वरिष्ट पत्रकार वेद प्रताप वैदिक पीटीआई 'भाषा' और नवभारत टाईम्स के संपादक रह चुके है और अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध पर उन्होंने पीएचडी की है. हाल में ही जसवंत सिंह के पुस्तक 'जिन्ना: इंडिया पार्टीशन, इंडीपेंदेंस' से जिन्ना पर फिर से चर्चा शुरू हो गयी है. 'युवा' को 'वैदिक' जी ने एक विश्लेषण भेजा है जिन्ना पर, जिसे हम युवा के पाठकों के लिए सधन्यवाद प्रकाशित कर रहे हैं:
क्या यह जरूरी है कि मोहम्मद अली जिन्ना को हम देवता मानें या दानव ! देव और दानव के परे क्या कोई अन्य श्रेणी नहीं है, जिसमें गांधी, जिन्ना और सावरकर जैसे लोगों को रखा जा सके? क्या अपने इतिहास के प्रति हम थोड़े निस्संग, थोड़े निष्पक्ष, थोड़े तटस्थ हो सकते हैं? यदि साठ साल बाद भी हम में यह परिपक्वता नहीं आ सकी तो क्या हम किसी दिन अपने इतिहास को दोहराने पर मजबूर नहीं हो जाएंगे? यदि साठ-सत्तर साल पहले हम जिन्ना के समकालीन हुए होते तो शायद हमारे दिल भी उसी हिकारत से भरे होते, जिससे नेहरू और पटेल के भरे हुए थे यहां हम यह नहीं भूलें कि उस समय एक गांधी नाम का आदमी भी था, जो जिन्ना को क़ायदे-आज़म (महान नेता) बोलता था, भारतमाता का 'महान बेटा' बताता था और जिसे भारत का प्रधानमंत्री पद भी देने को तैयार था क्या गांधी को पता नहीं था कि जिन्ना के सांप्रदायिक भाषणों की वजह से ही खून की नदियां बही थीं, लाखों परिवार बेघर हुए थे और भारतमाता का सीना चीरा गया था? इसके बावजूद घृणा का रेला गांधी को अपने साथ बहा न सका शायद इसीलिए वे महात्मा कहलाए हमारी पीढ़ी जिन्ना को महात्मा के चश्मे से देखे, यह जरूरी नहीं है लेकिन जरूरी यह है कि हम उन कारणों में उतरें, जिनके चलते भारतवादी जिन्ना पाकिस्तानवादी जिन्ना बन गए
पूंजाभाई झीनाभाई के बेटे मोहम्मद अली ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे पाकिस्तान के पिता बनेंगे जिसकी मां का नाम मिठूबाई और पत्नी का नाम रतनबाई हो, जिसे न नमाज़ पढ़ना आती हो न उर्दू, जो गाय और सूअर के मांस में फर्क न करता हो, जो रोज़ दाढ़ी बनाता हो और जिसे दाढ़ीवाले मुल्लाओं में से बदबू आती हो, जो अपने आपको 'मुसलमान' कहे जाने पर भड़क उठता हो, भला ऐसा आदमी औरंगजेब के बाद मुसलमानों का सबसे बड़ा रहनुमा कैसे बन गया? जो आदमी सेंट्रल एसेम्बली में 1925 में खड़े होकर दहाड़ता हो कि ''मैं भारतीय हॅूं, पहले भी, बाद में भी और अंत में भी'', जो मुसलमानों का गोपालकृष्ण गोखले-जैसा नरम नेता बनना अपना जीवन-लक्ष्य समझता रहा हो, जो तुर्की के खलीफा को बचाने के गांधीवादी आंदोलन को पोंगा-पंथी मानता हो, जो मुसलमानों के पृथक मतदान और पृथक निर्वाचन-क्षेत्रों का विरोध करता रहा हो, जिसने मज़हब और राजनीति के घालमेल के गांधी, मौलाना मोहम्मद अली और आगा खान के प्रयत्नों को सदा रद्द किया हो, जिसने बाल गंगाधर तिलक की छोटी-सी अवमानना के लिए वॉयसराय विलिंगडन को मुंबई में नकेल पहना दी हो, 'रंगीला रसूल' के प्रकाशक महाशय राजपाल के हत्यारे अब्दुल क्रय्यूम को फांसी पर लटकाने का जिसने समर्थन किया हो, लाहौर के शहीदगंज गुरुद्वारे के विवाद में जिसने सिखों को न्याय दिलवाने में कोई क़सर न छोड़ी हो, 1933 में जिसने 'पाकिस्तान' शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली की मज़ाक उड़ाई हो और उनकी डिनर पार्टी का बहिष्कार किया हो, कट्टरपंथी मुल्लाओं ने जिसे 'क़ातिल-ए-आज़म' और 'क़ाफिर-ए-आज़म' का खिताब दिया हो, सरोजिनी नायडू ने जिसे 'हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत' कहा हो, जिसने मुंबई के अपने मुस्लिम मतदाताओं को 1934 के चुनाव में दो-टूक शब्दों में कहा हो, ''मैं भारतीय पहले हूं, मुसलमान बाद में'', जिसे चुनाव जिताने के लिए हिंदू मित्रों ने कारों के काफिले खड़े कर दिए हों, जलियांवाला बाग और भगतसिंह के मामले में जब गांधी जैसे नेता हकला रहे थे, जिस बेरिस्टर ने एसेम्बली को हिला दिया हो, 1938 तक जिस नेता का रसोइया हिंदू हो, ड्राइवर सिख हो, आशुलिपिक मलयाली ब्राह्रमण हो, रक्षा-अधिकारी गोरखा हिंदू हो, जिसके पार्टी-अखबार का संपादक ईसाई हो और जिसका निजी डॉक्टर पारसी हो, उस मोहम्मद अली जिन्ना ने यह कहना कैसे शुरू कर दिया कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं एक भारत में दो क़ौमें साथ-साथ नहीं रह सकतीं हिंदू और मुसलमान बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नहीं, दो राष्ट्र हैं, दो इतिहास हैं, दो परम्पराएं हैं, दो जीवन-पद्घतियां हैं उनकी दो भाषाएं हैं, दो भूषा हैं, दो भोजन हैं, दो भवन हैं, दो कानून हैं, दो केलेंडर हैं, दो रुझान हैं, दो महत्वाकांक्षाएं हैं, दो लक्ष्य हैं उनका भला इसी में है कि वे एक-दूसरे के मातहत न रहें अलग-अलग रहें जिन्ना के अनुसार अलगाव का यह बीज भारत-भूमि में उसी दिन पड़ गया, जिस दिन कोई पहला भारतीय मुसलमान बना मज़हब के नाम पर दुनिया के सबसे पहले और शायद आखिरी राष्ट्र का निर्माण हुआ और उसका नाम है, पाकिस्तान ! इस पाकिस्तान के एकमात्र जनक थे, जिन्ना !
