सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

SCAM: Jara Sochiye

^ckr fudyh gS rks nwj ryd tk,xh^



Pkanu 'kekZ
dgkor gS fd ^ckr fudyh gS rks nwj ryd tk,xh^A vc pwafd iz/kkuea=h ujsanz eksnh ds eq[kkjfoan ls ;g ckr fudyh gS rks tkfgj gS fd ;g dksbZ ekewyh ckr rks ugha gks ldrh gSA oSls Hkh iz/kkuea=h ’kCnksa ds dksbZ dPps f[kykM+h rks ughsa gSaA gtkjksa yksxksa ds chp esa tc djksM+ksa n’kZdksa ds chp tc Vhoh dh ykbo gks jgh gks rc ;g ckr dgh xbZ gks rks ;g ekewyh gks gh ugha ldrh gSA

vycRrk iz/kkuea=h dh ckr rks nwj rd igys gh tk pqdh gSA vc ^LdSe^ dh ftl rjg ls mUgksaus O;k[;k fd;k gS mlus rks dbZ;ksa ds gks’k rks igys gh mM+k fn, gSa ij mu [kkfyl dkaxzsfl;ksa vkSj lektokfn;ksa dh djksM+ksa dh tekr dh ukjktxh dk D;k fd;k tk, tks fd ftUkds mnkjoknh fopkjksa dh otg ls ns’k esa tula?k vkSj Hkktik vkSj fganwoknh fopkj/kkjk vkSj lkE;okn  dks lrr vkWDlhtu gh ugha feyk cfYd muds fopkjksa dks Hkh blh ns’k esa mlh rjg ls Qyus&Qwyus vkSj iuius vkSj QSyus dk volj Hkh feykA gkaykfd] vkt ds nkSj esa ;g fy[kuk Hkh [krjs ls [kkyh ugha gS ij dye og D;k tks [kqydj fy[k gh ugha ik,A oSls Hkh dye ds dnznku de gh gSa vkSj nq’eu dbZ xqukA ij bl QDdM+h esa Hkh ugha fy[kk rks D;k fy[kk\

rks ckr LdSe dh py jgh FkhA vc iz/kkuea=h us rks ns’k ds lcls ^mRRke izns’k^ dks lektokfn;ksa] dkaxzsfl;ksa vkSj vf[kys’k vkSj ek;korh ls eqDr djkus dk ukjk rks ns fn;k ij bldk ifj.kke ;g gqvk fd iz/kkuea=h dh bl ubZ O;k[;k ls bruh izfrfdz;k,a vkbZa fd LdSe dk vlyh vFkZ gh xqe gks x;kA ojuk] vcrd rks LdSe dk eryc rks yksx ?kksVkyk gh tkurs FksA

vc mRrj izns’k ds ;qok eq[;ea=h us rks bldk vFkZ cnydj , ls vfer ’kkg vkSj ,e ls eksnh dj fn;k rks jkgqy xka/kh us budh ubZ O;k[;k dj Mkyh gS elyu ^lso daVzh QzkWe vfer’kkg ,aM eksnh^ rks bldh vHkh vkSj ubZ O;k[;k,a dh tk jgh gSaA vc bl pDdj esa cspkjs vkWDlQksMZ okys ?kupDdj cu x, gSaA [kcj gS fd mUgksaus bl ij fopkj djuk izkjaHk dj fn;k gS fd fMD’kujh ds u, laLdj.k esa bl ’kCn dks j[kk tk, ;k ughaA mudh fpark bruh Hkj gh ugha gSA mUgksaus bl ij fo}kuksa dh jk; Hkh ekaxh gS fd bl rjg ls vxj vFkZ vFkZkr~ vuFkZ dk lkekU;hdj.k fd;k tkus yxk rks mldk bykt D;k gks ldrk gS\ ij fQygky rks HkykbZ blh esa gS fd bu vFkZdkjh fo?uksa ds chp esa vius dks lesV dj j[kk tk,A

oSls Hkh fet+kZ x+kfyc dk ’ksj rks e’kgwj gS gh & gtkjksa [okfg’ksa ,slh fd gj [okfg’k is ne fudysA ij bl pquko esa irk ugha fdl & fdl dk ne fudyrk gSA
tjk lksfp,A 

