ट “It is hate, mate of just economics – अविजित घोष और If the world is shrinking, our horizons must broaden-वलीद अली). यह उल्लेख कर कोई शाबाशी लेने का प्रयास नही है बल्कि वास्तविकता को जानने और समझने की ईमानदार कोशिश भर है.
हमले के बारे में ऑस्ट्रेलिया की इतनी चर्चा है. हम क्यों नही अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन में भारतीयों पर हुए हमलों के बारे में सोचते हैं. दरअसल यह हमले भारत की दुनिया में निरंतर मजबूत होती जा रही स्थिति का भी परिचायक है. गांवों में एक कहावत है की अगर लोग आपको गली देने लगें या वैर भाव रखने लगें तो समझिये की आपकी स्थिति मजबूत हो रही है या आप सही में प्रगति कर रहे हैं. अगर इस कहावत पर विशवास किया जाए तो भारतीयों को न सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया बल्कि अन्य जगहों पर भी इसके लिए तैयार रहना होगा. नस्लवाद तो बहाना भर है. दिनेश द्विवेदी की टिप्पणी एकदम सटीक है की आर्थिक मंडी और बेरोजगारी के नाम पर नस्लवाद के समर्थक इस तरह के हमलों से अपने आप को जीवित रखे हुए हैं.

गुरुवार, 4 जून 2009

ऑस्ट्रेलिया में नही है रंगभेद


उर्मी चक्रवर्ती ऑस्ट्रेलिया से


उर्मी ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड में रहती हैं और शायरी पर अपना ब्लॉग 'गुलदस्ता-ऐ-शायरी' भी लिखतीं हैं। यह अनुभव उन्होंने 'युवा' के लिए विशेष रूप से लिखा है , जो कहीं यह भी बतलाता है की अगर एक उंगली आप दूसरों की तरफ़ दिखातें हैं तो बाकी की चार उंगलियाँ आपकी तरफ़ भी उठातीं हैं। इस का उद्देश्य न तो किसी को क्लीन चिट देना है न ही किसी पर दोष डालना है, बस कहीं हममें भी सुधार की गुंजाइश है , शायद यही इसका आशय है :


ऑस्ट्रेलिया में जो हंगामा हो रहा है काफी दिनों से उसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है! चूँकि मैं ख़ुद ऑस्ट्रेलिया में रहती हूँ इसलिए यहाँ के बारे में बहुत अच्छी तरह से बता सकती हूँ! दरअसल यहाँ पर जो स्टूडेंट्स पढने आते हैं वे ज्यादातर गुजराती और पंजाबी हैं! अब यहाँ पर तो एक ही भाषा चलती है और वो है अंग्रेजी इसके सिवा और किसी भाषा में बात नहीं की जा सकती! पर भारत से जो स्टूडेंट्स पड़ने आते है वो बस पर जब सवार होते हैं तो ज़ोर ज़ोर से पंजाबी और हिन्दी गाने सुनते हैं, रास्ते में निकलते हैं तो हिन्दी में बात करते हैं, अपने इंडियन ग्रुप में ही शामिल रहना चाहते हैं, किसी और के साथ बात नहीं करते, रात के अंधेरे में सुनसान सड़क से गुज़रते हैं कान में आईपॉड तो हाथ में मोबाइल और पॉकेट में ढेर सारा पैसा लिए। अगर ये सब करें तो फिर ऑस्ट्रेलिया में रहना मुश्किल है! हमें तो कभी कोई दिक्कत नहीं हुई और कभी भी इस बात का एहसास भी नहीं हुआ की ऑस्ट्रेलिया रेसिस्ट देश है! बल्कि मैं तो ये कहूँगी कि ऑस्ट्रेलिया सबसे उम्दा देश है जहाँ पर कोई भेद भाव नहीं है और उरोपीयन यूनियन अमेरिका या ब्रिटेन में तो रेसिस्म बहुत ज़्यादा है! जिस देश में जो भाषा चलती है उसी भाषा का प्रयोग करनी चाहिए! मैं तो Townsville में रहती हूँ जो की क्वींसलैंड स्टेट में पड़ता है और यहाँ कोई हंगामा नहीं है बिल्कुल सुरक्षित है!

बुधवार, 3 जून 2009

मैं तुम्हे लिखूंगा एक चिठ्ठी

रवीन्द्र दास दर्शन और संस्कृत के विद्वान होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी है. उनकी कवितायेँ भावपूर्ण होने के साथ मर्मस्पर्शी भी होती हैं. उनकी ऐसी ही एक कविता पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनके ‘अलक्षित’ से. रचना तो कुछ दिनों पूर्व की है पर भाव एकदम ताजे और दिल को छू जाने वाले:

तुम्हें चिट्ठी मैं लिखूंगा
जो हो फुर्सत तो पढ़ लेना
नहीं, मैं काह नहीं पाता जुबां से
बात मैं अपनी
कि मैं आकाश हो जाऊँ
अगर तुम हो गई धरती
तुम्हारी मरमरी बांहों को छू कर छिप कहीं पाऊँ
मुझे तकलीफ होती है तुझे जब फोन करता हूँ
कि गोया लाइन कटते ही
अकेला ही अकेला मैं
कभी फुर्सत बना कर
तुम जरा दो हर्फ़ लिख देना
उसीको बुत बनाकर मैं
कभी तो प्यार कर लूँगा
तुमें मेरी लिखावट में मेरे ज़ज्वात के चहरे
तेरे बोसा को जानेमन
कहीं कोई शरारत कर उठे
तो माफ़ कर देना
कि उनका हक छिना है
तो बगावत लाजिमी है
नहीं देना उन्हें बोसा
न उनका मन बढ़ाना तुम
अगर मिल जाए जो चिट्ठी
तो पलकें बंद कर लेना उसी सूरत में
चिट्ठी जरा हौले से सहलाना
जरा हौले से सहलाना
जरा ............... ।

मंगलवार, 2 जून 2009

नया क़ानून लाने का विचार है ऑस्ट्रेलिया सरकार का

भारतीय छात्रों पर ऑस्ट्रेलिया में हो रहे हमले के विरोध में युवाओं की गांधीगिरी और चौतरफा राजनयिक दबाव के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार को विदेशी छात्रों की सुध आयी है. चौतरफा दबाव के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार अब देश में रहने वाले विदेशी छात्रों की सुरक्षा के लिए जल्दी हे एक क़ानून लाने पर विचार कर रही है. दिल्ली स्थित उच्चायोग पर प्रदर्शन करने गए भारतीय जनता युवा मोर्चा के एक प्रतिनिधिमंडल को ऑस्ट्रेलिआई उच्चायुक्त जोन मेक कार्थी ने यह भरोसा दिया है. उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को सभी भारतीय छात्रों को पूरी सुरक्षा मुहेय्या कराने का भी भरोसा दिलाया है.

इस बीच भारत के बढ़ते दबाव के मद्देनजर ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री केविन रुद्ड ने हमले के दोषियों को दण्डित करने का आश्वाशन संसद में दिया है. साथ ही उन्होंने कहा है सभी ९०,००० भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया में मेहमान हैं.