पाकिस्तान पाकर जिन्ना को क्या मिला? उन्होंने खुद कहा मुझे कुतरा हुआ और दीमक खाया हुआ पाकिस्तान मिला पंजाब और बंगाल बंट गए सरहदी सूबे और कश्मीर ने भी साथ नहीं दिया उनकी अपनी बेटी दीना उनके साथ नहीं गई मुंबई का शानदार घर और प्राणपि्रया रतनबाई की कब्र भारत में ही छूट गई लाखों लोग मारे गए, लाखों बेघर हुए और भारत के मुसलमान दो हिस्सों में बंट गए बांग्लादेश बनने पर तीन हिस्सों में बंट गए मौलाना मौदूदी ने ठीक ही कहा कि जिन्ना ने भारत के मुसलमानों का जितना नुकसान किया, किसी ने नहीं किया जो पाकिस्तान में रहे, वे अमेरिकी ईसाइयों की कठपुतली बन गए और जो हिंदुस्तान में रह गए, उनकी हैसियत काफि़रों के राज में ''भेड़-बकरी की-सी बन गई'' भारत अखंड न रह सका लेकिन मुसलमान तो खंड-खंड हो गए इस्लाम के नाम पर वे फौजी बूटों तले रौंदे जा रहे हैं क्या जिन्ना जैसा कुशाग्र बुद्घि का धनी इस अनहोनी को नहीं समझ पाया? वास्तव में इसके होने के पहले तक वे इसे समझ नहीं पाए अगर समझ जाते तो वे शायद पाकिस्तान के सबसे बड़े विरोधी होते वे जून 1947 तक यही समझते रहे कि पाकिस्तान तो सिर्फ एक गोटी है, जिसे वे अंग्रेज की शतरंज पर हिंदू-मुस्लिम समता के लिए आगे बढ़ा रहे हैं उन्हें क्या पता था कि कांग्रेस के कुर्सीप्रेमी कमजोर नेता इतनी जल्दी घुटने टेक देंगे वे 1920 के नागपुर अधिवेशन में गांधी से मात खा गए थे, वे 1928 की नेहरू रिपोर्ट को सुधरवाने में असफल हो गए थे, 1937 में प्रचंड विजय के बावजूद मुस्लिम लीग को वे उ.प्र. मंत्र्िामंडल में शामिल नहीं करवा पाए थे, 1946 की अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीगी मंत्र्िायों की महत्वहीनता ने उन्हें आहत किया था उन पर सौ सुनारों की चोटें पड़ती रहीं आखिरकार उन्होंने एक लुहार की जमा दी उन्हें पाकिस्तान मिल गया जिद पूरी हो गई जिद पूरी हुई, गुस्सा ठंडा हुआ, होश आया तो पता चला कि 'मेरे जीवन की यह सबसे बड़ी भूल थी' वे शिखर-पुरुष बनने के लिए ही पैदा हुए थे कांग्रेस के न बन सके तो मुस्लिम लीग के बन गए क़ायदे-आज़म शिखर पर पहुंच गए और जिन्ना तलहटी में छूट गए इसी जिन्ना की खोज में वे आाखरी दम तक तड़फते रहे सिर्फ 13 माह वे पाकिस्तान के पिता रहे और पूरे 71 साल भारत मां के बेटे रहे वे 40 साल भारत के लिए लड़े और सिर्फ 7 साल पाकिस्तान के लिए लड़े शायद पाकिस्तान के लिए भी नहीं, केवल अपने अहंकार के लिए ही लड़े इसीलिए उन्हें न तो कट्टरपंथी कहा जा सकता है और न ही सेक्युलर वे तो सिर्फ मिस्टर जिन्ना थे
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जिन्ना पर आडवाणी के बयान को लेकर जब जून 2005 में विवाद उठा तो डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने जिन्ना पर जो मौलिक एवं शोधपरख लेख लिखा था. डॉ. वैदिक ऐसे पहले भारतीय हैं, जिन्हें 1983 में कराची की जिन्ना एकेडेमी ने व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया था
शनिवार, 22 अगस्त 2009
सोमवार, 27 जुलाई 2009
"समीर लाल उड़नतश्तरी वाले" : आख़िर इस नाम का राज क्या है
सबसे पहले तो गुस्ताखी माफ़! पर जब से मैंने 'समीर लाल उड़न तश्तरी वाले' का नाम ब्लॉगवाणी पर देखा तभी से मेरे पेट में दर्द शुरू हो गया. वैसे तो मैंने भी बाबा समीरानंद को इस नए नाम की बधाई आनन-फानन में दे डाली ताकि कोई और पहले से इसका कॉपीराइट लेने के बारे में विचार शुरू न कर सके. पर अब तक नहीं समझ पाया कि आखिर इस नाम की जरूरत क्यों पड़ी - 'समीर लाल उड़न तश्तरी वाले'!
अब सारी ब्लॉग दुनिया जानती है की उड़नतश्तरी सिर्फ और सिर्फ उन्हीं की है और कोई भी इसमें उड़ने की जुर्रत करने की सोच भी नहीं सकता है ऐसे में इस नाम की जरूरत क्यों पड़ी? अब कोई दो-चार उड़नतश्तरी हो तो शायद सोचें कि कुछ ख़ास पहचान के लिए यह किया जाय. जैसे दिल्ली में मिठाई की दुकानों पर लिखा होता है. अग्रवाल स्वीट्स 'करांची वाले' या अग्रवाल स्वीट्स 'देशी घी वाले' या चांदनी चौक के पराँठे वाली गली में अपनी पहचान के लिए लिखा होता है पराँठे वाली दुकान 'असली वाले' .... आदि-आदि. पर यह समस्या कम से कम अपने बाबा समीरानंद को तो नहीं हो सकती है।
न ही बाबा को यह समस्या है कि ब्लॉग पर उनके हमनाम कई पैदा हो गए हों और उनसे प्रतियोगिता का कोई खतरा हो गया हो. वैसे कुछ समीर को मैं जानता हूँ पर निश्चिंत हूँ कि उनके पास ब्लॉग लिखने के बारे में हम निठल्लों की तरह सोचने का भी वक्त नहीं है. जैसे दुनिया के सबसे बड़े अखबार के मालिक भी समीर साहेब ही हैं. पर ब्लॉग लेखन (ख़ास कर हिंदी से) उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. तो यह खतरा बाबा समीरानद को कतई नहीं है. एक समीर हमारे पुराने बॉस हुआ करते थे, बड़े प्यारे से. पार्टियाँ देने में उनकी कोई सानी नहीं थी और घूमने के भी गजब शौकीन थे. बाद में वे देश के एक बेहद मशहूर टीवी चैनल में बॉस बनकर चले गए.