रविवार, 6 अप्रैल 2014

ताकि लोकतंत्र जिन्दा रहे


इन दिनों चुनाव का बेहद दिलचस्प नज़ारा देखने को मिल रहा है, चुनाव का जो शोर सडकों पर है वह लोगों के बीच से लगभग नदारद है। कहने को तो चुनाव के 'परिणाम' चुनावों से बहुत पहले ही आ गए हैं पर लोगों ने अपनी दिल की बात कुछ यूं दिल से चस्पां  कर लिया है कि मानों उन्होंने कसम खा रखी हो कि चुनाव से पहले दिल से बात निकल जाए तो क्या कहने? बिहार में जहां ट्रेनों में चुनाव चर्चा हमेशा ही गुलज़ार होती थी, एकाएक वे भी मौन-मोहन का रूप ले चुके हैं। वैसे चुनाव से परे रेल का जनरल डब्बा एक मिनी भारत का रूप ही होता है और अगर वहाँ से चुनाव-चर्चा गायब है तो साफ़ है कि लोग इन चर्चाओं से परे रहना चाहते हैं। यह अलग बात है सोनिया-राहुल, मोदी-आडवाणी व अन्य दिग्गज देश में अलख जगाने में जुटें हैं ताकि देश जागे। पर लोग हैं कि चुनावों में उनका दिल  लगता ही नहीं। अब अभियान चलाये जा रहे हैं। देश के लिए आप भी करें वोट ताकि लोकतंत्र जिन्दा रहे।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

भारत में 24 x 7 एफ एम समाचार सेवा, बीबीसी में हिंदी सेवा की समाप्ति

 रेडियो के भारतीय श्रोताओं के लिए एक अच्छी और एक बुरी खबर है। जहाँ प्रसार भारती भारत में 24  x 7 एफ एम समाचार सेवा शुरू कर रहा है वहीं बीबीसी ने हिंदी सेवा के समाप्ति पर अंतिम निर्णय ले लिया है। विस्तार से चर्चा जल्द होगी।   

रविवार, 26 सितंबर 2010

राष्ट्रमंडल खेल में बाढ़ और डेंगू के फायदे

इन दिनों राष्ट्रमंडल खेलों पर जैसे विपदा आन पड़ी है. जिसे देखो वही एक दूसरे को कोसने में लगा हुआ है. अब ब्रिटेन की महारानी, जिनकी हुकूमत के निशानी के रूप में इन राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हो रहा है और होता रहा है वे तो इसमें आ नहीं रहीं हैं, अब ऐसे में जिसकी इच्छा हो वह चाहे जिस किसी को कोस ले. और, मीडिया को कोसने के लिए इस बार पूरा मसाला मिला हुआ है. नतीजा, हम अब दुनिया की नजर में सबसे अव्यवस्थित आयोजक साबित हो गए; वह भी आयोजन के शुरू होने से पहले. अब सरकार को तो इन कामों को करने और इन कामों को नहीं हो पाने से होने वाली बेइज्जती से छुटकारा पाने का ठेका जनता पांच साल के लिए दे देती है सो सरकार भी लगी पड़ी हुई है ( वैसे भी न लगने के अलावा चारा क्या है?) अपनी इज्जत बचाने में. सवाल देश का है. हालांकि कुछ लोग अपनी इज्जत बचाने के लिए दूसरों पर कालिख पोंछने में पीछे नहीं हैं.

पर भला हो उस भगवान् का, जो इच्छा से या अनिच्छा से ही सही, ऐन वक्त पर देश की इज्जत बचाने को जाग जाते हैं. अब गलती से उन्होंने एक बार महाभारत के समय अर्जुन को गीता का ज्ञान देते वक्त "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:..." का उपदेश क्या दे दिया कि उन्हें इस देश को दुनिया भर में ग्लानि से बचाने के लिए अक्सर ही आना पड़ता है.

भगवान् भी क्या करे, अगर उन्हें पता होता कि '...संभवामि युगे- युगे' की इतनी कीमत चुकानी पड़ेगी तो शायद वे ऐसा वचन ही ना देते. अब उन्होंने इस देव-भूमि भारत की लाज रखने के लिए क्या-क्या नही किया ? पिछले कई वर्षों से यमुना की सफाई का अभियान चल रहा था पर दिल्ली में यमुना थी की साफ़ ही नहीं हो रही थी. पता नहीं कितनी योजनायें बनीं और कितने सौ करोड़ यमुना को लन्दन की टेम्स नदी बनाने के लिए फूंक दिए गए?

