सोमवार, 10 अगस्त 2009

'अलवर की नयी राजकुमारियां' के बहाने

काफी दिनों बाद सोमवार को संसद के 'बालयोगी' सभागार जाना हुआ. मौका था एक पुस्तक ' अलवर की नयी राजकुमारियां' का विमोचन. चूँकि विमोचन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार द्वारा किया जाना था तो जाहिर था कि सारे औपचारिक ताम-झाम मौजूद थे इस कार्यक्रम के लिए.

पुस्तक 'सिर पर मैला ढोने वाली' महिलाओं के और उनके परिवारों के सामजिक उत्थान और आर्थिक बदलाव की कहानी है जिसमें ५० से ज्यादा पत्रकारों और लेखकों के लेखों और रिपोर्टों का संकलन है. पर कार्यक्रम की खासियत यह थी कि इस सभागार में करीब १०० से ज्यादा ऐसी महिलायें मौजूद थीं और इनमें से दो - उषा चौमर और सुशीला को बकायादा मंच पर स्पीकर के साथ बिठाया गया था. कहने की जरूरत नहीं है की लोकसभा के सभागार में यह काम मीरा कुमार के रहते ही हो सकता था. जिस धैर्य से उन्होंने इन लोगों कि कहानी करीब तीन घंटे से ज्यादा समय तक सुना वह भी उनके जैसा स्पीकर ही कर सकता था.

पर जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा विचलित किया वह कार्यक्रम के आयोजक 'सुलभ इंटरनेशनल' के संस्थापक विन्देश्वर पाठक के उस आपबीती ने जब उन्होंने इस सुलभ की नींव रखने के पीछे का वाक़या सुनाया. उनके शब्दों में "एक बार ऐसी ही जाति की महिला को उन्होंने बचपन में छू दिया था तब उनके लाख विरोध करने और रोने के बाद भी उनकी दादी ने उन्हें गौमूत्र, गोबर और गंगाजल खिला कर उनकी शुद्धि की थी". तब से ही उन्होंने इस बारे में कुछ करने का निर्णय किया और बाद में सुलभ की स्थापना की.

कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने इस काम के लिए अपनी शिक्षक की नौकरी छोड़ दी और बीवी के गहने बेच दिए. ब्राहमण होने के कारण उन्हें इस प्रकार का शौचालय से जुड़ा काम करने के लिए उनके अपनों ने उनका हुक्का पानी बंद तक कर दिया था. पर आज सुलभ एक अलग ही कहानी है. अलवर की जिन महिलाओं की यह कहानी है उन महिलाओं ने पिछले साल अपना फैशन शो संयुक्त राष्ट्र संघ (यू एन) में किया था जिसमें देश भर की चुनिदा मॉडल इनके साथ रैंप पर उतरी थी और सारी दुनिया के लिए यह एक खबर बनी थी. पर खबर को छोड़ दें तो क्या २१वी सदी में भारत अभी भी इस अमानवीय परंपरा से मुक्त हो पाया है??

4 टिप्‍पणियां:

  1. विन्देश्वर पाठक जी के बारे में बहुत कुछ सुना और जाना जरुर था, यह वाकिया जान श्रृद्धा भाव और भी बढ़ गये.

    आभार आपका.

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  2. धारणाएं तेजी से टूट तो रहीं हैं... भले ही विन्देश्वर पाठक और मीरा कुमार जैसे लोगों के प्रयासों से ही सही....
    इस देश को एक गांधी कभी नहीं सुधार पाएगा... कम-अज-कम एक लाख गांधी चाहिए होंगे....
    www.nayikalam.blogspot.com

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  3. मुझे तो विन्धेश्वर जी के बारे में ज़्यादा ज्ञान नहीं था पर आपके पोस्ट के दौरान उनके प्रति मेरी श्रद्धा और बढ गई! बहुत अच्छा लिखा है आपने!

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