एक समीर काग्डी नाम का मेरा मित्र बना, जब मैं नेशनल डिफेन्स अकादेमी में चयनित होकर उसके साक्षात्कार के लिए बंगलोर गया था. चार दिन की दोस्ती वह परवान चढी की सेलेक्शन होने बाद भी काफी दिनों तक पत्र लिखता रहा जब तक की नेवी में वह पायलट नहीं बन गया और मैंने उसे चिठ्ठी के जबाव में लिखा था की पत्रकारों से मित्रता कहीं तुम्हारे करियर में दिक्कत तो नहीं देगी? उसके बाद तो वह महानुभाव गधे की सींग की तरह गायब हो गए.
एक समीर और मेरा मित्र बना. समीर महेन्द्रू नामक यह मित्र तब आया जब मैं पीटीआई में काम कर रहा था और वह भी साथ ही था. बाद में वह Dow jones में चला गया और मेरा संपर्क टूट गया. और, एक समीर साहेब हमारे पडोसी हैं. ऐसे की उनके दरवाजे और मेरे दरवाजे को संभालने वाला खम्बा भी फ्लैट में एक ही है. पर इन साहब से पिछले चार साल में चार बार से ज्यादा बात नहीं हुई है. पेशे से आईटी पेशेवर हैं और लिखने-पढने के धंधे को निचले तबके का काम मानते हैं. गनीमत यह है कि एक अखबार लेते हैं और उसे कभी-कभी पढ़ते भी हैं.
पर जहाँ तक मेरी समझ है तो इन चारों-पाँचों समीर से इन्हें तो कतई खतरा नहीं है. फिर यह 'समीर लाल उड़नतश्तरी वाले' जैसा खोजपूर्ण नाम क्यों? अगर पाठकगण मेरी मदद कर सकते हैं तो जरूर सुझाव दें क्योंकि मैं उम्र के इस पड़ाव पर दिल्ली में दूसरा चांदनी चौक नहीं बनवाना चाहता हूँ (अपने सर पर).... पर यह न कहियेगा कि नाम में क्या रखा है?
अब सारी ब्लॉग दुनिया जानती है की उड़नतश्तरी सिर्फ और सिर्फ उन्हीं की है और कोई भी इसमें उड़ने की जुर्रत करने की सोच भी नहीं सकता है ऐसे में इस नाम की जरूरत क्यों पड़ी? अब कोई दो-चार उड़नतश्तरी हो तो शायद सोचें कि कुछ ख़ास पहचान के लिए यह किया जाय. जैसे दिल्ली में मिठाई की दुकानों पर लिखा होता है. अग्रवाल स्वीट्स 'करांची वाले' या अग्रवाल स्वीट्स 'देशी घी वाले' या चांदनी चौक के पराँठे वाली गली में अपनी पहचान के लिए लिखा होता है पराँठे वाली दुकान 'असली वाले' .... आदि-आदि. पर यह समस्या कम से कम अपने बाबा समीरानंद को तो नहीं हो सकती है।
न ही बाबा को यह समस्या है कि ब्लॉग पर उनके हमनाम कई पैदा हो गए हों और उनसे प्रतियोगिता का कोई खतरा हो गया हो. वैसे कुछ समीर को मैं जानता हूँ पर निश्चिंत हूँ कि उनके पास ब्लॉग लिखने के बारे में हम निठल्लों की तरह सोचने का भी वक्त नहीं है. जैसे दुनिया के सबसे बड़े अखबार के मालिक भी समीर साहेब ही हैं. पर ब्लॉग लेखन (ख़ास कर हिंदी से) उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. तो यह खतरा बाबा समीरानद को कतई नहीं है. एक समीर हमारे पुराने बॉस हुआ करते थे, बड़े प्यारे से. पार्टियाँ देने में उनकी कोई सानी नहीं थी और घूमने के भी गजब शौकीन थे. बाद में वे देश के एक बेहद मशहूर टीवी चैनल में बॉस बनकर चले गए.
एक समीर काग्डी नाम का मेरा मित्र बना, जब मैं नेशनल डिफेन्स अकादेमी में चयनित होकर उसके साक्षात्कार के लिए बंगलोर गया था. चार दिन की दोस्ती वह परवान चढी की सेलेक्शन होने बाद भी काफी दिनों तक पत्र लिखता रहा जब तक की नेवी में वह पायलट नहीं बन गया और मैंने उसे चिठ्ठी के जबाव में लिखा था की पत्रकारों से मित्रता कहीं तुम्हारे करियर में दिक्कत तो नहीं देगी? उसके बाद तो वह महानुभाव गधे की सींग की तरह गायब हो गए.
एक समीर और मेरा मित्र बना. समीर महेन्द्रू नामक यह मित्र तब आया जब मैं पीटीआई में काम कर रहा था और वह भी साथ ही था. बाद में वह Dow jones में चला गया और मेरा संपर्क टूट गया. और, एक समीर साहेब हमारे पडोसी हैं. ऐसे की उनके दरवाजे और मेरे दरवाजे को संभालने वाला खम्बा भी फ्लैट में एक ही है. पर इन साहब से पिछले चार साल में चार बार से ज्यादा बात नहीं हुई है. पेशे से आईटी पेशेवर हैं और लिखने-पढने के धंधे को निचले तबके का काम मानते हैं. गनीमत यह है कि एक अखबार लेते हैं और उसे कभी-कभी पढ़ते भी हैं.
पर जहाँ तक मेरी समझ है तो इन चारों-पाँचों समीर से इन्हें तो कतई खतरा नहीं है. फिर यह 'समीर लाल उड़नतश्तरी वाले' जैसा खोजपूर्ण नाम क्यों? अगर पाठकगण मेरी मदद कर सकते हैं तो जरूर सुझाव दें क्योंकि मैं उम्र के इस पड़ाव पर दिल्ली में दूसरा चांदनी चौक नहीं बनवाना चाहता हूँ (अपने सर पर).... पर यह न कहियेगा कि नाम में क्या रखा है?