अब ऐसे में भगवन को ही इस ग्लानि से बचाने के लिए आगे आना पड़ा ताकि विदेशी मेहमानों को हमारी पवित्र यमुना नाले की तरह नहीं दिखे. उन्होंने इस साल ऐसी बारिश की कि पुराने लोग कहते हैं कि पिछले ५० साल में उन्होंने ऐसी बारिश नहीं देखी. पर ग्लानि से बचाने के लिए यमुना की सफाई जरूरी थी और उसके लिए जोरदार बाढ! सो ऐसा ही हुआ और इतना बाढ़ भगवान् की कृपा से आया कि दिल्ली तो दिल्ली, शंकर भगवन की नगरी हरिद्वार व् ऋषिकेश और कृष्ण भगवान् की नगरी मथुरा और वृन्दावन भी पानी-पानी हो गया. पर दिल्ली में इस बहाने टेम्स जैसी स्वच्छ और निर्मल यमुना बहने लगी. वैसे इससे एक पंथ और दो काज हुए. यमुना तो साफ़ हुई ही साथ ही सरकार को भी काम में देरी होने का प्राकृतिक बहाना मिल गया.

पर इतने भर से राष्ट्रमंडल में हमारी इज्जत तो बचने वाली नहीं है. सो इसे बचाने के लिए कहते हैं कि भगवान् ने मच्छरों तक को आदेश दे दिया. नतीजा वे भी ऐसा डेंगू लेकर इस बार आये कि पहले ऐसा कभी नहीं हो पाया. २६०० से ज्यादा लोग बीमार हुए इससे, अकेले दिल्ली में. अब हमारे पाठक भी कहेंगे कि अमां मियां, क्या मजाक करते हो? पर आप खुद ही सोचिये कि डेंगू इस तरह से दूसरे शहरों में क्यों नहीं हुआ? 'विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले' दिल शहर में ही क्यों? तो इस डेंगू का कहर का असर यह हुआ कि दूसरे देशों से आने वाले खेलों के कई महायोद्धाओं ने अपना नाम वापस ले लिया. इससे राष्ट्रमंडल खेलों में प्रतिद्वंदिता कम होगी और भारत के लिए पदक तालिका में उंचा स्थान बनाना आसान हो जाएगा.

इसके बाद भी कुछ महारथियों ने जो हिम्मत दिखाई तो भगवान् के पास आदमी से कई गुना वफादार कुत्तों पर भरोसा करने के अलावा कोई चारा नहीं रहा. कुत्तों ने खेल गाँव की इमेज बनाने में जो भूमिका निभाई की सारी दुनिया के खिलाड़ी खेल गॉव आने से कतराने लगे. अब आदमी तो आदमी ठहरा वह तो खेल गॉव में हो रहे कुत्तों के इस खेल को समझ नहीं पाया और कुत्तों को पकड़ने में लगा हुआ है.
पर सच तो यही है कि भगवन अभी भी अपनी प्यारी भारत भूमि को '... ग्लानिर्भवति भारत:' से बचाने में जुटे हैं. इसके बाद भी अगर कोई कोसना चाहे तो यह भगवन का निरादर है पर भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है.

