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रविवार, 26 सितंबर 2010

राष्ट्रमंडल खेल में बाढ़ और डेंगू के फायदे

इन दिनों राष्ट्रमंडल खेलों पर जैसे विपदा आन पड़ी है. जिसे देखो वही एक दूसरे को कोसने में लगा हुआ है. अब ब्रिटेन की महारानी, जिनकी हुकूमत के निशानी के रूप में इन राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हो रहा है और होता रहा है वे तो इसमें आ नहीं रहीं हैं, अब ऐसे में जिसकी इच्छा हो वह चाहे जिस किसी को कोस ले. और, मीडिया को कोसने के लिए इस बार पूरा मसाला मिला हुआ है. नतीजा, हम अब दुनिया की नजर में सबसे अव्यवस्थित आयोजक साबित हो गए; वह भी आयोजन के शुरू होने से पहले. अब सरकार को तो इन कामों को करने और इन कामों को नहीं हो पाने से होने वाली बेइज्जती से छुटकारा पाने का ठेका जनता पांच साल के लिए दे देती है सो सरकार भी लगी पड़ी हुई है ( वैसे भी न लगने के अलावा चारा क्या है?) अपनी इज्जत बचाने में. सवाल देश का है. हालांकि कुछ लोग अपनी इज्जत बचाने के लिए दूसरों पर कालिख पोंछने में पीछे नहीं हैं.

पर भला हो उस भगवान् का, जो इच्छा से या अनिच्छा से ही सही, ऐन वक्त पर देश की इज्जत बचाने को जाग जाते हैं. अब गलती से उन्होंने एक बार महाभारत के समय अर्जुन को गीता का ज्ञान देते वक्त "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:..." का उपदेश क्या दे दिया कि उन्हें इस देश को दुनिया भर में ग्लानि से बचाने के लिए अक्सर ही आना पड़ता है.

भगवान् भी क्या करे, अगर उन्हें पता होता कि '...संभवामि युगे- युगे' की इतनी कीमत चुकानी पड़ेगी तो शायद वे ऐसा वचन ही ना देते. अब उन्होंने इस देव-भूमि भारत की लाज रखने के लिए क्या-क्या नही किया ? पिछले कई वर्षों से यमुना की सफाई का अभियान चल रहा था पर दिल्ली में यमुना थी की साफ़ ही नहीं हो रही थी. पता नहीं कितनी योजनायें बनीं और कितने सौ करोड़ यमुना को लन्दन की टेम्स नदी बनाने के लिए फूंक दिए गए?

अब ऐसे में भगवन को ही इस ग्लानि से बचाने के लिए आगे आना पड़ा ताकि विदेशी मेहमानों को हमारी पवित्र यमुना नाले की तरह नहीं दिखे. उन्होंने इस साल ऐसी बारिश की कि पुराने लोग कहते हैं कि पिछले ५० साल में उन्होंने ऐसी बारिश नहीं देखी. पर ग्लानि से बचाने के लिए यमुना की सफाई जरूरी थी और उसके लिए जोरदार बाढ! सो ऐसा ही हुआ और इतना बाढ़ भगवान् की कृपा से आया कि दिल्ली तो दिल्ली, शंकर भगवन की नगरी हरिद्वार व् ऋषिकेश और कृष्ण भगवान् की नगरी मथुरा और वृन्दावन भी पानी-पानी हो गया. पर दिल्ली में इस बहाने टेम्स जैसी स्वच्छ और निर्मल यमुना बहने लगी. वैसे इससे एक पंथ और दो काज हुए. यमुना तो साफ़ हुई ही साथ ही सरकार को भी काम में देरी होने का प्राकृतिक बहाना मिल गया.

पर इतने भर से राष्ट्रमंडल में हमारी इज्जत तो बचने वाली नहीं है. सो इसे बचाने के लिए कहते हैं कि भगवान् ने मच्छरों तक को आदेश दे दिया. नतीजा वे भी ऐसा डेंगू लेकर इस बार आये कि पहले ऐसा कभी नहीं हो पाया. २६०० से ज्यादा लोग बीमार हुए इससे, अकेले दिल्ली में. अब हमारे पाठक भी कहेंगे कि अमां मियां, क्या मजाक करते हो? पर आप खुद ही सोचिये कि डेंगू इस तरह से दूसरे शहरों में क्यों नहीं हुआ? 'विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले' दिल शहर में ही क्यों? तो इस डेंगू का कहर का असर यह हुआ कि दूसरे देशों से आने वाले खेलों के कई महायोद्धाओं ने अपना नाम वापस ले लिया. इससे राष्ट्रमंडल खेलों में प्रतिद्वंदिता कम होगी और भारत के लिए पदक तालिका में उंचा स्थान बनाना आसान हो जाएगा.

इसके बाद भी कुछ महारथियों ने जो हिम्मत दिखाई तो भगवान् के पास आदमी से कई गुना वफादार कुत्तों पर भरोसा करने के अलावा कोई चारा नहीं रहा. कुत्तों ने खेल गाँव की इमेज बनाने में जो भूमिका निभाई की सारी दुनिया के खिलाड़ी खेल गॉव आने से कतराने लगे. अब आदमी तो आदमी ठहरा वह तो खेल गॉव में हो रहे कुत्तों के इस खेल को समझ नहीं पाया और कुत्तों को पकड़ने में लगा हुआ है.
पर सच तो यही है कि भगवन अभी भी अपनी प्यारी भारत भूमि को '... ग्लानिर्भवति भारत:' से बचाने में जुटे हैं. इसके बाद भी अगर कोई कोसना चाहे तो यह भगवन का निरादर है पर भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है.