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
हाँ, देवनागरी के विकास का इतिहास ६००० साल पुराना
कुछ समय पूर्व एक लेख (हिंदी: आखिर कहाँ चूकें हम, २१ जून) में वरिष्ठ ब्लॉगर और इतिहास के विद्वान पी एन सुब्रमनियन ने अपनी प्रतिक्रिया में यह सवाल उठाया था कि आखिर देवनागरी लिपि का इतिहास ६००० साल पुराना कैसे हुआ? सुब्रमनियन जी के सवाल गंभीर थे और जवाब की अपेक्षा रखते हैं. ऐसे में मैंने इस मामले को फिर से डॉ. महेंद्र के सामने रखने का मन बनाया और साथ ही इतिहास में भी कुछ गोता मारने की कोशिश की.
देवनागरी मूलतः संस्कृत की लिपि कही जाती है पर संस्कृत का इतिहास भी ६००० साल पुराना नहीं है. "द वंडर दैट वाज इंडिया" के लेखक और इतिहासविद ए एल बाशम प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद को ज्यादा से ज्यादा २००० ईसा पूर्व का मानते हैं. इस प्रकार से यह देवनागरी के विकास की बात मात्र ४००० वर्ष पुरानी ही होती है. वह भी खरोष्ठी, ब्राह्मी व अन्य लिपियों के रास्ते से. हांलाकि बाशम साथ यह भी स्वीकारोक्ति भी करते हैं कि संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरुप ही पश्चिम में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है.
जैसा कि बाशम लिखते हैं " प्राचीन भारत के महत्तम उपलब्धियों में से एक उसकी विलक्षण वर्णमाला है जिसमें प्रथम स्वर आते हैं और फिर व्यंजन जो सभी उत्पत्ति क्रम के अनुसार अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत किये गए हैं. इस वर्णमाला का अविचारित रूप से वर्गीकृत तथा अपर्याप्त रोमन वर्णमाला से, जो तीन हजार वर्षों से क्रमशः विकसित हो रही थी, पर्याप्त अंतर है. पश्चिमी देशों द्वारा संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरूप ही यूरोप में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है."
खैर, इस कथन से संस्कृत की श्रेष्ठता भले ही सिद्ध होती हो पर इससे देवनागरी के ६००० साल पुराने होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है. पर डा. महेंद्र के अनुसार लिपि का विकास महज वेदों के विकास भर से नहीं जुड़ा हुआ है. वस्तुतः इनका विकास समझने के लिए चित्र लिपि और भित्ति चित्रों की ओर भी देखना होगा जहाँ से दुनिया कि सभी लिपियों का विकास हुआ है. चित्र लिपि से देवनागरी के विकास की बात समझनी हो तो पवर्ग सबसे अच्छा उदाहरण है जिसमें उच्चारण के समय ओष्ठद्वय ठीक उसी प्रकार की सरंचना बनाते हैं जिस प्रकार से पवर्ग के वर्ण लिखे जाते हैं.
डा. महेंद्र का यह भी कहना है कि अगर यह चित्र लिपि का देश में सबसे प्राचीन प्रमाण में से एक देखना हो तो मध्य प्रदेश में भीमवेदका की गुफाएं देखनी चाहिए. ये गुफाएं चित्र लिपि का बेजोड़ नमूना है और ६००० वर्ष से भी ज्यादा पुराना इसका इतिहास है. इसमें ज्यामितिक चित्रों से लेकर आधुनिक लिपियों के प्रमाण मिल जाते हैं. ऐसे में देवनागरी के विकास का इतिहास ६००० वर्ष से ज्यादा पुराना होता है. वैसे वेदों के बारे में एक बात और समझने की है कि वेद लिखित रूप में काफी बाद में अस्तित्व में आये. पर वाचिक परंपरा में वेदों ने भोजपत्रों पर अपना अस्तित्व कायम करने से पूर्व सैकडों या शायद हजारों सालों की यात्रा तय की है.
देवनागरी मूलतः संस्कृत की लिपि कही जाती है पर संस्कृत का इतिहास भी ६००० साल पुराना नहीं है. "द वंडर दैट वाज इंडिया" के लेखक और इतिहासविद ए एल बाशम प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद को ज्यादा से ज्यादा २००० ईसा पूर्व का मानते हैं. इस प्रकार से यह देवनागरी के विकास की बात मात्र ४००० वर्ष पुरानी ही होती है. वह भी खरोष्ठी, ब्राह्मी व अन्य लिपियों के रास्ते से. हांलाकि बाशम साथ यह भी स्वीकारोक्ति भी करते हैं कि संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरुप ही पश्चिम में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है.
जैसा कि बाशम लिखते हैं " प्राचीन भारत के महत्तम उपलब्धियों में से एक उसकी विलक्षण वर्णमाला है जिसमें प्रथम स्वर आते हैं और फिर व्यंजन जो सभी उत्पत्ति क्रम के अनुसार अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत किये गए हैं. इस वर्णमाला का अविचारित रूप से वर्गीकृत तथा अपर्याप्त रोमन वर्णमाला से, जो तीन हजार वर्षों से क्रमशः विकसित हो रही थी, पर्याप्त अंतर है. पश्चिमी देशों द्वारा संस्कृत के अन्वेषण के परिणामस्वरूप ही यूरोप में ध्वनिविज्ञान कि उत्पत्ति हुई है."
खैर, इस कथन से संस्कृत की श्रेष्ठता भले ही सिद्ध होती हो पर इससे देवनागरी के ६००० साल पुराने होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है. पर डा. महेंद्र के अनुसार लिपि का विकास महज वेदों के विकास भर से नहीं जुड़ा हुआ है. वस्तुतः इनका विकास समझने के लिए चित्र लिपि और भित्ति चित्रों की ओर भी देखना होगा जहाँ से दुनिया कि सभी लिपियों का विकास हुआ है. चित्र लिपि से देवनागरी के विकास की बात समझनी हो तो पवर्ग सबसे अच्छा उदाहरण है जिसमें उच्चारण के समय ओष्ठद्वय ठीक उसी प्रकार की सरंचना बनाते हैं जिस प्रकार से पवर्ग के वर्ण लिखे जाते हैं.