मंगलवार, 25 मई 2010

दिल्ली में ब्लोगर्स गोष्ठी


रविवार को दिल्ली में हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक विस्तृत बैठक संपन्न हुई । ज्ञात हो कि दिल्ली ब्‍लॉगर्स इससे पहले भी कई बैठकों का सफल आयोजन कर चुके हैं। आभासी दुनिया के जरिए एक दूसरे से जुडे़ , समाज के विभिन्न वर्गों और देश के विभिन्न्न क्षेत्रों के लेखक और पाठक एक दूसरे के साथ साझे मंच पर न सिर्फ़ लिखने पढने तक सीमित रहे बल्कि उन्होंने आभासी रिश्तों के आभासी बने रहने के मिथकों को तोडते हुए आपस में एक दूसरे के साथ बैठ कर बहुत से मुद्दों पर विचार विमर्श किया । सुदूर छत्तीसगढ से आए साहित्यकार ब्‍लॉगर श्री ललित शर्मा जी और विख्यात ज्योतिष लेखिका श्रीमती संगीता पुरी जी के स्वागत और मिलन को एक सुनहरे मौके के रूप में लेते हुए आयोजित किए इस बैठक में लगभग ४० से भी अधिक ब्‍लॉगरों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई । इस बैठक में शामिल होने वाले ब्‍लॉगर साथी थे- ललित शर्मा, संगीता पुरी, अविनाश वाचस्पति, रतन सिंह शेखावत, अजय कुमार झा, खुशदीप सहगल, इरफ़ान, एम वर्मा, राजीव तनेजा एवं संजू तनेजा, विनोद कुमार पांडे, पवन चंदन जी, मयंक सक्सेना, नीरज जाट, अमित (अंतर सोहिल)’ प्रतिभा कुशवाहा जी, एस त्रिपाठी, आशुतोष मेहता, शाहनवाज़ सिद्दकी, जय कुमार झा, सुधीर, राहुल राय, डा. वेद व्यथित, राजीव रंजन प्रसाद, अजय यादव,अभिषेक सागर, डा. प्रवीण चोपडा, प्रवीण शुक्ल प्रार्थी, योगेश गुलाटी, उमा शंकर मिश्रा, सुलभ जायसवाल, चंडीदत्त शुक्ला, श्री राम बाबू, देवेंद्र गर्ग जी, घनश्याम बाग्ला, नवाब मियां, बागी चाचा इत्‍यादि रहे।

इस बैठक में औपचारिक परिचय (आभासी दुनिया के लोगों का आमने सामने एक दूसरे से रुबरू होना एक दिलचस्प अनुभव होता है) के बाद , हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के बीच सम्‍मानीय चर्चित हिन्‍दी ब्‍लॉगर और बैठक के आयोजक अविनाश वाचस्पति (जो कि सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़ के मॉडरेटर हैं) ने प्रस्तावना में कई प्रमुख बातों को सबके सामने रखा, जिसमें उन्‍होंने कहा कि ''हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को उन दोषों से दूर रखने का प्रयास करेंगे जो टी वी, प्रिंट मीडिया और अन्‍य माध्‍यमों में दिखलाई दे रहे हैं। द्विअर्थी संवाद और शीर्षकों के जरिए सनसनी फैलाने से बचे रहेंगे। जो भाषा हम अपने लिए, अपने बच्‍चों के लिए चाहते हैं - वही ब्‍लॉग पर लिखेंगे और वही प्रयोग करेंगे। ब्‍लॉगिंग को पारिवारिक और सामाजिक बनायेंगे, जिससे भविष्‍य में इसे प्राइमरी शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सके। ब्‍लॉगिंग में वो आनंद आना चाहिए जो संयुक्‍त परिवार में आता है। यहां पर उसकी अच्‍छाईयां ही हों उसकी बुराईयों से बचे रहें। हम सबका प्रयास होना चाहिए कि जिस प्रकार आज मोबाइल फोन का प्रसार हुआ है उतना ही प्रचार प्रसार हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का भी हो परंतु उसके लिए हमें संगठित होना होगा। इसके लिए हमें एक वैश्विक संगठन बना लेना चाहिए।

उपस्थित ब्‍लॉगरों ने इन मुद्दों के अलावा और भी ज्‍वलंत विषयों ब्‍लॉगिंग और हिंदी , पत्रकारिता को कड़ी चुनौती देती ब्‍लॉगिंग विधा, ब्‍लॉगिंग एक सामाजिक समरसता कायम करने के माध्‍यम के सशक्‍त रूप में, पर भी सबने गहन चिंतंन किया । ब्‍लॉगरों के एक संगठन की आवश्यकता पर सबने सहमति जताते हुए इस कार्य को आगे बढाने का कार्य शुरू कर दिया है। ब्‍लॉगिंग की बढ़ती हुई ताकत के कारण भविष्य में ब्‍लॉगिंग और हिन्‍दी ब्‍लॉगरों को दमन का सामना न करना पड़े और उनकी अभिव्‍यक्ति पर सेंसर न लगे, इसके लिए भी आज एक बड़ी आवश्‍यकता है इस तरह के संगठन के निर्माण की है जिससे हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग जगत स्‍वयं ही अनुशासित हो सके और इस प्रकार की संभावना ही पैदा न हो। इसी संकल्प के साथ बैठक का समापन हुआ । भविष्य में नियमित रूप से न सिर्फ़ ऐसी बैठकों अपितु तकनीकी कार्यशालाओं, विकीपीडिया को समृद्ध करने के लिए योगदान करते हेतु, साहित्यिक विधाओं के विशाल कोशों में सक्रिय भागीदारी के लिए युवाओं को तैयार करने के लिए आयोजनों के प्रस्‍ताव का सभी ने करतल ध्‍वनि से स्‍वागत किया।

बुधवार, 5 मई 2010

रेडियोधर्मिता का खौफ, मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय नाभिकीय व्यापार

चन्दन शर्मा
राजधानी दिल्ली में कोबाल्ट-६० के प्रकरण ने देश को कई कभी न भूलने वाले कई सबक दिए हैं. खबरों को महज कुछ अखबारी कागज़ पर छपे हर्फ़ की तरह लेने वाले इसे एक चर्चित घटना की तरह कुछ दिनों तक याद रख सकते हैं और चर्चा कर सकते हैं. पर भारत के इतिहास में संभवतया पहली घटना होगी जिसमें आम लोगों का रेडियोधर्मी पदार्थ (या कचरा) के खतरे से सामना हुआ और इस छोटे से खतरे भर से नाभिकीय व रेडियोधर्मी संकट तथा विषैले कचरे की भयावहता का अहसास हुआ. साथ ही यह भी समझ में लोगों को आया कि किस प्रकार से रेडियोधर्मी पदार्थ की छोटी सी मात्रा को भी, लापरवाही से लिया जाय तो यह समाज में विनाशकारी स्थिति पैदा करने में सक्षम है.

यह घटना ऐसे समय हुई है जबकि सारी दुनिया की नजर भारत पर ही है जहां दिल्ली में कुछ महीने बाद अक्टूबर में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की पुरजोर तैयारी चल रही है. वैसे तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले कुछ समय से बार-बार नाभिकीय संकट और नाभिकीय या रेडियोधर्मी पदार्थों के आतंकवादियों या गलत हाथों में पड़ने की आशंका की चर्चा अनेक मंचों पर पर कर चुके हैं. पर जिस प्रकार से देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित केन्द्रीय विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय की 'लापरवाही' से यह घटना दुर्घटना में बदली उसकी कल्पना तो आम आदमी शायद ही कर पाए.

कहने को तो दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक पेंटल ने इस प्रकरण में अपनी ' नैतिक जिम्मेदारी' लेते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से माफी भी मांग ली है और साथ ही एक तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति भी गठित कर दी है पर इस 'माफी' में भी पेंच है. यह माफी किसी दिल से मानवीय भावनाओं के तहत नहीं निकली है बल्कि यह माफी २९ मई को तब माँगी गयी है जब २८ मई को परमाणु उर्जा नियामक आयोग (ए इ आर बी) ने दिल्ली विश्विद्यालय प्रशासन को कोबाल्ट-60 के गामा विकिरण उपकरण के निपटान में सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने को दोषी मानते हुए इसे कारण बताओ नोटिस जारी किया और साथ ही साथ ही रेडियोधर्मी पदार्थ के प्रयोग पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने को कहा. इस निपटान में गामा विकिरण वाला यह इरेडियेटर स्थानीय कबाड़ी वाले के पास पहुँच गया और इसके रेडियोधर्मी विकिरण से एक की मौत हो चुकी है और छः लोगों का उपचार (अगर इसका कोई सही में इलाज है तो) हो रहा है. जिन्हें परमाणु सुरक्षा नियमों की जानकारी है वे जानते हैं कि इसके उल्लंघन पर लिए कड़े आर्थिक व अन्य दंड का प्रावधान है और इससे बचना आसान दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए नहीं होगा.

सवाल इतना भर नहीं है की भूलवश ऐसा हो गया या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस भूल को मानते हुए पीड़ितों के लिए मुआवजे की घोषणा कर चुके हैं या कुलपति अपनी 'नैतिक जिम्मेदारी' ले चुके हैं और यह कैसे कबाड़ तक पहुंचा इसके लिए विशेषग्य समिति गठित कर चुके हैं.
पर सवाल इन सब छोटे-छोटे मुद्दों से कहीं गंभीर हैं और गंभीर पड़ताल की मांग करते हैं.