डा. महेंद्र का यह भी कहना है कि अगर यह चित्र लिपि का देश में सबसे प्राचीन प्रमाण में से एक देखना हो तो मध्य प्रदेश में भीमवेदका की गुफाएं देखनी चाहिए. ये गुफाएं चित्र लिपि का बेजोड़ नमूना है और ६००० वर्ष से भी ज्यादा पुराना इसका इतिहास है. इसमें ज्यामितिक चित्रों से लेकर आधुनिक लिपियों के प्रमाण मिल जाते हैं. ऐसे में देवनागरी के विकास का इतिहास ६००० वर्ष से ज्यादा पुराना होता है. वैसे वेदों के बारे में एक बात और समझने की है कि वेद लिखित रूप में काफी बाद में अस्तित्व में आये. पर वाचिक परंपरा में वेदों ने भोजपत्रों पर अपना अस्तित्व कायम करने से पूर्व सैकडों या शायद हजारों सालों की यात्रा तय की है.
बुधवार, 22 जुलाई 2009
जब सूर्यग्रहण के चक्कर में फंसे हनुमान जी
सूर्य ग्रहण का नजारा देखने के लिए कल रात से ही तैयारी कर ली थी- कैमरा, फिल्म वाला चश्मा ... - पर इन्द्र भगवान की कृपा. ऐन वक्त पर धोखा दे दिया. बादलों के साथ वो लुका-छिपी खेली कि टीवी के सामने बैठ कर ही पूर्ण ग्रहण देखने का संतोष करना पड़ा.
नहीं तो क्या-क्या तैयारी मैंने कर रखी थी मैं आपको कैसे बताऊँ? अब कल गया था शाम को हनुमान जी के मंदिर में. मंगलवार था हनुमान जी के दर्शन जरूरी थे. वैसे भी हनुमान जी एकमात्र देवता (वैसे देवगण उन्हें यह श्रेणी देने को तैयार नहीं है) है जिन्होंने सूर्य जैसे विशाल ब्रह्मांडीय पिंड को निगलने का दुस्साहस दिखाया था- कोई फल समझ कर! कम से कम तुलसीदास जी और वाल्मीकि तो यही कह गए हैं नहीं तो इस अज्ञ को इतना ज्ञान कहाँ?
खैर, चर्चा हनुमान जी की हो रही थी. तो मंदिर पहुँचने पर देखा तो हनुमान जी के दर्शन की लाइन ही गायब थी. मात्र दस बारह लोग खड़े थे. मैं खुश भी हुआ और विस्मित भी. खुश इसलिए की चलो जल्दी निबट लेंगे और विस्मित इसलिए कि यह क्या हुआ? इस विकसित दिल्ली में हनुमान भक्तों कि संख्या में एकदम से गिरावट कैसे आ गयी. मानो लाइन न हुई बजट के दिन सेंसेक्स का ग्राफ हो गया. पर इससे पहले मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाता कि पता चला मैं पवनपुत्र के सामने खडा हूँ.
पर यह क्या? जिस परमवीर ने सूर्य को निगल कर पूरी धरती पर ना जाने कितना लम्बा सूर्य ग्रहण कर दिया था वे खुद आज सूर्य ग्रहण की डर से लाल वस्त्र ओढे पड़े थे. जय हो हमारे पंडितों की. इधर उ़धर नजर दौडाई तो पता चला कि सभी मूर्तियों पर यही नजारा था. पूछा तो पता चला कि सूतक है और ग्रहण ख़त्म होने तक ऐसा ही रहेगा. अब अंधविश्वाशी आदमी तो आदमी भगवान तक को हमारे पंडितों ने ग्रहण के नाम पर डरा के रखा हुआ था. हनुमान जी तक को नहीं छोडा, इंसान को क्या छोडेंगे. अब, हनुमान जी क्या सोच रहे होंगे यह तो सिर्फ अनुमान ही कर सकते हैं. पर इतना तो जरूर कसमसा रहे होंगे कि ग्रहण तक इन पुजारियों ने मुझे ढँक रखा है इनको फिर से रामायण पढ़ाऊं. नहीं तो कम से कम टीवी तो देखने देते तो मैं ग्रहण का नजारा अपनी आँखों से ही सही देख तो लेता! अब इतने लम्बे सूर्य ग्रहण के लिए पूरी एक सदी तक इन्तजार करना पडेगा. आपकी क्या राय है?
सोमवार, 13 जुलाई 2009
सितारा देवी, भूपेन हजारिका को संगीत अकादेमी फेलोशिप
जानी-मानी कत्थक नृत्यागना सितारा देवी और मशहूर संगीतकार भूपेन हजारिका को इस वर्ष के प्रतिष्ठित संगीत अकादेमी फेलोशिप से सम्मानित किया जायेगा। भारत के राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल १४ जुलाई को एक विशेष समारोह में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में इनके साथ-साथ कला और संस्कृति क्षेत्र की अन्य कई मशहूर हस्तियों को सम्मानित करेंगी. विस्त्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर जाएँ:
http://fachcha.com/youngistan/sangeet-natak-akademi-fellowship-for-sitara-devi-bhupen-hazarika/
http://fachcha.com/youngistan/sangeet-natak-akademi-fellowship-for-sitara-devi-bhupen-hazarika/
रविवार, 12 जुलाई 2009
तो समलैंगिकता के नाम पर लूट की तैयारी है
(समलैंगिकता के बहाने-II)
इनदिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिलों का मौसम चल रहा है। 'युवा' की ओर से कॉलेज में दाखिले के लिए कुछ छात्रों से जब समलैंगिकता पर राय जानने की कोशिश की गयी तो अधिकाँश तो इस मामले पर चर्चा करने से बचते रहे पर कुछ छात्रों ने बड़ा ही अजीब सा सवाल खडा कर दिया. हिन्दू कॉलेज में दाखिले के लिए आये एक छात्र ने उल्टे पूछ डाला कि वह कॉलेज में हॉस्टल चाहता है वह भी सिंगल कमरे वाला ताकि उसे कोई समलैंगिक कि श्रेणी में नहीं डाले. यह बड़ा ही अजीब किस्म का सवाल था. पर सच्चाई यही है कि इस ताजा फैसले से सिंगल सेट के कमरों की मांग एकाएक बढ़ गयी है, सिर्फ इसलिए कि दूसरे दोस्त उसे इस श्रेणी में डालकर चिढाने न लगे.
यह सामाजिक संबंधों में अदालती फैसले के बाद रातों-रात आये बदलाव का परिचायक है। संबंधों को इस प्रकार परिभाषित कर दिया जाय कि एक सहपाठी दूसरे सहपाठी को शक की निगाह से देखने लगे यह आने वाले समय में खतरनाक बदलाव के संकेत हैं. परिवार के स्तर पर क्या होने वाला है इसका अभी अंदाजा लगाने में समाजशास्त्रियों को वक्त लग सकता है पर वैसे भी बिखरते परिवारों के युग में यह अधिकार एक बहुत बड़ा झटका है जिसे संभालना आसान काम नहीं होगा. वैसे भी भारतीय संयुक्त परिवार प्रगतिशील मध्यमवर्ग की प्रगति में रोड़ा बनता रहा है.