सबसे पहले तो यह बात समझना जरूरी है कि नाभिकीय या रेडियोधर्मी सुरक्षा का मामला दुनिया में सर्वोपरि सुरक्षा मामलों में आता है. चीन में भी २००८ में हुए बीजिंग ओलम्पिक के दौरान 'डर्टी बम' का भय फैला कर बीजिंग में रेडियोधर्मी सुरक्षा की जिम्मेदारी, जिनमें लोगों को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी से लेकर रेडियोधर्मी पदार्थ खोजने की जिम्मेदारी व इससे जुड़े अन्य पक्षों का ठेका अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा ऑथोरिटी (आई ए ई ए) के हवाले कर दी गयी थी. भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान ऐसा ही ठेका देने का दबाव सम्बंधित एजेंसी को देने के लिए बनाया पिछले काफी समय से बनाया जा रहा है. कई एन जी ओ और पूर्व वैज्ञानिक भी इस काम में जुटे हुए हैं. मीडिया इसमें जाने-या अनजाने में उत्प्रेरक का काम कर रहा है.
दिलचस्प तथ्य यह है कि जहाँ कोबाल्ट-६० व ब्लू लेडी (रेडियोधर्मी पदार्थ से लदा फ्रांसीसी जहाज जो भारतीय तट पर पहुँच गया था) जैसे प्रकरणों से भारत की परमाणु उर्जा नियामक एजेंसी (ए ई आर बी) , जिसे नाभिकीय या रेडियोधर्मी सुरक्षा के मामले में विशेषज्ञता हासिल है, को नकारा और अक्षम साबित करने की कोशिश की जा वहीं यह भी सफलता पूर्वक दर्शाने की कोशिश हो रही है कि किस प्रकार से दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं भी रेडियोधर्मी पदार्थों को संभालने में सक्षम नहीं है. आम आदमी में इससे जो रेडियोधर्मी पदार्थ के कचरे और नाभिकीय संकट के बारे में जो भय और आशंका व्याप्त हो रही है वह इसके अतिरिक्त है.
सवाल इतना भर नहीं है कि किसी की भूलवश ऐसा हो गया है! बल्कि ऐसा क्या था कि दिल्ली विश्वविद्यालय को इस समय इसे बेचने की जल्दी थी जबकि दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय नाभिकीय विज्ञान में एम् टेक पाठ्यक्रम इस वर्ष से शुरू करने की घोषणा कर चुका था और उसके लिए प्रवेश की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी.

जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि सवाल यह नहीं है कि भूलवश ऐसा हो गया. पर यह सवाल अपने आप में काफी परेशान करने वाला है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को गामा किरणों को उत्सर्जित करने वाले इररेडीयेटर को बेचने की आखिर क्या जल्दी थी? इस यंत्र को प्रयोग संबंधी कार्यों के लिए कनाडा से मंगाने वाले दिल्ली विश्विद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के पूर्व प्रोफ़ेसर बी के शर्मा इसे सुरक्षित यंत्र करार दे चुके हैं और कह चुके हैं कि इसे महज कुछ रुपयों के लिए रद्दी में नहीं बेचा जाना चाहिए था. प्रस्तावित पाठ्यक्रम के मद्देनजर इस यंत्र की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता है.
मालूम हो कि विभाग की कोई भी रद्दी या कबाड़ बगैर विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति के बगैर बाहर नहीं निकल सकता है. यह मानना बेहद मुश्किल है कि कुलपति को इस रेडियोधर्मी यंत्र के महत्त्व और खतरे का अंदाजा नहीं होगा (खासकर तब जबकि वे स्वयं जेनेटिक्स के शिक्षक रह चुके हैं और रेडियो विकिरण के प्रभावों से अनजान नहीं हैं.) या रसायन विभाग इससे अनभिग्य रहा होगा. कोबाल्ट-६० के आयु की गणना में गलती का तर्क भी गले उतरता प्रतीत नहीं होता है. उसपर कुलपति का यह कहना कि उन्हें यह बताया नहीं गया था कि इसमें अभी भी रेडियोधर्मी पदार्थ मौजूद है. यह और भी गंभीर मसला है जो विश्वविद्यालय स्तर पर हो रहे भारी गड़बड़ियों की तरफ संकेत करते हैं और बताते हैं कि किस प्रकार से प्रशासन के प्रमुख को धोखे में रखकर महत्वपूर्ण सामान कबाड़ के नाम पर बाहर भेज दिए जाते हैं. ऐसे में सम्बंधित व्यक्ति या विभाग को किसी भी स्थिति में छोड़ा नहीं जाना चाहिए खासकर जब मामला रेडियोधर्मिता का हो.