भारत में एकल परिवारों का उदय और विकास इस मध्यवर्ग के मदद से ही हुआ है। वर्ना उच्च स्तरीय या निम्न वर्गीय परिवार अभी भी संयुक्त परिवारों की थाती संभाले हुए हैं. कहने को यह मध्य वर्ग सबसे प्रगतिशील है पर सबसे स्वार्थी भी और उसके इस स्वार्थपरता व तथाकथित प्रगतिशीलता का फायदा सबसे ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उठा रही हैं. (यही काम पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी का भी था ब्रिटिश राज में). क्योंकि जितना ज्यादा आप अकेले होंगे उतना ही ज्यादा आपकी निर्भरता इन कम्पनियों, इनकी सेवाओं और इनके उत्पादों पर होगी. तब आप अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा इन्हें देंगे जो कि आप अब तक बैंकों में बचत करते रहें हैं. परिवार में रहते हुए यह खुली लूट संभव नहीं है. इसलिए अधिक आमदनी के लिए इन परिवारों को तोड़ना बेहद जरूरी है क्योंकि एकल परिवार भी अब संयुक्त परिवारों की तरह (बदलते समय और बुजुर्गों की सूझ-बूझ की वजह से) ही मजबूत हो चुके हैं. अगर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों व उनकी सेवाओं का आप हिसाब लगाएं तो आपको खुद समझ में आ जाएगा की आपके वेतन का कितना बड़ा हिस्सा इनको नियमित रूप से चला जाता है. और, यही कंपनियाँ इन गे परेड के लिए पैसे देती है, सेमीनार करवाती हैं और इनका मीडिया में भरपूर प्रसार हो सके इसकी भी व्यवस्था करती है.इन स्थितियों में परिवार और अन्ततः समाज को बचाए रखने की जिम्मेदारी किसकी बनती है इसका निर्णय मैं आप पाठकों पर छोड़ता हूँ.
जहां तक मनोविज्ञान की बात है तो मैंने समाजशास्त्र भी पढ़ा है और मनोविज्ञान का भी विद्यार्थी रहा हूँ। इस नाते मुझे पता है कि हर मानवीय क्रिया की एक न्यायसंगत और तार्किक व्याख्या भी होती है. यहाँ तक की बलात्कार, हत्या और दंगे जैसे कृत्यों की भी. अगर ये भी ज्यादा संख्या में होने लगे और कानूनी व्यवस्था इसे संभालने में सफल न हो पाए तो कानून को इसे सिर्फ इसलिए मान्यता दे देना चाहिए कि अब इसे ज्यादा संख्या में लोग करने लगे हैं? कानूनविदों को इस पर विचार करना चाहिए.
जहाँ तक समलैंगिकों की बात है तो इनमें अधिकाँश वे लोग हैं जो यौनातिरेकता से उब चुके हैं और यौन आनंद के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार खड़े हैं। और, ऐसे लोगों में अधिसंख्य ऐसे हैं जिनके पास प्राकृतिक यौन सुख के एक नहीं अनेक साधन उपलब्ध हैं. जो लोग कामसूत्र और अजंता, खजुराहो का उदाहरण देते हैं वे शायद यह भूल जाते हैं कि इनमें समलैंगिकों का कोई स्थान नहीं है. क्षेपक या अपवाद की बात अलग है. और, इन सबकी रचना तब हुई थी जब भारत का स्वर्णिम काल था और इनके रचना काल के बाद से ही तत्कालीन साम्राज्य के पतन की भी शुरुआत हो गयी थी.
अगर इस हिसाब से देखें तो इस मामले में हम स्वर्ण युग?? में जी रहे हैं क्योंकि अमेरिका, यूरोप जैसी महाशक्तियां अभी मंदी के दौर से गुजर रही हैं और भारत ने फिलहाल अपने को बेहतर स्थिति में बनाए रखा है. आने वाला साल और भी बेहतर होगा क्योंकि दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम होने वाले हैं. यह दिल्ली के लिए कम से कम इस दशक में सबसे बेहतर साल होगा. अब इतिहास के अनुसार चलें तो इस एक-डेढ़ साल में हम ऐसे विकसित कामुक समाज की रचना कर चुके होंगे जिसमें किसी भी प्रकार के यौन सुख पर किसी प्रकार की बाधा नहीं होगी क्योंकि हमें विदेशियों को खुश रखना है. चाहे वे गे या लेस्बियन का यौन सुख हो या फिर अन्य प्रकार के यौनाचार. इस स्वर्णिम अवसर पर सब कुछ उपलब्ध कराने की व्यवस्था इस फैसले के बहाने होने लगी है. अब इससे चाहे देश में ऐड्स फैले या फिर देश कि संस्कृति नष्ट हो. पैसा बनाने वाले इससे पैसा बनाने का रास्ता तैयार कर चुके हैं. मीडिया, कोर्ट इनके लिए औजार भर हैं वह भी इसलिए की आम जनता या हम अब भी इसपर बात करने से कतरा रहे हैं. और, हमारी कमजोरी को उन्होंने समझ लिया है बहुत ही अच्छी तरह.
इनदिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिलों का मौसम चल रहा है। 'युवा' की ओर से कॉलेज में दाखिले के लिए कुछ छात्रों से जब समलैंगिकता पर राय जानने की कोशिश की गयी तो अधिकाँश तो इस मामले पर चर्चा करने से बचते रहे पर कुछ छात्रों ने बड़ा ही अजीब सा सवाल खडा कर दिया. हिन्दू कॉलेज में दाखिले के लिए आये एक छात्र ने उल्टे पूछ डाला कि वह कॉलेज में हॉस्टल चाहता है वह भी सिंगल कमरे वाला ताकि उसे कोई समलैंगिक कि श्रेणी में नहीं डाले. यह बड़ा ही अजीब किस्म का सवाल था. पर सच्चाई यही है कि इस ताजा फैसले से सिंगल सेट के कमरों की मांग एकाएक बढ़ गयी है, सिर्फ इसलिए कि दूसरे दोस्त उसे इस श्रेणी में डालकर चिढाने न लगे.