वैसे फरवरी में तीन नाभिकीय जगत से जुडी देश में कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं. भारत और ब्रिटेन ने फरवरी के दूसरे सप्ताह में सिविल न्यूक्लियर समझौते पर हस्ताक्षर किये. मालूम हो ब्रिटेन का इस व्यापार से प्रतिवर्ष १.११ अरब डॉलर का नाभिकीय व इससे जुड़े सामान निर्यात करता है और इसमें उसके करीब ८०००० नागरिकों को रोजगार मिला हुआ है. इसके तीन दिन बाद ही १६ फरवरी को ब्रिटिश कंपनी ने एक मशहूर भारतीय ऑटो निर्माता कंपनी के साथ मिलकर ब्रिटिश तकनीक के सहयोग से बने एक ऐसे सीबीआरएन वाहन को भारत के गृह मंत्रालय और देश राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन ऑथोरिटी को देने की पेशकश की जो कि पांच किलोमीटर के दायरे में मौजूद रासायनिक, जैविक , रेडियोधर्मी और नाभीकीय पदार्थ की पहचान कर उसे ढूंढ निकाले. यह पेशकश खास तौर पर राष्ट्रमंडल खेलों के मद्देनजर की गयी.
हालांकि लाख कहे जाने के बावजूद देश में इस प्रकार का जैविक, रेडियोधर्मी, रासायनिक या नाभिकीय पदार्थ सार्वजनिक रूप से नहीं पाया गया जो कि खतरा उत्पन्न करे. पर अचानक ही २६ फरवरी को एक नीलामी में गामा किरणों को उत्सर्जित करने वाले कोबाल्ट-६० के इरेदियेटर को दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस लापरवाही से बेचा कि वह पश्चिमी दिल्ली के एक बड़े इलाके के लिए खतरा बन गया. फिर जो कुछ हुआ वह सबके सामने है. बेचने का निर्णय और यह समय दोनों ही किसी बड़े (चाहे वह जानबूझ कर हो या अनजाने में) सांठ गाँठ की ओर सीधा संकेत करती है. क्योंकि इस घटना से इस वाहन को व अन्य रेडियोधर्मी डिटेक्टर, जिसका भारत में निर्माण ब्रिटेन के साथ हुए समझौते का एक हिस्सा भी है, को खरीदने का भारत पर दबाव बनाने का मार्ग प्रशस्त हो गया. कहने की जरूरत नहीं है कि आई ए ई ए के लिए भी इससे चीन की तरह ही ठेका मिलने रास्ता आसान हो गया है.

नाभिकीय या रेडियोधर्मी पदार्थ (के इस अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में) में मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं रही है. उसने इस भयावहता को फैलाने में न सिर्फ अहम् भूमिका निभाई बल्कि इस प्रकरण में तह में जाने की बजाय उत्प्रेरक का भी काम किया. नहीं तो २६ फरवरी के बाद पूरे एक महीने से ज्यादा समय तक रेडियोधर्मिता का मामला सामने क्यों नहीं आ पाया? यह मामला अचानक सामने तब आया जब प्रधानमंत्री अमेरिका में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ परमाणु शिखर सम्मलेन में जाने की तैयारी कर रहे थे. फिर जब ए ई आर बी को इस मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की भूमिका का पता घटना के सामने आने के एक हफ्ते के बाद ही चल गया था तो इसे सामने आने में फिर विश्वविद्यालय प्रशासन को जब काफी पहले पता चल गया था तो इसने माफी मांगने में तीन हफ्ते से ज्यादा समय क्यों लिया?