यह सामाजिक संबंधों में अदालती फैसले के बाद रातों-रात आये बदलाव का परिचायक है। संबंधों को इस प्रकार परिभाषित कर दिया जाय कि एक सहपाठी दूसरे सहपाठी को शक की निगाह से देखने लगे यह आने वाले समय में खतरनाक बदलाव के संकेत हैं. परिवार के स्तर पर क्या होने वाला है इसका अभी अंदाजा लगाने में समाजशास्त्रियों को वक्त लग सकता है पर वैसे भी बिखरते परिवारों के युग में यह अधिकार एक बहुत बड़ा झटका है जिसे संभालना आसान काम नहीं होगा. वैसे भी भारतीय संयुक्त परिवार प्रगतिशील मध्यमवर्ग की प्रगति में रोड़ा बनता रहा है.
भारत में एकल परिवारों का उदय और विकास इस मध्यवर्ग के मदद से ही हुआ है। वर्ना उच्च स्तरीय या निम्न वर्गीय परिवार अभी भी संयुक्त परिवारों की थाती संभाले हुए हैं. कहने को यह मध्य वर्ग सबसे प्रगतिशील है पर सबसे स्वार्थी भी और उसके इस स्वार्थपरता व तथाकथित प्रगतिशीलता का फायदा सबसे ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उठा रही हैं. (यही काम पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी का भी था ब्रिटिश राज में). क्योंकि जितना ज्यादा आप अकेले होंगे उतना ही ज्यादा आपकी निर्भरता इन कम्पनियों, इनकी सेवाओं और इनके उत्पादों पर होगी. तब आप अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा इन्हें देंगे जो कि आप अब तक बैंकों में बचत करते रहें हैं. परिवार में रहते हुए यह खुली लूट संभव नहीं है. इसलिए अधिक आमदनी के लिए इन परिवारों को तोड़ना बेहद जरूरी है क्योंकि एकल परिवार भी अब संयुक्त परिवारों की तरह (बदलते समय और बुजुर्गों की सूझ-बूझ की वजह से) ही मजबूत हो चुके हैं. अगर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों व उनकी सेवाओं का आप हिसाब लगाएं तो आपको खुद समझ में आ जाएगा की आपके वेतन का कितना बड़ा हिस्सा इनको नियमित रूप से चला जाता है. और, यही कंपनियाँ इन गे परेड के लिए पैसे देती है, सेमीनार करवाती हैं और इनका मीडिया में भरपूर प्रसार हो सके इसकी भी व्यवस्था करती है.इन स्थितियों में परिवार और अन्ततः समाज को बचाए रखने की जिम्मेदारी किसकी बनती है इसका निर्णय मैं आप पाठकों पर छोड़ता हूँ.
जहां तक मनोविज्ञान की बात है तो मैंने समाजशास्त्र भी पढ़ा है और मनोविज्ञान का भी विद्यार्थी रहा हूँ। इस नाते मुझे पता है कि हर मानवीय क्रिया की एक न्यायसंगत और तार्किक व्याख्या भी होती है. यहाँ तक की बलात्कार, हत्या और दंगे जैसे कृत्यों की भी. अगर ये भी ज्यादा संख्या में होने लगे और कानूनी व्यवस्था इसे संभालने में सफल न हो पाए तो कानून को इसे सिर्फ इसलिए मान्यता दे देना चाहिए कि अब इसे ज्यादा संख्या में लोग करने लगे हैं? कानूनविदों को इस पर विचार करना चाहिए.
जहाँ तक समलैंगिकों की बात है तो इनमें अधिकाँश वे लोग हैं जो यौनातिरेकता से उब चुके हैं और यौन आनंद के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार खड़े हैं। और, ऐसे लोगों में अधिसंख्य ऐसे हैं जिनके पास प्राकृतिक यौन सुख के एक नहीं अनेक साधन उपलब्ध हैं. जो लोग कामसूत्र और अजंता, खजुराहो का उदाहरण देते हैं वे शायद यह भूल जाते हैं कि इनमें समलैंगिकों का कोई स्थान नहीं है. क्षेपक या अपवाद की बात अलग है. और, इन सबकी रचना तब हुई थी जब भारत का स्वर्णिम काल था और इनके रचना काल के बाद से ही तत्कालीन साम्राज्य के पतन की भी शुरुआत हो गयी थी.
अगर इस हिसाब से देखें तो इस मामले में हम स्वर्ण युग?? में जी रहे हैं क्योंकि अमेरिका, यूरोप जैसी महाशक्तियां अभी मंदी के दौर से गुजर रही हैं और भारत ने फिलहाल अपने को बेहतर स्थिति में बनाए रखा है. आने वाला साल और भी बेहतर होगा क्योंकि दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम होने वाले हैं. यह दिल्ली के लिए कम से कम इस दशक में सबसे बेहतर साल होगा. अब इतिहास के अनुसार चलें तो इस एक-डेढ़ साल में हम ऐसे विकसित कामुक समाज की रचना कर चुके होंगे जिसमें किसी भी प्रकार के यौन सुख पर किसी प्रकार की बाधा नहीं होगी क्योंकि हमें विदेशियों को खुश रखना है. चाहे वे गे या लेस्बियन का यौन सुख हो या फिर अन्य प्रकार के यौनाचार. इस स्वर्णिम अवसर पर सब कुछ उपलब्ध कराने की व्यवस्था इस फैसले के बहाने होने लगी है. अब इससे चाहे देश में ऐड्स फैले या फिर देश कि संस्कृति नष्ट हो. पैसा बनाने वाले इससे पैसा बनाने का रास्ता तैयार कर चुके हैं. मीडिया, कोर्ट इनके लिए औजार भर हैं वह भी इसलिए की आम जनता या हम अब भी इसपर बात करने से कतरा रहे हैं. और, हमारी कमजोरी को उन्होंने समझ लिया है बहुत ही अच्छी तरह.
शनिवार, 11 जुलाई 2009
समलैंगिकता के बहाने


चंदन शर्मा
सोचा था इस विषय पर नहीं लिखूंगा. पर जब मोहल्ले में आग लगी हो तो आपके सामने बस दो ही विकल्प बचते हैं- या तो आग बुझाने में मदद की जाय या फिर अपने घर को जलते देखने के लिए तैयार रहा जाय. यह आशा करना कि मोहल्ला जलने के बाद भी आग से मेरा घर सुरक्षित रह जाएगा, ऐसा सोचना बेबकूफी के अलावा और कुछ नहीं है. और, अभी वक्त ऐसा नहीं आया है कि मूक दर्शक बनकर घर जलते देखते रहा जाय.
समलैंगिकता को मिले कानूनी अधिकार पर बहस में पता नहीं कितने हजार क्विंटल अखबारी कागज़ और टेलीविजन के कितने घंटे जाया हो चुके होंगे पर मित्रों के इतने फ़ोन और मेल आये कि इस मुद्दे पर लिखने से रोकना मुश्किल हो गया. वैसे कानूनी पक्ष के बारे में दिनेश राय द्विवेदी जैसे विद्वानों ने काफी कुछ लिखा है इसलिए इसपर विस्तार में ना जाते हुए सिर्फ इतना ही कहूँगा कि भारत के पूर्व अत्तोर्नी जनरल सोली सोराबजी ने व्यक्तिगत निजता के समर्थन के साथ धारा ३७७ के दंडात्मक प्रावधानों को भी बनाए रखने कि वकालत की है.
पर सवाल क्या सिर्फ व्यक्तिगत निजता भर से जुड़ा हुआ है. कतई नहीं. अगर ऐसा होता तो यह मामला कोर्ट में चुपचाप आता और एक सामान्य खबर या अनजान फैसला बन कर रह जाता. पर जिस तरह से तैयारी कर के पूरे देश में 'तथाकथित समलैंगिकों' के परेड निकाले गए और लाखों-करोडों रूपये इसके नाम पर फूंके गए वह कुछ और ही इशारा करता है. और, इन 'तथाकथित समलैंगिकों' की परेड मैंने भी कवर की है. अस्सी फीसदी भीड़ इसमें किन्नरों की होती है जो निश्चित रूप से भाड़े पर लाए जाते हैं ताकि मीडिया पर कवरेज़ का दबाव बनाया जा सके. और, हमारे देश का कोर्ट और मीडिया? जो मुजफ्फरनगर, मेरठ जैसे शहरों में युवाओं के प्रेम-प्रसंगों के कारण हर महीने हो रही हत्याओं का हिसाब नहीं रख पाता वह समलैंगिकों के अधिकार के लिए तुंरत आगे आ जाता है क्योंकि इससे 'बड़े नाम' जुड़े हुए हैं. ..
दुर्भाग्य से अधिसंख्य जनता जो समलैंगिकता के विरोध में है वह भी कमजोर दिखती है क्योंकि अव्वल तो वह 'कुतर्की' नहीं है और दूसरा इन सब बातों पर चर्चा करने से वह कतराती है। पर अगर इससे बचा जाएगा तो कल इसकी लपटें आप के घर तक नहीं पहुंचेगी इस भरम में कतई नहीं रहना चाहिए. यह समलैंगिकों बनाम अन्य की लड़ाई नहीं है बल्कि समाज और परिवार के अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई है. और, माफ़ करें कोर्ट, जो सिर्फ प्रमाणों और महज वकीलों के तर्क पर फैसले सुनाता है वह आपके और लिए और आपके समाज के लिए लडेगा यह उम्मीद करना बेमानी है. (जारी)
सोचा था इस विषय पर नहीं लिखूंगा. पर जब मोहल्ले में आग लगी हो तो आपके सामने बस दो ही विकल्प बचते हैं- या तो आग बुझाने में मदद की जाय या फिर अपने घर को जलते देखने के लिए तैयार रहा जाय. यह आशा करना कि मोहल्ला जलने के बाद भी आग से मेरा घर सुरक्षित रह जाएगा, ऐसा सोचना बेबकूफी के अलावा और कुछ नहीं है. और, अभी वक्त ऐसा नहीं आया है कि मूक दर्शक बनकर घर जलते देखते रहा जाय.
समलैंगिकता को मिले कानूनी अधिकार पर बहस में पता नहीं कितने हजार क्विंटल अखबारी कागज़ और टेलीविजन के कितने घंटे जाया हो चुके होंगे पर मित्रों के इतने फ़ोन और मेल आये कि इस मुद्दे पर लिखने से रोकना मुश्किल हो गया. वैसे कानूनी पक्ष के बारे में दिनेश राय द्विवेदी जैसे विद्वानों ने काफी कुछ लिखा है इसलिए इसपर विस्तार में ना जाते हुए सिर्फ इतना ही कहूँगा कि भारत के पूर्व अत्तोर्नी जनरल सोली सोराबजी ने व्यक्तिगत निजता के समर्थन के साथ धारा ३७७ के दंडात्मक प्रावधानों को भी बनाए रखने कि वकालत की है.
पर सवाल क्या सिर्फ व्यक्तिगत निजता भर से जुड़ा हुआ है. कतई नहीं. अगर ऐसा होता तो यह मामला कोर्ट में चुपचाप आता और एक सामान्य खबर या अनजान फैसला बन कर रह जाता. पर जिस तरह से तैयारी कर के पूरे देश में 'तथाकथित समलैंगिकों' के परेड निकाले गए और लाखों-करोडों रूपये इसके नाम पर फूंके गए वह कुछ और ही इशारा करता है. और, इन 'तथाकथित समलैंगिकों' की परेड मैंने भी कवर की है. अस्सी फीसदी भीड़ इसमें किन्नरों की होती है जो निश्चित रूप से भाड़े पर लाए जाते हैं ताकि मीडिया पर कवरेज़ का दबाव बनाया जा सके. और, हमारे देश का कोर्ट और मीडिया? जो मुजफ्फरनगर, मेरठ जैसे शहरों में युवाओं के प्रेम-प्रसंगों के कारण हर महीने हो रही हत्याओं का हिसाब नहीं रख पाता वह समलैंगिकों के अधिकार के लिए तुंरत आगे आ जाता है क्योंकि इससे 'बड़े नाम' जुड़े हुए हैं. ..
दुर्भाग्य से अधिसंख्य जनता जो समलैंगिकता के विरोध में है वह भी कमजोर दिखती है क्योंकि अव्वल तो वह 'कुतर्की' नहीं है और दूसरा इन सब बातों पर चर्चा करने से वह कतराती है। पर अगर इससे बचा जाएगा तो कल इसकी लपटें आप के घर तक नहीं पहुंचेगी इस भरम में कतई नहीं रहना चाहिए. यह समलैंगिकों बनाम अन्य की लड़ाई नहीं है बल्कि समाज और परिवार के अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई है. और, माफ़ करें कोर्ट, जो सिर्फ प्रमाणों और महज वकीलों के तर्क पर फैसले सुनाता है वह आपके और लिए और आपके समाज के लिए लडेगा यह उम्मीद करना बेमानी है. (जारी)
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