सी बी आर एन वाहन के सन्दर्भ में एक चर्चा जरूरी है कि कुछ समय पूर्व इंटरनॅशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ स्ट्रेटेजिक स्टडीज, जो कि ब्रिटेन का थिंक टैंक माना जाता है, ने इस वाहन के बारे में और आई ए ई ए के साथ बीजिंग के तरह ही सुरक्षा का सहयोग राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान बनाए रखने की सिफारिश की थी.
यह सवाल ऐसे हैं जिनके तह में जाने की जरूरत है किसी पत्रकारीय धर्म के लिए नहीं बल्कि देश धर्म के लिए भी. यह समझना जरूरी है कि कहीं हमें उन तकनीकों को जबरदस्ती खरीदने के लिए बाध्य तो नहीं किया जा रहा जिसकी हमें जरूरत नहीं है या फिर डर दिखाकर या बनाकर उन एजेंसियों को काम देने के तरीके तो ढूंढें नहीं जा रहे हैं जिनके लिए हम या हमारी एजेंसियां खुद सक्षम हैं.

साथ ही देश में नाभिकीय या रेडियोधर्मी पदार्थ की सुरक्षा के बारे में नियमों को और कड़ा बनाने और उनका सख्ती से क्रियान्वयन की जरूरत है ताकि ऐसी घटना फिर कभी न हो पाए।

(संपादित अंश अमर उजाला में ४-५-२०१० को प्रकाशित)

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

दूसरे खेलों में लगे आई पी एल का पैसा

आई पी एल के बहाने जिस तरह से लोगों के नाम और कारनामे उजागर हो रहे हैं उसके दोषियों और इस षड्यंत्र में फंसने वाले लोगों का नाम पूरी तरह से बाहर आने में अभी तो वक्त लगेगा और साथ ही पूरी सच्चाई सामने आने में भी. पर इस मामले यह बात तो पूरी तरह से आईने की तरह साफ़ है कि इस पूरे प्रकरण में सारे क्रिकेटर महज एक मोहरे की तरह बन कर रह गए है और पूरी मलाई उन लोगों के बीच बंट कर रह गयी है जिनका क्रिकेट से कोई न तो ख़ास नाता है और ना ही उन्होंने क्रिकेट जैसे अंतर्राष्ट्रीय खेल को बढाने में कोई जद्दोजहद किया है. उन्हें बस क्रिकेट से होने वाली भारी-भरकम कमाई भर से मतलब है.
जब २०-२० का मैच शुरू हुआ था तो यह माना गया था कि यह दुनिया भर में फुटबाल की बढ़ती लोकप्रियता को रोकने के लिए किया गया है और आई पी एल की शुरुआत को क्रिकेट को चरमोत्कर्ष पर पहुचाने वाला कदम माना गया था. साथ ही यह भी कहा गया कि इससे प्रेरणा लेकर अन्य खेलों का भी उद्धार हो पायेगा.

पर अन्य खेलों की बात तो छोड़ दीजिये क्रिकेट का ही क्या लाभ हो रहा है वह इस पूरे प्रकरण से स्पष्ट हो रहा है. पुराने दिग्गज खिलाड़ी भी अब मान रहे हैं कि इस आई पी एल से स्थापित खिलाड़ियों के अलावा नए खिलाड़ियों को कोई ख़ास फायदा नहीं हो रहा है सिवाय इसके कि उन्हें भी टीम में जगह दे दी गयी है और उन्हें कुछ पैसे मिलने लगे हैं. क्रिकेट के खेल के उत्थान की बात छोडिये. अब अगर ऐसे में इससे प्रेरणा लेकर इसके उत्थान की बात की जाय तब तो खिलाड़ियों का खेल हो गया. होना तो यह चाहिए कि सरकार की ओर से खुली लूट मचाने वाले इस आयोजन के आयोजकों को अन्य खेलों के विकास की भी जिम्मेदारी देनी चाहिए थी. नहीं तो इनके कमाई का एक सुनिश्चित हिस्सा एक फंड बनाकर अन्य खेलों के विकास के लिए सुरक्षित रखा जाता. क्योंकि इस आयोजन में देश के दर्शकों का का बड़ा पैसा और समय बर्बाद होता है. साथ ही सरकारी तंत्र को भी इन आयोजनों की सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए खासे संसाधन झोंकने पड़ते हैं और बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है.

ऐसे में इस जिम्मेदारी से बचकर ये भाग नहीं सकते. साथ ही इस देश में एक ही खेल बढे और दूसरे हाशिये पर पड़े रहें तो स्कूलों में खेल के प्रति न तो सच्ची इच्छा जागेगी न ही लगन और दूसरे खेल मरते रहेंगे.